{"_id":"69d1f85f140bfab92e02e9b4","slug":"vikata-sankashti-chaturthi-2026-read-this-chaturthi-vrat-katha-to-attract-positivity-and-remove-life-problems-2026-04-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"Vikata Sankashti Chaturthi Katha: वैशाख माह की संकष्टी चतुर्थी पर जरूर पढ़ें यह कथा, मिलेगा गणेशजी का आशीर्वाद","category":{"title":"Religion","title_hn":"धर्म","slug":"religion"}}
Vikata Sankashti Chaturthi Katha: वैशाख माह की संकष्टी चतुर्थी पर जरूर पढ़ें यह कथा, मिलेगा गणेशजी का आशीर्वाद
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: Shweta Singh
Updated Sun, 05 Apr 2026 11:21 AM IST
विज्ञापन
सार
वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के वक्रतुंड स्वरूप की पूजा की जाती है। इस व्रत से जुड़ी दो महत्वपूर्ण पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। आइए इसी क्रम में यहां पढ़ें संकष्टी चतुर्थी की वत कथाएं।
विकट संकष्टी चतुर्थी
- फोटो : amar ujala
विज्ञापन
विस्तार
Vikat Sankashti Chaturthi Katha: आज वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि है। वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के वक्रतुंड स्वरूप की पूजा की जाती है। इस व्रत को एक पवित्र व्रत माना जाता है जो दुखों को दूर करता है। इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने और व्रत का पारण करने की परंपरा है। एक विशेष मान्यता यह भी है कि इस अवसर पर कमल के पत्तों से बना हलवा भोग के रूप में चढ़ाया जाता है। इस व्रत से जुड़ी दो महत्वपूर्ण पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। आइए इसी क्रम में यहां पढ़ें संकष्टी चतुर्थी की वत कथाएं।
Trending Videos
Vikat Sankashti Chaturthi 2026: विकट संकष्टी चतुर्थी आज, यहां जानें पूजा विधि, मुहूर्त, पूजन सामग्री और आरती
विज्ञापन
विज्ञापन
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा- 1
संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में कामासुर नामक एक शक्तिशाली राक्षस ने भगवान शिव की घोर तपस्या की और उनसे अजेय होने का वरदान प्राप्त किया। इस वरदान के कारण वह अत्यंत अहंकारी हो गया और उसने स्वर्ग पर आक्रमण करके देवताओं को बंदी बना लिया। जब देवता संकट में पड़कर भगवान शिव के पास गए, तो उन्होंने देवताओं से कहा कि केवल विघ्नहर्ता गणेश ही कामासुर को पराजित कर सकते हैं।
देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान गणेश ने विकट नामक विशाल और तेजस्वी रूप धारण किया और युद्ध करने के लिए मयूर (मोर) पर सवार होकर चल पड़े। गणेश के इस भयानक रूप को देखकर कामासुर भय से कांप उठा और उनके चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा। गणेश ने उसके अहंकार को चूर कर दिया और देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया। चूंकि इस विजय का दिन वैशाख मास की चतुर्थी तिथि को पड़ा था, इसलिए उस दिन को विकट संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है।
Varuthini Ekadashi: माता एकादशी की पूजा के बिना नहीं पूरा होगा यह व्रत, जानें पूजा विधि, भोग,मंत्र और आरती
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा- 2
दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में रंतिदेव नाम के एक पराक्रमी और यशस्वी राजा थे। वे अपने शत्रुओं का उसी प्रकार नाश कर देते थे जैसे अग्नि घास को जला देती है। उनकी मित्रता यम कुबेर और इंद्र जैसे देवताओं से थी। उनके राज्य में धर्मकेतु नाम के एक ब्राह्मण रहते थे जिनकी दो पत्नियां थीं जिनका नाम सुशीला और चंचला था।
सुशीला भगवान गणेश की सच्ची भक्त थी और हमेशा व्रत उपवास करती रहती थी, जिससे उसका शरीर कमजोर हो गया था। दूसरी ओर चंचला व्रत नहीं करती थी और सुशीला का उपहास करती थी। वह कहती थी कि व्रत करने के बाद भी उसे केवल एक बेटी मिली जबकि उसे पुत्र प्राप्त हुआ है।
एक दिन दुखी होकर सुशीला ने वैशाख संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूरे विधि-विधान से किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी प्रकट हुए और उसे आशीर्वाद दिया कि उसकी पुत्री के मुख से मोती और मूंगा झरेंगे और उसे शीघ्र ही एक गुणवान पुत्र भी मिलेगा। कुछ समय बाद जब सुशीला के जीवन में सुख और समृद्धि आई तो चंचला को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सुशीला से क्षमा मांगी और स्वयं भी इस व्रत को करना शुरू किया। इसके बाद दोनों के जीवन में सुख शांति और समृद्धि बनी रही।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।