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Rajasthan: आजादी की लड़ाई में वागड़ ने भी बजाया बिगुल, तात्या टोपे से प्रजामंडल तक ऐसे जगा जन आंदोलन
Sat, 15 Aug 2026 06:00 AM IST
प्रतीक पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बांसवाड़ा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बांसवाड़ा
Published by: प्रतीक पांडेय
Updated Sat, 15 Aug 2026 06:00 AM IST
सार
Independence Day Special: स्वतंत्रता आंदोलन में वागड़ अंचल ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तात्या टोपे के आगमन से लेकर प्रजामंडल आंदोलन, सामाजिक सुधार और आदिवासी शिक्षा के प्रयासों तक क्षेत्र के क्रांतिकारियों और जननेताओं ने अंग्रेजी शासन व रियासती व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया। महिलाओं ने भी आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाकर आजादी की लड़ाई को मजबूती दी।
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स्वतंत्रता आंदोलन में वागड़ की विभूतियां नंदलाल दीक्षित, हरिदेव जोशी एवं भोगीलाल पंड्या
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
देश के स्वतंत्रता आंदोलन में वागड़ अंचल की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही है। अंग्रेजी शासन और तत्कालीन रियासतों की नीतियों के खिलाफ संघर्ष से लेकर प्रजामंडल की स्थापना तथा सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन तक वागड़ के लोगों ने आजादी की लड़ाई में सक्रिय भागीदारी निभाई। क्षेत्र के अनेक क्रांतिकारियों, समाज सुधारकों और जननेताओं ने अपना जीवन देश और समाज के लिए समर्पित कर दिया।
कई सेनानियों ने जगाई आजादी की अलख
बांसवाड़ा की धरती पर गोविंद गुरु, गौरीशंकर उपाध्याय, बाबा लक्ष्मणदास, भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी, धूलजी भाई भावसार, हरिदेव जोशी, नटवरलाल भट्ट, मास्टर सूरजमल, चिमनलाल मालोत, मणिशंकर नागर, मोहनलाल त्रिवेदी, बाबूलाल जौलाना, कन्हैयालाल सेठिया और भंवरलाल निगम जैसे अनेक लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन सेनानियों ने अंग्रेजी शासन का विरोध करते हुए कठिनाइयां सहीं और आजादी के लक्ष्य से पीछे नहीं हटे।
तात्या टोपे के आगमन से मिली क्रांतिकारी ऊर्जा
1857 की क्रांति के महानायक तात्या टोपे के बांसवाड़ा आगमन ने क्षेत्र में क्रांतिकारी चेतना को नई ऊर्जा दी। वे दो बार बांसवाड़ा आए। दूसरी बार उन्होंने बांसवाड़ा को घेरकर विजय हासिल की। उनके आगमन के बाद क्षेत्र में स्वतंत्रता और प्रतिरोध की भावना मजबूत हुई, जिसका प्रभाव आगे के आंदोलनों में भी दिखाई दिया। इस चेतना से आदिवासी समाज सहित विभिन्न वर्गों के युवा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ते गए।
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शिक्षा और सामाजिक समरसता को बनाया आंदोलन का आधार
सामाजिक समरसता बढ़ाने और आदिवासी समाज के शैक्षणिक विकास के लिए भोगीलाल पंड्या के नेतृत्व में व्यापक प्रयास किए गए। वर्ष 1932 में बाबा लक्ष्मणदास और मदनसिंह तोमर आदि के सहयोग से हरिजन सेवक समिति की स्थापना की गई। वहीं माणिक्यलाल वर्मा ने वागड़ सेवा मंदिर के माध्यम से रात्रि पाठशालाएं संचालित कर हरिजन और आदिवासी समाज को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया। इन रचनात्मक गतिविधियों में गौरीशंकर उपाध्याय, हरिदेव जोशी और बाबा लक्ष्मणदास सहित अनेक कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका रही।
प्रजामंडल ने जनता की आवाज को दी राजनीतिक ताकत
