राजस्थान निकाय चुनाव: जीत के जश्न के बीच क्यों बढ़ी भाजपा की टेंशन? मंत्रियों का अब होगा विधानसभा वार हिसाब
राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा ने बड़ी संख्या में बोर्ड बनाए, लेकिन कुछ मंत्रियों के विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी सफल नहीं रही। अब संगठन विधानसभा वार प्रदर्शन की समीक्षा करेगा।
विस्तार
निकाय चुनाव में भाजपा भले ही जीत का जश्न मना रही है लेकिन पार्टी में भीतरखाने चिंता भी है। वोट प्रतिशत को लेकर भी कांग्रेस इन चुनावों में बीजेपी से 1 फीसदी से भी कम से पीछे रही है। कई बड़े मंत्रियों की विधानसभा में बीजेपी को चुनावों में भारी विरोध और हार का सामना भी करना पड़ा है। हालांकि सरकार और सियासी मैनेजमेंट के दम पर बीजेपी बड़े निकायों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही है। लेकिन बोर्ड गठन के बाद पार्टी के भीतर अब एक दूसरा हिसाब शुरू हो गया है।
सवाल यह है कि किस विधानसभा क्षेत्र में पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहा, किन नेताओं का प्रभाव काम आया और कहां संगठन के साथ स्थानीय समीकरण उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे? निकाय चुनाव के दौरान बागियों को लेकर बीजेपी में सबसे ज्यादा खलबली रही। यहां तक की चुनाव से ठीक पहले यहां पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष को आना पड़ा। सूत्रों के मुताबिक बीएल संतोष ने अपनी समीक्षा बैठक में बीजेपी के कई बड़े नेताओं को जमकर हड़काया भी था। यहां तक कहा गया कि हमारे पास एक-एक नेता का हिसाब-किताब है।
मंत्रियों के इलाके में नतीजों पर नजर
भाजपा के लिए सबसे अहम समीक्षा उन विधानसभा क्षेत्रों की है, जहां पार्टी के मंत्री या वरिष्ठ नेता सीधे तौर पर राजनीतिक रूप से प्रभावशाली माने जाते हैं। कुछ मंत्रियों के क्षेत्रों में भाजपा बोर्ड बनाने में सफल रही, जबकि कुछ जगह पार्टी निकाय प्रमुख का पद हासिल नहीं कर सकी।
पार्टी के भीतर अब इन नतीजों को विधानसभा क्षेत्रवार संगठन, उम्मीदवार चयन, बागियों की भूमिका, निर्दलीयों के प्रदर्शन और बोर्ड गठन के दौरान बने समीकरणों के साथ देखा जा रहा है।
पार्टी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ भी विधानसभा क्षेत्रवार संगठन और चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा की बात कह चुके हैं। उनके मुताबिक टिकट वितरण, बागियों, निर्दलीयों और बोर्ड गठन के दौरान बने राजनीतिक समीकरणों का विश्लेषण किया जाएगा और इसकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार होगी।
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सात मंत्रियों के क्षेत्रों में नहीं बन सका भाजपा बोर्ड
दिए गए चुनावी आंकड़ों के मुताबिक बड़ीसादड़ी में सहकारिता मंत्री गौतम कुमार दक, प्रतापगढ़ में राजस्व मंत्री हेमंत मीणा, सिरोही में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री ओटाराम देवासी और जालोर में मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भाजपा निकाय प्रमुख नहीं बना सकी। खुद प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह जिले पाली में भी बीजेपी बुरी तरह से चुनाव हार गई। हालांकि जोड़-तोड़ के दम पर बीजेपी ने वहां अपना मेयर बना लिया।
