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Jaipur Health News: जयपुर में जोंक थेरेपी बनी इलाज की नई उम्मीद, बाल झड़ने से लेकर स्किन रोगों तक मिल रहा लाभ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: Sourabh Bhatt
Updated Fri, 10 Apr 2026 12:41 PM IST
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सार
जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में जोंक थेरेपी बाल झड़ने, एलोपेसिया और त्वचा रोगों के इलाज में कारगर साबित हो रही है। अब तक 1100 से अधिक मरीज लाभान्वित हुए हैं। कम लागत और प्राकृतिक उपचार के कारण इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है।
लीच थैरेपी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जयपुर स्थित राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में पारंपरिक जोंक थेरेपी (Leech Therapy) अब आधुनिक स्किन और हेयर ट्रीटमेंट का प्रभावी और किफायती विकल्प बनकर उभर रही है। संस्थान के चिकित्सकों का दावा है कि अब तक 1100 से अधिक मरीज इस थेरेपी से लाभान्वित हो चुके हैं और इसके परिणाम लगातार सकारात्मक सामने आ रहे हैं।
जोंक, जिसे आमतौर पर खून चूसने वाला जीव माना जाता है, दरअसल चिकित्सा विज्ञान में लंबे समय से उपयोग में लाई जाती रही है। इसकी लार में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-
कोएगुलेंट तत्व रक्त संचार को बेहतर बनाते हैं। इससे त्वचा और सिर की त्वचा (स्कैल्प) को पोषण मिलता है और सूजन, दर्द व संक्रमण में राहत मिलती है।
संस्थान में जोंक थेरेपी का उपयोग अब केवल गंभीर बीमारियों तक सीमित नहीं रहा। इसका इस्तेमाल स्किन इंफेक्शन, पिग्मेंटेशन, एक्ने, एक्जिमा, झाइयां, पुराने घाव और सर्जरी के निशानों के उपचार में भी किया जा रहा है। इसके अलावा बालों से जुड़ी समस्याओं जैसे एलोपेसिया, हेयर फॉल और शुरुआती गंजेपन में भी अच्छे परिणाम सामने आए हैं।
हाल ही में ग्वालियर की एक 28 वर्षीय महिला का मामला सामने आया, जिन्हें अचानक बाल झड़ने और सिर पर पैच बनने की समस्या हो गई थी। कई एलोपैथिक उपचारों से राहत न मिलने के बाद उन्होंने जोंक थेरेपी अपनाई। करीब दो महीने के भीतर उनके बाल झड़ना कम हुआ और नई ग्रोथ भी दिखाई देने लगी।
संस्थान के डीन डॉ. सी.आर. यादव के अनुसार, जोंक की लार में मौजूद जैव सक्रिय तत्व ब्लड सर्कुलेशन को सुधारते हैं, जिससे स्किन और स्कैल्प को बेहतर पोषण मिलता है। यही वजह है कि मरीजों को सूजन और दर्द में भी राहत मिलती है।
यह भी पढें- Jhalawar News: “मैं अपने लिए कुछ नहीं कर सकी…”, वसुंधरा राजे के बयान से गरमाई सियासत, चर्चाओं का दौर तेज
सुरक्षा के लिहाज से संस्थान में सख्त प्रोटोकॉल लागू किया गया है। हर मरीज के लिए अलग जोंक का उपयोग किया जाता है और उसे सात दिन तक दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता, जिससे संक्रमण का खतरा खत्म हो जाता है। जोंकों को सुरक्षित रखने के लिए लैब जैसी हाईजीन व्यवस्था बनाई गई है, जहां पानी की गुणवत्ता (TDS) और तापमान लगातार मॉनिटर किया जाता है।
जहां हेयर ट्रांसप्लांट पर 60 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक खर्च आता है और लेजर ट्रीटमेंट की एक सिटिंग 5 से 25 हजार रुपये तक होती है, वहीं इस संस्थान में जोंक थेरेपी मुफ्त उपलब्ध है। यही कारण है कि लोग महंगे कॉस्मेटिक उपचार छोड़कर इस प्राकृतिक पद्धति की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि कम लागत, प्राकृतिक विधि और बेहतर परिणामों के कारण जोंक थेरेपी भविष्य में स्किन और हेयर केयर का महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है।
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जोंक, जिसे आमतौर पर खून चूसने वाला जीव माना जाता है, दरअसल चिकित्सा विज्ञान में लंबे समय से उपयोग में लाई जाती रही है। इसकी लार में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-
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कोएगुलेंट तत्व रक्त संचार को बेहतर बनाते हैं। इससे त्वचा और सिर की त्वचा (स्कैल्प) को पोषण मिलता है और सूजन, दर्द व संक्रमण में राहत मिलती है।
संस्थान में जोंक थेरेपी का उपयोग अब केवल गंभीर बीमारियों तक सीमित नहीं रहा। इसका इस्तेमाल स्किन इंफेक्शन, पिग्मेंटेशन, एक्ने, एक्जिमा, झाइयां, पुराने घाव और सर्जरी के निशानों के उपचार में भी किया जा रहा है। इसके अलावा बालों से जुड़ी समस्याओं जैसे एलोपेसिया, हेयर फॉल और शुरुआती गंजेपन में भी अच्छे परिणाम सामने आए हैं।
हाल ही में ग्वालियर की एक 28 वर्षीय महिला का मामला सामने आया, जिन्हें अचानक बाल झड़ने और सिर पर पैच बनने की समस्या हो गई थी। कई एलोपैथिक उपचारों से राहत न मिलने के बाद उन्होंने जोंक थेरेपी अपनाई। करीब दो महीने के भीतर उनके बाल झड़ना कम हुआ और नई ग्रोथ भी दिखाई देने लगी।
संस्थान के डीन डॉ. सी.आर. यादव के अनुसार, जोंक की लार में मौजूद जैव सक्रिय तत्व ब्लड सर्कुलेशन को सुधारते हैं, जिससे स्किन और स्कैल्प को बेहतर पोषण मिलता है। यही वजह है कि मरीजों को सूजन और दर्द में भी राहत मिलती है।
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सुरक्षा के लिहाज से संस्थान में सख्त प्रोटोकॉल लागू किया गया है। हर मरीज के लिए अलग जोंक का उपयोग किया जाता है और उसे सात दिन तक दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता, जिससे संक्रमण का खतरा खत्म हो जाता है। जोंकों को सुरक्षित रखने के लिए लैब जैसी हाईजीन व्यवस्था बनाई गई है, जहां पानी की गुणवत्ता (TDS) और तापमान लगातार मॉनिटर किया जाता है।
जहां हेयर ट्रांसप्लांट पर 60 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक खर्च आता है और लेजर ट्रीटमेंट की एक सिटिंग 5 से 25 हजार रुपये तक होती है, वहीं इस संस्थान में जोंक थेरेपी मुफ्त उपलब्ध है। यही कारण है कि लोग महंगे कॉस्मेटिक उपचार छोड़कर इस प्राकृतिक पद्धति की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि कम लागत, प्राकृतिक विधि और बेहतर परिणामों के कारण जोंक थेरेपी भविष्य में स्किन और हेयर केयर का महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है।
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