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16 संस्कारों में क्या है अन्नप्राशन का महत्व, जानिए क्यों आवश्यक है ये संस्कार
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 18 Feb 2026 04:52 PM IST
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सार
हिंदू धर्म में कुल 16 संस्कारों का विशेष महत्व होता है। जिसमें मनुष्य के जीवन को जन्म से लेकर मृत्यु तक की पवित्र प्रक्रिया होती है। इसमें अन्नपाशन संस्कार का विशेष महत्व होता है।
annaprashan
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारतीय संस्कृति में वर्णित सोलह संस्कार मनुष्य के जीवन को जन्म से लेकर मृत्यु तक शुद्ध, संस्कारित और अनुशासित बनाने की पवित्र प्रक्रिया हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है अन्नप्राशन संस्कार। शिशु के जन्म के छठे या सातवें महीने में शुभ मुहूर्त में मंत्रोच्चारण के साथ उसे पहली बार शुद्ध, सात्विक, हल्का और पौष्टिक अन्न चटाया जाता है। यह केवल अन्न ग्रहण करने की शुरुआत नहीं, बल्कि जीवन में शुद्ध आहार और शुद्ध विचारों के बीजारोपण का आध्यात्मिक अवसर है।
1. सोलह संस्कारों में अन्नप्राशन का महत्व
अन्नप्राशन संस्कार शिशु के जीवन का वह चरण है जब वह माता के दूध के अतिरिक्त पहली बार बाह्य अन्न ग्रहण करता है। यह संस्कार इस भावना को पुष्ट करता है कि जीवन में जो भी ग्रहण किया जाए, वह पवित्र, सात्विक और स्वास्थ्यवर्धक हो। परिवारजन इस अवसर पर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि बालक का जीवन तेजस्वी, स्वस्थ और सद्गुणों से परिपूर्ण हो।
2. अन्न का दार्शनिक और आध्यात्मिक स्वरूप
शास्त्रों में कहा गया है—“अन्नं ब्रह्म।” अन्न को प्राणियों का प्राण माना गया है। भगवद्गीता में उल्लेख मिलता है कि अन्न से ही प्राणी जीवित रहते हैं और अन्न से ही मन की उत्पत्ति होती है। शुद्ध एवं सात्विक अन्न से शरीर स्वस्थ रहता है, मन निर्मल होता है और बुद्धि स्थिर रहती है। जब आहार शुद्ध होता है, तब अंतःकरण भी शुद्ध होता है और सत्वगुण की वृद्धि होती है। स्वस्थ मन ही ईश्वरानुभूति का माध्यम बनता है, इसलिए अन्न का चयन केवल स्वाद के आधार पर नहीं, बल्कि संस्कार और सात्विकता के आधार पर किया जाना चाहिए।
3. तन-मन की शुद्धि का आधार है आहार अन्न
केवल शरीर का पोषण नहीं करता, बल्कि मन, बुद्धि, तेज और चेतना का भी निर्माण करता है। मनुष्य के विचार, भावनाएं और आकांक्षाएं उसके आहार से गहराई से जुड़ी होती हैं। सात्विक भोजन से संयम, करुणा और धैर्य जैसे गुण विकसित होते हैं, जबकि तामसिक भोजन से मन में अशांति और असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। इसी कारण अन्नप्राशन संस्कार के माध्यम से यह संकल्प लिया जाता है कि जीवन में सदैव शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक अन्न को ही ग्रहण किया जाएगा। अन्न को भगवान का कृपा-प्रसाद मानकर ग्रहण करना भारतीय संस्कृति की मूल भावना है।
अन्न का प्रभाव मनुष्य के जीवन और विचारों पर कितना गहरा होता है, इसका उल्लेख महाभारत में मिलता है। बाणों की शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह पांडवों को धर्मोपदेश दे रहे थे। तभी द्रौपदी को हंसी आ गई। कारण पूछने पर द्रौपदी ने कहा कि जब सभा में उसका अपमान हो रहा था, तब वे मौन क्यों रहे? इस पर भीष्म पितामह ने उत्तर दिया कि उस समय वे दुर्योधन का अन्न खाते थे और उसी अन्न से बना रक्त उनके शरीर में प्रवाहित हो रहा था। जैसा दुर्योधन का स्वभाव था, वैसा ही प्रभाव उनके मन और बुद्धि पर पड़ा। किंतु अब अर्जुन के बाणों ने उस पाप के अन्न से बने रक्त को बाहर निकाल दिया है, जिससे उनकी भावनाएं शुद्ध हो गई हैं। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि अन्न का प्रभाव केवल शरीर तक सीमित नहीं, बल्कि विचारों और निर्णयों को भी प्रभावित करता है।
