पंजाब में नशा तस्करी: ड्रोन और डिजिटल कनेक्शन, गली-मोहल्लों से बहुस्तरीय सप्लाई नेटवर्क तक पहुंची जांच
पंजाब में 18 से 75 वर्ष आयु वर्ग के 34 फीसदी यानी करीब 73.31 लाख लोग शराब का सेवन करते हैं। अधिकारियों के अनुसार कई लोग एक से अधिक प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं, इसलिए इन आंकड़ों को जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
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पंजाब में नशा तस्करी का चेहरा तेजी से बदल रहा है। कभी गली-मोहल्लों में सक्रिय छोटे पेडलरों तक सीमित दिखने वाला यह कारोबार अब कई परतों वाले संगठित नेटवर्क में बदल चुका है। सीमा पार से ड्रोन के जरिए हेरोइन और हथियार भेजे जा रहे हैं, नियंत्रित दवाओं के दुरुपयोग के मामले बढ़ रहे हैं और डिजिटल माध्यमों से नेटवर्क संचालित किए जा रहे हैं।
कुछ मामलों में वैध कारोबारों के संभावित दुरुपयोग की जांच भी एजेंसियों के दायरे में आई है। पंजाब पुलिस, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और ड्रग कंट्रोल विभाग की कार्रवाई बताती है कि नशा तस्करी अब केवल सीमा पार से खेप लाने या सड़क पर बिक्री तक सीमित अपराध नहीं रही, बल्कि वित्तीय लेन-देन, फार्मा सप्लाई चेन, परिवहन और बहुस्तरीय सप्लाई नेटवर्क तक फैल चुकी है।
हजारों पेडलरों की गिरफ्तारी के बावजूद नशे की उपलब्धता पूरी तरह खत्म नहीं होने पर जांच एजेंसियों ने रणनीति बदली है। अब फोकस केवल तस्कर को पकड़ने पर नहीं, बल्कि पूरे सप्लाई नेटवर्क, फंडिंग, मनी ट्रेल और डिजिटल कनेक्शन को तोड़ने पर है।
यही वजह है कि जांच अब सीमा पार ड्रोन नेटवर्क से लेकर दवा आपूर्ति श्रृंखला, बैंक खातों, संपत्तियों और संदिग्ध कारोबारी गतिविधियों तक पहुंच रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि नशे के खिलाफ निर्णायक लड़ाई तभी संभव है, जब पूरे तस्करी तंत्र की आर्थिक और लॉजिस्टिक रीढ़ पर एक साथ चोट की जाए।
पंजाब में नशे की चुनौती, आंकड़े बढ़ा रहे चिंता
पंजाब में नशे की समस्या की गंभीरता सरकारी आंकड़ों से भी स्पष्ट होती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार वर्ष 2024 में ड्रग ओवरडोज से प्रदेश में 106 लोगों की मौत दर्ज की गई। वहीं सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सहयोग से कराए सर्वे में पाया कि 18 से 75 वर्ष आयु वर्ग के 34 फीसदी यानी करीब 73.31 लाख लोग शराब का सेवन करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार 14.23 फीसदी (30.68 लाख) लोग कैनाबिस, 9.91 फीसदी (21.36 लाख) ओपिओइड्स, 4.61 फीसदी शामक दवाओं, 0.87 फीसदी इन्हेलेंट, 0.69 फीसदी कोकीन और 0.63 फीसदी लोग एम्फेटामाइन जैसे मादक पदार्थों का उपयोग कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार कई लोग एक से अधिक प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं, इसलिए इन आंकड़ों को जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
विद्यार्थियों को बना रहे कैरियर, सीमा से उठवाते हैं हेरोइन और हथियार
सीमा पार सक्रिय तस्कर अब सीमावर्ती क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी नेटवर्क का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार आर्थिक रूप से कमजोर और उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों को पहले पैसों का लालच देकर छोटे काम कराए जाते हैं। भरोसा बनने के बाद उन्हें ड्रोन से सीमा पर गिराई गई खेप उठाकर तय व्यक्ति तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी जाती है। व्हाट्सएप कॉल के जरिए ड्रॉप लोकेशन साझा की जाती है।
