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सिरोही मुखरी माता मंदिर: 22 किलोमीटर लंबी गुफा, आबूरोड-माउंटआबू कनेक्शन और मोर-मोरनी की तपस्या

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सिरोही Published by: सिरोही ब्यूरो Updated Sat, 21 Mar 2026 12:08 PM IST
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सार

सिरोही: सिरोही जिले के माउंटआबू के प्रवेश द्वार पर स्थित मुखरी माता मंदिर अपनी 22 किलोमीटर लंबी गुफा और मोर-मोरनी की तपस्या की अनोखी कहानी के लिए जाना जाता है। मंदिर में मां अंबे चामुंडा विराजमान हैं।

This unique temple is located in Sirohi where 22-kilometer-long cave connected Abu Road to Mount Abu
मुखरी माता मंदिर
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विस्तार

यदि आप सिरोही जिले के हिल स्टेशन माउंटआबू (बदला नाम: आबूराज) घूमने आ रहे हैं तो यह खबर आपके लिए है। हम आपको एक ऐसे अनोखे मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जहां मां अंबे चामुंडा के रूप में विराजमान हैं। यहां बनी 22 किलोमीटर लंबी गुफा पूर्व में आबूरोड और माउंटआबू को जोड़ती थी। मंदिर माउंटआबू के प्रवेश द्वार पर होने के कारण 'मुखरी माता' के नाम से जाना और पहचाना जाता है। इसके साथ ही मंदिर से मोर और मोरनी की तपस्या की भी जुड़ी हुई कहानी है।

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चामुंडा के रूप में विराजमान हैं मां अंबे
आबूरोड-माउंटआबू मार्ग पर तलेटी तिराहा क्षेत्र से लगभग 500 मीटर की दूरी पर मंदिर का प्रवेश द्वार है। थोड़ी अंदर की ओर जाने पर पहाड़ी पर यह अतिप्राचीन मंदिर स्थित है। मंदिर में मां अंबे चामुंडा के रूप में विराजमान हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर तक सीसी रोड बनाई गई है, जिससे कोई भी व्यक्ति अपने वाहन से आसानी से यहां पहुंच सकता है। मंदिर के बाहर वाहन पार्किंग की सुविधा भी उपलब्ध है। इसके अलावा मंदिर के पास श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए करीब एक दर्जन कमरे और बरामदे भी बने हैं, जहां धार्मिक, पारिवारिक और सामाजिक आयोजन किए जा सकते हैं।
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मंदिर में है माउंटआबू तक जाने वाली गुफा
मंदिर में मां चामुंडा के विराजमान स्थल के पास गुफा है। हालांकि, बीते लंबे समय से यह गुफा बंद है। यहां बकायदा लोहे का गेट भी लगा हुआ है। बताया गया है कि यह गुफा मंदिर से शुरू होकर माउंटआबू में अर्बुदादेवी मंदिर के पास जाती थी और इसकी लंबाई लगभग 22 किलोमीटर थी। पूर्व में लोग इस गुफा से यात्रा किया करते थे, लेकिन अब यह बंद है। सवेरे और शाम दोनों समय यहां पूजा-अर्चना की जाती है।

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मोर-मोरनी ने की थी तपस्या
दूसरी खासियत यह है कि यहां मोर-मोरनी की तपस्या की भी कहानी जुड़ी हुई है। मंदिर के पुजारी ने बताया कि वर्षों पहले शाम होते ही एक मोर-मोरनी का जोड़ा मंदिर में रात्रि विश्राम करने आता था। ये मोर-मोरनी बड़े तपस्वी थे और उनकी इच्छा थी कि उनका अंतिम समय इसी मंदिर में व्यतीत हो। एक दिन सवेरे दोनों मोर-मोरनी मृत अवस्था में पाए गए। तत्कालीन पुजारी ने उनकी इच्छानुसार जहां उनकी मृत्यु हुई, वहीं उनकी समाधि बनाई।

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