बांसवाड़ा में राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में बाबा लक्ष्मणदास, धूलजी भाई भावसार, चिमनलाल मालोत, मणिशंकर नागर और भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी जैसे नेताओं का योगदान उल्लेखनीय रहा। वर्ष 1930 में चिमनलाल मालोत ने शांत सेवा कुटीर की स्थापना कर राजनीतिक चेतना के प्रसार का कार्य किया। इसके बाद वर्ष 1943 में बांसवाड़ा प्रजामंडल का गठन हुआ। प्रजामंडल ने जनता के अधिकारों और राजनीतिक भागीदारी के लिए आवाज बुलंद की।
सभाओं पर रोक लगी तो सड़कों पर उतरी जनता
तत्कालीन महारावल द्वारा प्रजामंडल की सभाओं पर रोक लगाए जाने के विरोध में नगर में हड़ताल और आंदोलन हुआ। बाद में यह रोक हटाई गई। भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी के मुंबई से बांसवाड़ा आकर राजनीति में सक्रिय होने से प्रजामंडल को और मजबूती मिली।
45 में से 35 सीटों पर प्रजामंडल की जीत
जनता में बढ़ती राजनीतिक जागरूकता को देखते हुए तत्कालीन शासक ने विधानसभा के चुनाव करवाए। प्रजामंडल ने चुनाव में भाग लिया और 45 में से 35 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद गठित उत्तरदायी सरकार में भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी मुख्यमंत्री, मोहनलाल त्रिवेदी विकास मंत्री और नटवरलाल भट्ट राजस्व मंत्री बने, जबकि चतरसिंह जागीरदारों के प्रतिनिधि के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल हुए। हालांकि यह मंत्रिमंडल 18 दिनों तक ही कार्यरत रहा, लेकिन बांसवाड़ा के राजनीतिक इतिहास में इसका विशेष महत्व रहा।
महिलाओं ने भी आंदोलन में बढ़ाया कदम
स्वतंत्रता आंदोलन और प्रजामंडल की गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। शकुंतला देवी और विजया बहन जैसी महिलाओं ने आंदोलन को मजबूती प्रदान की। विजया बहन भावसार के नेतृत्व में प्रजामंडल के सहयोगी संगठन के रूप में महिला मंडल का गठन किया गया।
यह भी पढ़ें: जेन अल्फा के सामने दो दिन बाद प्रशासन झुका, छह मांगों पर बनी सहमति
जनांदोलन में महिलाओं की भी रही बड़ी भूमिका
24 फरवरी 1946 को हुए जनांदोलन में महिलाओं ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई। तत्कालीन रियासत के प्रधानमंत्री मोहनसिंह मेहता के बंगले के घेराव के लिए निकाले गए जुलूस में महिलाओं की मौजूदगी ने साबित किया कि वागड़ की आजादी की लड़ाई केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थी, बल्कि महिलाओं ने भी इसमें कंधे से कंधा मिलाकर योगदान दिया।
वागड़ के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास संघर्ष, बलिदान, सामाजिक जागरण और राजनीतिक चेतना की ऐसी गाथा है, जिसने क्षेत्र की आने वाली पीढ़ियों को अपने अधिकारों, शिक्षा, समानता और सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति जागरूक किया।
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कई सेनानियों ने जगाई आजादी की अलख
बांसवाड़ा की धरती पर गोविंद गुरु, गौरीशंकर उपाध्याय, बाबा लक्ष्मणदास, भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी, धूलजी भाई भावसार, हरिदेव जोशी, नटवरलाल भट्ट, मास्टर सूरजमल, चिमनलाल मालोत, मणिशंकर नागर, मोहनलाल त्रिवेदी, बाबूलाल जौलाना, कन्हैयालाल सेठिया और भंवरलाल निगम जैसे अनेक लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन सेनानियों ने अंग्रेजी शासन का विरोध करते हुए कठिनाइयां सहीं और आजादी के लक्ष्य से पीछे नहीं हटे।
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तात्या टोपे के आगमन से मिली क्रांतिकारी ऊर्जा
1857 की क्रांति के महानायक तात्या टोपे के बांसवाड़ा आगमन ने क्षेत्र में क्रांतिकारी चेतना को नई ऊर्जा दी। वे दो बार बांसवाड़ा आए। दूसरी बार उन्होंने बांसवाड़ा को घेरकर विजय हासिल की। उनके आगमन के बाद क्षेत्र में स्वतंत्रता और प्रतिरोध की भावना मजबूत हुई, जिसका प्रभाव आगे के आंदोलनों में भी दिखाई दिया। इस चेतना से आदिवासी समाज सहित विभिन्न वर्गों के युवा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ते गए।
