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Gangaur Festival 2026: गणगौर पूजन शुरू, आठ दिन कच्ची, फिर होगी पक्की गणगौर से शिव-गौरी की पूजा
अनीता जैन ,वास्तुविद
Published by: Vinod Shukla
Updated Thu, 05 Mar 2026 12:00 PM IST
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सार
Gangaur Festival 2026: हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान होता है। चैत्र माह की प्रतिपदा तिथि से गणगौर पूजा की विधि-विधान के साथ पूजा प्रारंभ हो जाती है। इसमें विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और दांपत्य सुख की कामना करती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार “गणगौर” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है गण और गौर। यहां गण का अर्थ भगवान शिव से है, जबकि गौर से आशय माता गौरी यानी पार्वती से है।
- फोटो : adobe stock
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विस्तार
Gangaur Festival 2026: होली के बाद आरंभ होने वाला गणगौर पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। यह पर्व मुख्य रूप से राजस्थान सहित उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि से गणगौर पूजन की शुरुआत हो जाती है। इस दौरान विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और दांपत्य सुख की कामना करती हैं, वहीं कुंवारी कन्याएं योग्य वर की प्राप्ति के लिए माता गौरी की पूजा करती हैं।
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गणगौर का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार “गणगौर” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है गण और गौर। यहां गण का अर्थ भगवान शिव से है, जबकि गौर से आशय माता गौरी यानी पार्वती से है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप और व्रत किया था। उनकी इसी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसलिए गणगौर का पर्व पति-पत्नी के अटूट प्रेम, सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है।
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कच्ची और पक्की गणगौर की परंपरा
गणगौर पूजन की एक विशेष परंपरा कच्ची और पक्की गणगौर की मानी जाती है। होलिका दहन के अगले दिन से ही महिलाएं कच्ची गणगौर की पूजा शुरू कर देती हैं। इस दौरान मिट्टी या होली की भस्म से बने शिव-पार्वती के स्वरूप की पूजा की जाती है। लगभग आठ दिनों तक कच्ची गणगौर की पूजा करने के बाद पक्की गणगौर की स्थापना की जाती है। पक्की गणगौर में शिव और गौरी की सुंदर सजी हुई प्रतिमाओं की विधिपूर्वक पूजा की जाती है और महिलाएं पारंपरिक गीत गाकर उत्सव को उल्लासपूर्वक मनाती हैं।
गणगौर व्रत और पूजा की परंपराएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विवाहित महिलाएं गणगौर का व्रत रखकर माता गौरी से अपने पति की लंबी आयु, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं। वहीं कुंवारी कन्याएं अच्छे और योग्य वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं। इस दौरान महिलाएं प्रतिदिन स्नान के बाद गणगौर की पूजा करती हैं और जल, फूल, कुमकुम, मेहंदी तथा श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं मिट्टी के पात्रों में गेहूं या जौ बोती हैं, जिन्हें जवारे कहा जाता है। इन जवारे को समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान महिलाएं और युवतियां समूह में गणगौर के पारंपरिक गीत गाती हैं और माता गौरी की आराधना करती हैं। कई स्थानों पर गणगौर की शोभायात्राएं भी निकाली जाती हैं, जिनमें शिव-गौरी की प्रतिमाओं को सजा-धजाकर नगर भ्रमण कराया जाता है। यह पर्व समाज में पारिवारिक सुख, सौभाग्य और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजने का संदेश देता है।