Mohini Ekadashi Vrat Katha: भगवान विष्णु ने क्यों लिया था मोहिनी अवतार, जानिए संपूर्ण व्रत कथा और पूजा विधि
Mohini Ekadashi Vrat Katha: भगवान विष्णु ने वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर मोहिनी स्वरूप लेकर देवताओं को अमृतपान करवाया था।
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Mohini Ekadashi Vrat Katha: आज 27 अप्रैल को मोहिनी एकादशी है। हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख माह के शुकल पक्ष की एकादशी तिथि पर हर वर्ष मोहिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस माह की एकादशी पर भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना और व्रत रखते हुए इसके हर एक नियमों का पालन किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि पर भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के दौरान मोहिनी रूप धारण किया था, जिसके कारण इसका नाम मोहिनी एकादशी पड़ा। सभी एकादशी में इस मोहिनी एकादशी का विशेष महत्व होता है। आइए जानते हैं इस एकादशी की पौराणिक कथा और महत्व के बारे में।
भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की पौराणिक कथा
हिंदू धर्म में हर एक एकादशी की पौराणिक कथा है। इस में मोहिनी एकादशी भी बहुत ही प्रचलित कथा है। पौराणिक कथा के अनुसार जब सभी देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन चल रहा है था तब उसमें से एक अमृत कलश प्रकट हुआ। तब इस अमृत कलश को पाने और इसका सेवन करने के लिए देवताओं और असुरों के बीच युद्ध होने लगा। लेकिन असुरों की ताकत के आगे देवताओं की ताकत कमजोर होने लगी थी और ये असुरों से जीत नहीं पा रहे थे। तब सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से आग्रह किया और ऐसे में भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके सभी असुरों को अपनी सुंदरता और काया में मोह लिया। फिर भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत पिलाया जिससे देवताओं को अमरत्व की प्राप्ति हुई। वहीं असुरों को खाली हाथ रहना पड़ा। जब ये घटना हुई थी तब वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि थी, इस कारण से हर वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है।
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एकादशी व्रत और पूजन विधि
हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी व्रत रखने से पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है। साथ ही मोक्ष की प्राप्ति होती है और वैकुंठ धाम में स्थान मिलता है। एकादशी पर व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व होता है। एकादशी के दिन सबसे पहले स्नान करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा को सामने रखते हुए घी का दीपक जलाकर व्रत और पूजा का संकल्प लें। इसके बाद कलश स्थापित करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने फल, फूल और और भोग अर्पित करें। इसके बाद भगवान को तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करें। पूजा के दौरान और बाद में मंत्रों का जाप और भजन करें। इसके बाद फलाहार करें। फिर अगले दिन द्वादशी तिथि पर सुबह जल्दी उठकर भगवान की पूजा करें और जरूरतमंदों को दान करें।

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