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शिक्षा और सामाजिक समरसता को बनाया आंदोलन का आधार
सामाजिक समरसता बढ़ाने और आदिवासी समाज के शैक्षणिक विकास के लिए भोगीलाल पंड्या के नेतृत्व में व्यापक प्रयास किए गए। वर्ष 1932 में बाबा लक्ष्मणदास और मदनसिंह तोमर आदि के सहयोग से हरिजन सेवक समिति की स्थापना की गई। वहीं माणिक्यलाल वर्मा ने वागड़ सेवा मंदिर के माध्यम से रात्रि पाठशालाएं संचालित कर हरिजन और आदिवासी समाज को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया। इन रचनात्मक गतिविधियों में गौरीशंकर उपाध्याय, हरिदेव जोशी और बाबा लक्ष्मणदास सहित अनेक कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका रही।
प्रजामंडल ने जनता की आवाज को दी राजनीतिक ताकत
बांसवाड़ा में राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में बाबा लक्ष्मणदास, धूलजी भाई भावसार, चिमनलाल मालोत, मणिशंकर नागर और भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी जैसे नेताओं का योगदान उल्लेखनीय रहा। वर्ष 1930 में चिमनलाल मालोत ने शांत सेवा कुटीर की स्थापना कर राजनीतिक चेतना के प्रसार का कार्य किया। इसके बाद वर्ष 1943 में बांसवाड़ा प्रजामंडल का गठन हुआ। प्रजामंडल ने जनता के अधिकारों और राजनीतिक भागीदारी के लिए आवाज बुलंद की।
सभाओं पर रोक लगी तो सड़कों पर उतरी जनता
तत्कालीन महारावल द्वारा प्रजामंडल की सभाओं पर रोक लगाए जाने के विरोध में नगर में हड़ताल और आंदोलन हुआ। बाद में यह रोक हटाई गई। भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी के मुंबई से बांसवाड़ा आकर राजनीति में सक्रिय होने से प्रजामंडल को और मजबूती मिली।
45 में से 35 सीटों पर प्रजामंडल की जीत
जनता में बढ़ती राजनीतिक जागरूकता को देखते हुए तत्कालीन शासक ने विधानसभा के चुनाव करवाए। प्रजामंडल ने चुनाव में भाग लिया और 45 में से 35 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद गठित उत्तरदायी सरकार में भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी मुख्यमंत्री, मोहनलाल त्रिवेदी विकास मंत्री और नटवरलाल भट्ट राजस्व मंत्री बने, जबकि चतरसिंह जागीरदारों के प्रतिनिधि के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल हुए। हालांकि यह मंत्रिमंडल 18 दिनों तक ही कार्यरत रहा, लेकिन बांसवाड़ा के राजनीतिक इतिहास में इसका विशेष महत्व रहा।
महिलाओं ने भी आंदोलन में बढ़ाया कदम
स्वतंत्रता आंदोलन और प्रजामंडल की गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। शकुंतला देवी और विजया बहन जैसी महिलाओं ने आंदोलन को मजबूती प्रदान की। विजया बहन भावसार के नेतृत्व में प्रजामंडल के सहयोगी संगठन के रूप में महिला मंडल का गठन किया गया।
यह भी पढ़ें: जेन अल्फा के सामने दो दिन बाद प्रशासन झुका, छह मांगों पर बनी सहमति
जनांदोलन में महिलाओं की भी रही बड़ी भूमिका
24 फरवरी 1946 को हुए जनांदोलन में महिलाओं ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई। तत्कालीन रियासत के प्रधानमंत्री मोहनसिंह मेहता के बंगले के घेराव के लिए निकाले गए जुलूस में महिलाओं की मौजूदगी ने साबित किया कि वागड़ की आजादी की लड़ाई केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थी, बल्कि महिलाओं ने भी इसमें कंधे से कंधा मिलाकर योगदान दिया।
वागड़ के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास संघर्ष, बलिदान, सामाजिक जागरण और राजनीतिक चेतना की ऐसी गाथा है, जिसने क्षेत्र की आने वाली पीढ़ियों को अपने अधिकारों, शिक्षा, समानता और सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति जागरूक किया।