इसी तरह नावा में राज्यमंत्री विजय सिंह चौधरी, दूदू में उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और जायल में महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री मंजू बाघमार के विधानसभा क्षेत्रों में भी भाजपा निकाय प्रमुख का पद हासिल नहीं कर सकी। इन परिणामों को पार्टी की आंतरिक समीक्षा में किस तरह देखा जाता है, यह आगे की संगठनात्मक प्रक्रिया में सामने आएगा।
कई मंत्रियों के इलाके में भाजपा को सफलता
दूसरी तरफ सांगोद में ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर, रामगंजमंडी में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर, अलवर में वन मंत्री संजय सिंह, मालपुरा में PHED मंत्री कन्हैया लाल चौधरी और नगर में गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भाजपा बोर्ड बनाने में सफल रही।
सवाई माधोपुर में कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा, गुड़ामालानी में उद्योग राज्य मंत्री केके विश्नोई, लूणकरणसर में खाद्य मंत्री सुमित गोदारा, जैतारण में सामाजिक न्याय मंत्री अविनाश गहलोत और पुष्कर में जल संसाधन मंत्री सुरेश रावत के क्षेत्रों में भी भाजपा निकाय प्रमुख बनाने में कामयाब रही।
जोधपुर में संसदीय कार्य मंत्री जोगराम पटेल और चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के विधानसभा क्षेत्रों में भी भाजपा को बोर्ड गठन में सफलता मिली। वहीं श्रीमाधोपुर में UDH मंत्री झाबर सिंह खर्रा के क्षेत्र में भी पार्टी निकाय प्रमुख बनाने में सफल रही।
जयपुर के नतीजे से पूरा होगा कुछ नेताओं का रिपोर्ट कार्ड
जयपुर नगर निगम के नतीजे इस समीक्षा को और महत्वपूर्ण बना रहे हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सांगानेर विधानसभा सीट, उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी और उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के विधानसभा क्षेत्र जयपुर नगर निगम क्षेत्र में आते हैं।
इसलिए इन नेताओं के विधानसभा क्षेत्रों का पूरा चुनावी आकलन जयपुर नगर निगम के बोर्ड गठन और वार्डवार नतीजों के साथ ही स्पष्ट होगा। मुख्यमंत्री के गृह जिले भरतपुर में भाजपा निर्दलीयों के सहयोग से बोर्ड बनाने में सफल रही है।
जीत बड़ी, लेकिन सवाल वार्ड स्तर के प्रदर्शन पर
भाजपा के लिए निकाय चुनाव का एक अहम पहलू यह भी है कि निकाय प्रमुख के पदों पर मिली सफलता हमेशा वार्ड स्तर के आंकड़ों से सीधे मेल नहीं खाती। कई जगह भाजपा सबसे बड़ी पार्टी नहीं होने के बावजूद निर्दलीयों या अन्य पार्षदों के समर्थन से बोर्ड बनाने में सफल रही।
पाली और अजमेर जैसे निकायों में बोर्ड गठन के दौरान बने राजनीतिक समीकरण इसका उदाहरण रहे। ऐसे में पार्टी की समीक्षा सिर्फ इस आधार पर नहीं होगी कि कितने निकायों में भाजपा का बोर्ड बना, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि कहां पार्टी को अपने दम पर बढ़त मिली और कहां बोर्ड बनाने के लिए दूसरे दलों या निर्दलीयों के समर्थन की जरूरत पड़ी।
अब आगे क्या?
निकाय चुनाव के बाद तैयार होने वाली विधानसभा क्षेत्रवार रिपोर्ट पार्टी के लिए संगठनात्मक स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकती है। खास तौर पर मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं के क्षेत्रों में प्रदर्शन, बागियों का असर, टिकट वितरण और बोर्ड गठन के समीकरणों को एक साथ देखा जाएगा।
ऐसे में भाजपा के सामने तस्वीर का एक हिस्सा जीत का है, तो दूसरा हिस्सा उन सीटों और इलाकों का है जहां अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। इसी दूसरे हिस्से का हिसाब अब पार्टी के भीतर शुरू हो गया है।