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Navratri Day 2: नवरात्रि का दूसरा दिन, जानिए मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप, आराधना मंत्र और पूजा का फल

धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: Vinod Shukla Updated Fri, 20 Mar 2026 05:23 AM IST
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सार

Chaitra Navratri 2026 Day 2 Maa Brahmacharini: 20 मार्च को चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन है। चैत्र शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि पर मां के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान होता है। 

Chaitra Navratri 2026 Day 2 Maa Brahmacharini Worship Significance Mantra and Puja Benefits
चैत्र नवरात्रि मां ब्रह्राचारिणी पूजा महत्व - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

Chaitra Navratri 2026 Day 2 Maa Brahmacharini: नवरात्रि के नौ दिन माँ दुर्गा के नौ दिव्य स्वरूपों की साधना के लिए अत्यंत पावन माने जाते हैं। इन नौ स्वरूपों में दूसरा स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी का है, जो तप, संयम और साधना की साक्षात प्रतीक मानी जाती हैं। ‘ब्रह्म’का अर्थ तपस्या से है और ‘ब्रह्मचारिणी’अर्थात तप का आचरण करने वाली। यह स्वरूप साधक को आत्मसंयम और धैर्य का संदेश देता है।

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तप और साधना की अधिष्ठात्री देवी
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और ज्योतिर्मय माना गया है। वे सादगी और तप की प्रतिमूर्ति हैं। उनके दाहिने हाथ में जपमाला और बाएं हाथ में कमंडल रहता है, जो साधना और त्याग का प्रतीक है। उनका यह स्वरूप यह संकेत देता है कि जीवन में आत्मिक उन्नति के लिए संयम और तप आवश्यक है।
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साधना से जागृत होता स्वाधिष्ठान चक्र
नवरात्रि के दूसरे दिन साधक अपने मन को स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित करते हैं। इस दिन माँ की आराधना से साधक के भीतर तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम जैसे गुणों का विकास होता है। यह साधना व्यक्ति को मानसिक दृढ़ता प्रदान करती है, जिससे वह जीवन के कठिन संघर्षों में भी अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता।

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तपस्या की अद्भुत कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्व जन्म में जब देवी हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुईं, तब देवर्षि नारद के उपदेश से उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की। हजारों वर्षों तक उन्होंने फल, मूल, शाक और अंत में केवल सूखे बेलपत्रों का सेवन किया। बाद में उन्होंने वह भी त्याग दिया और निर्जल व निराहार रहकर कठोर तप किया। इसी कठिन तप के कारण उन्हें ‘ब्रह्मचारिणी’कहा गया।

‘उमा’नाम की उत्पत्ति और देवी की करुणा
कठोर तपस्या के कारण जब देवी का शरीर अत्यंत क्षीण हो गया, तब उनकी माता मेना ने व्याकुल होकर उन्हें पुकारा—‘उ मा’। तभी से देवी का एक नाम ‘उमा’ भी प्रसिद्ध हुआ। उनकी इस अद्भुत तपस्या से तीनों लोकों में हलचल मच गई और देवता, ऋषि-मुनि सभी उनकी प्रशंसा करने लगे।

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पूजा-विधि और आराधना का विधान
माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा में उन्हें पंचामृत से स्नान कराकर सफेद और सुगंधित पुष्प अर्पित किए जाते हैं। अक्षत, कुमकुम और सिंदूर से पूजन कर मिश्री या सफेद मिठाई का भोग लगाया जाता है। कमल या गुड़हल का फूल भी अर्पित करना शुभ माना गया है। इसके पश्चात दीप-धूप से आरती कर, हाथ में पुष्प लेकर ध्यान और प्रार्थना की जाती है।

आराधना मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

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