संस्कार यह संदेश देता है—“जैसा अन्न, वैसा मन।” बचपन से ही यदि शुद्ध और सात्विक आहार की आदत डाली जाए, तो जीवन में संतुलन, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति सहज संभव हो जाती है। अन्न ही जीवन धारण करने की शक्ति देता है। इसलिए उसे केवल भोजन नहीं, बल्कि ईश्वर का प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए। यही भावना अन्नप्राशन संस्कार के माध्यम से शिशु के जीवन में स्थापित की जाती है, ताकि उसका तन और मन दोनों पवित्र, स्वस्थ और संस्कारित बन सकें।
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1. सोलह संस्कारों में अन्नप्राशन का महत्व
अन्नप्राशन संस्कार शिशु के जीवन का वह चरण है जब वह माता के दूध के अतिरिक्त पहली बार बाह्य अन्न ग्रहण करता है। यह संस्कार इस भावना को पुष्ट करता है कि जीवन में जो भी ग्रहण किया जाए, वह पवित्र, सात्विक और स्वास्थ्यवर्धक हो। परिवारजन इस अवसर पर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि बालक का जीवन तेजस्वी, स्वस्थ और सद्गुणों से परिपूर्ण हो।
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2. अन्न का दार्शनिक और आध्यात्मिक स्वरूप
शास्त्रों में कहा गया है—“अन्नं ब्रह्म।” अन्न को प्राणियों का प्राण माना गया है। भगवद्गीता में उल्लेख मिलता है कि अन्न से ही प्राणी जीवित रहते हैं और अन्न से ही मन की उत्पत्ति होती है। शुद्ध एवं सात्विक अन्न से शरीर स्वस्थ रहता है, मन निर्मल होता है और बुद्धि स्थिर रहती है। जब आहार शुद्ध होता है, तब अंतःकरण भी शुद्ध होता है और सत्वगुण की वृद्धि होती है। स्वस्थ मन ही ईश्वरानुभूति का माध्यम बनता है, इसलिए अन्न का चयन केवल स्वाद के आधार पर नहीं, बल्कि संस्कार और सात्विकता के आधार पर किया जाना चाहिए।
3. तन-मन की शुद्धि का आधार है आहार अन्न
केवल शरीर का पोषण नहीं करता, बल्कि मन, बुद्धि, तेज और चेतना का भी निर्माण करता है। मनुष्य के विचार, भावनाएं और आकांक्षाएं उसके आहार से गहराई से जुड़ी होती हैं। सात्विक भोजन से संयम, करुणा और धैर्य जैसे गुण विकसित होते हैं, जबकि तामसिक भोजन से मन में अशांति और असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। इसी कारण अन्नप्राशन संस्कार के माध्यम से यह संकल्प लिया जाता है कि जीवन में सदैव शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक अन्न को ही ग्रहण किया जाएगा। अन्न को भगवान का कृपा-प्रसाद मानकर ग्रहण करना भारतीय संस्कृति की मूल भावना है।
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4. महाभारत में अन्न के प्रभाव का प्रसंगअन्न का प्रभाव मनुष्य के जीवन और विचारों पर कितना गहरा होता है, इसका उल्लेख महाभारत में मिलता है। बाणों की शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह पांडवों को धर्मोपदेश दे रहे थे। तभी द्रौपदी को हंसी आ गई। कारण पूछने पर द्रौपदी ने कहा कि जब सभा में उसका अपमान हो रहा था, तब वे मौन क्यों रहे? इस पर भीष्म पितामह ने उत्तर दिया कि उस समय वे दुर्योधन का अन्न खाते थे और उसी अन्न से बना रक्त उनके शरीर में प्रवाहित हो रहा था। जैसा दुर्योधन का स्वभाव था, वैसा ही प्रभाव उनके मन और बुद्धि पर पड़ा। किंतु अब अर्जुन के बाणों ने उस पाप के अन्न से बने रक्त को बाहर निकाल दिया है, जिससे उनकी भावनाएं शुद्ध हो गई हैं। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि अन्न का प्रभाव केवल शरीर तक सीमित नहीं, बल्कि विचारों और निर्णयों को भी प्रभावित करता है।
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5. संस्कारित जीवन का प्रारंभ अन्नप्राशनसंस्कार यह संदेश देता है—“जैसा अन्न, वैसा मन।” बचपन से ही यदि शुद्ध और सात्विक आहार की आदत डाली जाए, तो जीवन में संतुलन, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति सहज संभव हो जाती है। अन्न ही जीवन धारण करने की शक्ति देता है। इसलिए उसे केवल भोजन नहीं, बल्कि ईश्वर का प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए। यही भावना अन्नप्राशन संस्कार के माध्यम से शिशु के जीवन में स्थापित की जाती है, ताकि उसका तन और मन दोनों पवित्र, स्वस्थ और संस्कारित बन सकें।