पार्षद की कुर्सी छोटी, सियासी दांव बड़ा... राजस्थान की राजनीति में निकाय चुनाव क्यों बनते हैं ‘लॉन्चिंग पैड’?
राजस्थान में कई नेताओं ने पार्षद से राजनीतिक सफर शुरू कर विधायक, सांसद और मंत्री तक का मुकाम हासिल किया। निकाय चुनाव नए सियासी चेहरों के लिए अहम मंच हैं।
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किसी वार्ड की सड़क, पानी, सफाई या नाली की समस्या से शुरू हुई राजनीति कब विधानसभा तक पहुंच जाए, राजस्थान की सियासत में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। निकाय चुनाव इसलिए सिर्फ स्थानीय प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं। कई नेताओं के लिए यह राजनीतिक पहचान बनाने और आगे बढ़ने का शुरुआती मंच भी रहा है।
नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका की राजनीति से निकले कुछ नेता आगे चलकर विधायक, सांसद, मंत्री या पार्टी संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंचे। यह सिलसिला भाजपा और कांग्रेस, दोनों में दिखाई देता है।
जयपुर के वार्डों से विधानसभा तक
जयपुर की स्थानीय राजनीति इसके कुछ प्रमुख उदाहरण सामने रखती है। मोहनलाल गुप्ता पार्षद रहे और बाद में जयपुर के महापौर बने। इसके बाद किशनपोल से विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने और तीन बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया।
सुरेंद्र पारीक भी पार्षद से आगे बढ़कर हवामहल से दो बार विधायक बने। अशोक परनामी महापौर रहे और बाद में आदर्श नगर से दो बार विधायक चुने गए। आगे चलकर उन्होंने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली।
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पूर्व महापौर अशोक लाहोटी ने 2018 में सांगानेर से विधानसभा चुनाव जीता। पार्षद रहे मानसिंह भी 2013 में परबतसर से विधायक चुने गए। इन उदाहरणों से यह जरूर दिखता है कि जयपुर की निकाय राजनीति ने कुछ नेताओं को विधानसभा तक पहुंचने के लिए जरूरी राजनीतिक जमीन उपलब्ध कराई।
उदयपुर में भी दिखी यही सियासी सीढ़ी
उदयपुर की स्थानीय राजनीति से भी कई नेता आगे बढ़े। भानु कुमार शास्त्री पार्षद रहने के बाद विधायक और सांसद बने। किरण माहेश्वरी नगर परिषद की सभापति से आगे बढ़ीं और सांसद बनने के साथ राजसमंद से तीन बार विधायक रहीं। वे राज्य सरकार में मंत्री भी रहीं। फूल सिंह मीणा ने पार्षद के रूप में शुरुआत की और उदयपुर ग्रामीण से लगातार तीन बार विधायक चुने गए। कांग्रेस के त्रिलोक पूर्बिया और भाजपा के ताराचंद जैन भी स्थानीय निकाय की राजनीति से विधानसभा तक पहुंचे।
कांग्रेस में भी निकाय से विधानसभा का रास्ता
यह कहानी सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं है। कांग्रेस की पुष्पा शर्मा अलवर नगर परिषद की पार्षद रहीं और 1985 में विधायक चुनी गईं। मनीषा पंवार जोधपुर नगर निगम की पार्षद रहने के बाद 2018 में विधानसभा पहुंचीं। नोहर नगर पालिका के अध्यक्ष रहे अमित चाचान बाद में विधानसभा के लिए चुने गए। बीकानेर के गोपाल जोशी पार्षद और सभापति रहने के बाद विधायक बने और तीन बार विधानसभा पहुंचे।
अजमेर की अनिता भदेल ने भी स्थानीय निकाय से राजनीतिक सफर शुरू किया। वे 2003 से 2023 तक लगातार पांच विधानसभा चुनावों में अजमेर दक्षिण का प्रतिनिधित्व करने में सफल रहीं।
कई चेहरे विधानसभा तक पहुंचे, लेकिन जीत दर्ज नहीं कर पाए
निकाय की राजनीति से पहचान बनाने के बाद कई नेताओं को विधानसभा चुनाव लड़ने का मौका मिला। शील धाबाई, विक्रम सिंह शेखावत और अर्चना शर्मा जैसे नाम इसी कड़ी में आते हैं। उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन जीत उनके खाते में दर्ज नहीं हो सकी। पूर्व जयपुर महापौर ज्योति खंडेलवाल ने महापौर बनने के बाद लोकसभा चुनाव भी लड़ा। 2019 में जयपुर से मैदान में उतरीं, लेकिन संसद तक पहुंचने का मौका नहीं मिल पाया। बाद में उन्होंने भाजपा का दामन थामा और अब फिर निकाय चुनाव के मैदान में हैं।
पार्षद की राजनीति में क्या मिलता है?
राजनीतिक विश्लेषक मनीष गोधा के मुताबिक निकाय राजनीति किसी नेता के लिए जमीनी राजनीति की शुरुआती ट्रेनिंग जैसी है। पार्षद को सीधे लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़ना पड़ता है। अधिकारियों से संवाद, विकास कार्यों की निगरानी और स्थानीय मुद्दों को सदन में उठाना उसके राजनीतिक अनुभव का हिस्सा बनता है। निकाय की बैठकों में बजट और विकास कार्यों पर बहस होती है। यही अनुभव आगे विधानसभा की राजनीति में उपयोगी साबित हो सकता है। अंतर सिर्फ इतना है कि वार्ड की सीमा बढ़कर पूरा विधानसभा क्षेत्र हो जाती है और मुद्दों का दायरा भी बड़ा हो जाता है।