एएनटीएफ पहले ऐसे कई मामलों का खुलासा कर चुकी है। एआईजी गुरिंदरबीर सिंह के अनुसार गुरुहरसहाय क्षेत्र के एक सिविल इंजीनियरिंग छात्र को 12 किलो हेरोइन के साथ गिरफ्तार किया गया था। जांच में यह भी सामने आया कि जेल में बंद तस्कर भी छात्रों को पाकिस्तानी नेटवर्क से जोड़ने में भूमिका निभा रहे हैं। अब सुरक्षा एजेंसियां विद्यार्थियों की संलिप्तता पर विशेष नजर रख रही हैं।
सीमा पार से नशा तस्करी के तौर-तरीके तेजी से बदल रहे हैं। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की जांच में सामने आया है कि तस्कर जीपीएस आधारित ड्रोन से रात या कम दृश्यता के दौरान हेरोइन की खेप भारतीय सीमा में गिराते हैं। इसके बाद जीपीएस लोकेशन साझा कर खेतों, नालों या तारबंदी के पास गिराए गए पैकेट स्थानीय मॉड्यूल से उठवाए जाते हैं। कुछ स्थानीय संपर्कों को पैसों का लालच देकर केवल खेप उठाने और आगे पहुंचाने का काम दिया जाता है। बाद में यह माल छोटे वाहनों और ट्रकों के जरिए दूसरे राज्यों तक पहुंचाया जाता है। एसएसपी गगन अजीत सिंह के अनुसार ड्रोन रोधी तकनीक, नाइट पेट्रोलिंग और खुफिया तंत्र को मजबूत किया गया है। बीएसएफ के साथ संयुक्त अभियान लगातार चलाए जा रहे हैं।
जेएंडके मार्ग और स्थानीय युवाओं का इस्तेमाल, पुलिस सतर्क
सीमावर्ती क्षेत्रों में नशा तस्करी के लिए तस्कर स्थानीय युवाओं का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। पुलिस जांच में सामने आया है कि कुछ तस्कर जम्मू-कश्मीर के नगरी क्षेत्र से नशा लेकर आते हैं, जबकि पहले ड्रोन के जरिए हेरोइन मंगाने के मामले भी सामने आ चुके हैं। तस्कर आपसी संपर्क के लिए व्हाट्सएप कॉल और लोकेशन साझा करने के लिए डेड ड्रॉप पद्धति का इस्तेमाल करते हैं। ड्रोन से गिराई गई खेप खेतों और नदी-नालों के पास से उठाकर मोटरसाइकिल के जरिए आगे पहुंचाई जाती है। बमियाल चौकी प्रभारी एएसआई बलकार सिंह ने बताया कि पुलिस और बीएसएफ सेकेंड लाइन ऑफ डिफेंस पर लगातार निगरानी रखे हुए हैं तथा सीमावर्ती मार्गों पर संयुक्त अभियान चलाए जा रहे हैं।
2026 में अमृतसर सीमा पर 60 से अधिक ड्रोन, 260 किलो हेरोइन बरामद
वर्ष 2026 में अमृतसर सीमा क्षेत्र में बीएसएफ, अमृतसर कमिश्नरेट पुलिस और अमृतसर देहाती पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाकर सीमा पार से नशा और हथियार तस्करी के कई प्रयास विफल किए हैं। 31 जुलाई तक की आधिकारिक जानकारी के अनुसार 60 से अधिक ड्रोन बरामद या मार गिराए गए। कार्रवाई के दौरान 260 किलो से अधिक हेरोइन, 11 किलो आईसीई (मेथामफेटामाइन), 10 किलो अफीम, चरस, गांजा, नशीली गोलियां और अन्य मादक पदार्थ जब्त किए गए। हथियारों में 250 से अधिक पिस्तौल, एक एके-47, 10 से अधिक अन्य राइफल और रिवॉल्वर, 45 से अधिक मैगजीन, 800 से ज्यादा कारतूस तथा चार हैंड ग्रेनेड बरामद हुए। ये आंकड़े बताते हैं कि सीमा पार तस्करी में ड्रोन अब सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है और सुरक्षा एजेंसियों का फोकस भी उसी पर केंद्रित है।
आखिर तस्कर बार-बार तरीके क्यों बदल रहे हैं?
पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों की लगातार कार्रवाई ने नशा तस्करों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। पहले पूरा नेटवर्क छोटे पेडलरों के भरोसे चलता था, लेकिन लगातार गिरफ्तारी और निगरानी बढ़ने से यह मॉडल कमजोर पड़ गया। अब तस्करों ने सप्लाई चेन को कई परतों में बांट दिया है। सीमा पार से ड्रोन के जरिए खेप भेजी जाती है, जिसे अलग-अलग स्थानीय मॉड्यूल उठाकर आगे पहुंचाते हैं। डिजिटल पेमेंट, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप और इंटरनेट कॉलिंग से पहचान छिपाना भी आसान हो गया है। वहीं, सिंथेटिक ड्रग्स और नियंत्रित दवाओं में अधिक मुनाफा मिलने से तस्करों का झुकाव इस ओर बढ़ा है। यही वजह है कि अब नेटवर्क कई परतों में काम करता है और जांच एजेंसियों के लिए पूरे गिरोह तक पहुंचना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया है।
पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के सामने अब केवल नशे की खेप पकड़ना ही चुनौती नहीं है। असली लक्ष्य उस पूरे नेटवर्क को तोड़ना है, जो सीमा पार से लेकर स्थानीय वितरण तक सक्रिय है। इसके लिए ड्रोन के जरिए हो रही तस्करी पर प्रभावी रोक, डिजिटल भुगतान और एन्क्रिप्टेड संचार की निगरानी, नियंत्रित दवाओं की सप्लाई चेन पर सख्त नजर तथा संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की जांच जरूरी मानी जा रही है। साथ ही सीमावर्ती क्षेत्रों में युवाओं को ऐसे नेटवर्क से दूर रखने के लिए जागरूकता और स्थानीय सूचना तंत्र को मजबूत करना भी अहम होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस, बीएसएफ, एनसीबी, ईडी और ड्रग कंट्रोल विभाग के बीच बेहतर समन्वय तथा प्रभावी मनी ट्रेल जांच के बिना बदलते नेटवर्क पर निर्णायक चोट संभव नहीं होगी।
सीमापार तस्करी पर सख्ती से ही टूटेगी नशे की कमर
पंजाब की पाकिस्तान के साथ 553 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है जिसका इस्तेमाल नशा तस्कर लगातार कर रहे हैं। अफगानिस्तान से आने वाली बड़ी खेप पाकिस्तान के रास्ते पंजाब पहुंचती है। यहां से नशा देश के अन्य राज्यों खासकर मुंबई और विदेशों तक भेजा जाता है। सरकार तस्करी रोकने के लिए लगातार कार्रवाई कर रही है लेकिन तस्कर नए-नए तरीके अपनाकर नेटवर्क चला रहे हैं। पूर्व डीजीपी एपी पांडेय का कहना है कि छोटे तस्करों के साथ नशे के बड़े सौदागरों और पूरे गिरोह पर निर्णायक कार्रवाई होगी तभी इस अवैध कारोबार पर प्रभावी रोक लग सकेगी।
पहले कार्रवाई का केंद्र सड़क पर नशा बेचने वाले पेडलर होते थे। अब पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां पूरे नेटवर्क की जांच कर रही हैं। खेप कहां से आई, किसने पैसा लगाया, किसने छिपाया और किस चैनल से आगे पहुंची—इन सभी पहलुओं की पड़ताल की जा रही है। एनडीपीएस मामलों में बैंक खाते, संपत्ति, मोबाइल डेटा और डिजिटल ट्रांजेक्शन भी जांच का हिस्सा बन चुके हैं। अधिकारियों का मानना है कि सप्लाई चेन तोड़े बिना नशा तस्करी पर स्थायी रोक संभव नहीं।
ड्रोन ने कैसे बदल दिया तस्करी का खेल
सीमा पार से नशा भेजने का तरीका तेजी से बदल गया है। पहले मानव नेटवर्क पर निर्भर रहने वाले तस्कर अब ड्रोन का अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं। रात के समय खेतों में गिराई गई खेप स्थानीय मॉड्यूल तक पहुंचती है और वहां से अलग-अलग जिलों में भेजी जाती है। इसी वजह से सीमा सुरक्षा बल और पंजाब पुलिस ने एंटी-ड्रोन सिस्टम, तकनीकी निगरानी और खुफिया तंत्र को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया है।
दवा की दुकान से ड्रग नेटवर्क तक
प्रेगाबालिन, ट्रामाडोल, कोडीन और अन्य नियंत्रित दवाओं के दुरुपयोग ने जांच एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। पंजाब में कई मेडिकल प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई, लाइसेंस निलंबन और दवाओं की जब्ती ने संकेत दिया कि वैध दवा वितरण प्रणाली का दुरुपयोग भी नशा नेटवर्क की एक कड़ी बन सकता है। इसलिए ड्रग कंट्रोल विभाग अब नियमित निरीक्षण, रिकॉर्ड सत्यापन और दवा वितरण व्यवस्था की निगरानी पर पहले से अधिक जोर दे रहा है।
अब पैसों की कड़ी पर चोट
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल गिरफ्तारी से नशा तस्करी नहीं रुकेगी। जब तक तस्करों की अवैध कमाई, संपत्ति, फर्जी कारोबार और वित्तीय नेटवर्क पर चोट नहीं होगी, नए मॉड्यूल बनते रहेंगे। इसी सोच के तहत पंजाब पुलिस, ईडी, एनसीबी और अन्य एजेंसियां संयुक्त जांच पर जोर दे रही हैं। लक्ष्य केवल नशे की खेप पकड़ना नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक तंत्र को ध्वस्त करना है, जिससे यह कारोबार संचालित होता है।