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मणिपुरः इंफाल में फुटबॉल महज खेल नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी की भाषा है, यहां डूरंड कप का घर जैसा लगना स्वाभाविक
सार
एक नजर में डूरंड कप 2026
- संस्करण: 135वां
- शुरुआत: 25 जुलाई, कोलकाता
- कुल टीमें: 24
- मेजबान शहर: पांच
- फाइनल: 23 अगस्त, कोलकाता
- इंफाल चरण: 28 जुलाई से 12 अगस्त
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डूरंड कप 2026
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
इंफाल के खुमान लंपक मुख्य स्टेडियम की फ्लडलाइटें अभी जली भी नहीं हैं, लेकिन शहर के दर्जनों दूसरे हिस्सों में दिन का खेल शुरू हो चुका है। मोहल्लों के छोटे मैदानों, स्कूल परिसरों और घरों के बीच बची जमीन पर सुबह के मुकाबले शुरू हो जाते हैं। बच्चे लगातार इस्तेमाल से अपनी गोलाई खो चुकी गेंद के पीछे दौड़ते हैं। किशोर स्कूल की घंटी बजने से पहले खेल के लिए कुछ समय चुरा लेते हैं। एक गली और दूसरी गली की पुरानी प्रतिद्वंद्विता मैदान पर लौट आती है। दर्शकों में माताएं, दुकानदार और राह चलते लोग होते हैं। भारतीय खेल जगत में अब ऐसे बहुत कम स्थान बचे हैं, जहां फुटबॉल इस तरह रोजमर्रा की जिंदगी में घुला हुआ हो। यहां फुटबॉल सिर्फ देखा नहीं जाता, बोला भी जाता है—एक भाषा की तरह। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह विरासत अपने आप पहुंचती रहती है।
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डूरंड कप 2026
- फोटो : amar ujala
मणिपुर में फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं
मोहल्लों के मैदानों से लेकर स्कूल परिसरों तक फुटबॉल मणिपुर के सामाजिक जीवन का हिस्सा है। स्थानीय मुकाबलों में उमड़ने वाली भीड़ और खिलाड़ियों के प्रति लोगों का जुनून इसका प्रमाण है। यहां किसी बच्चे के लिए राष्ट्रीय टीम तक पहुंचना दूर का सपना नहीं लगता। उसे लगता है कि जिस रास्ते पर उसके आदर्श खिलाड़ी चले हैं, वह रास्ता उसके सामने भी खुला है। यही विरासत मणिपुर को देश की बड़ी खेल प्रतिभा-भूमियों में शामिल करती है। ओइनम बेमबेम देवी ने भारतीय महिला फुटबॉल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। फीफा अंडर-17 विश्व कप में जीकसन सिंह का हेडर मणिपुर की खेल स्मृतियों का हिस्सा बन चुका है। नोरेम महेश सिंह उस लंबी होती सूची का नया नाम हैं।
नेरोका एफसी और ट्राउ एफसी जैसे क्लबों ने भी साबित किया है कि मणिपुर की फुटबॉल पहचान केवल व्यक्तिगत प्रतिभाओं पर निर्भर नहीं है। इसके पीछे एक मजबूत फुटबॉल संस्कृति और पूरा तंत्र मौजूद है। ऐसे राज्य में एक सदी से अधिक समय से भारतीय फुटबॉल की कहानी का हिस्सा रहे डूरंड कप का पहुंचना स्वाभाविक ही था। डूरंड कप सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि एक संस्था है। भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा आयोजित एशिया की सबसे पुरानी फुटबॉल प्रतियोगिता 1888 से अब तक समय के साथ बदलती रही, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी रही। सर्विसेज की टीमें आज भी बड़े शहरों के क्लबों और उभरती प्रतिभाओं के साथ मैदान में उतरती हैं। कई पीढ़ियों के खिलाड़ियों ने इसे अपनी प्रतिभा साबित करने के मंच के रूप में इस्तेमाल किया है। इसलिए जब 2022 में पहली बार डूरंड कप इम्फाल पहुंचा तो ऐसा नहीं लगा कि कोई नया शहर इस प्रतियोगिता से परिचित हो रहा है। ऐसा लगा, जैसे डूरंड कप अपने घर लौट आया हो।
मोहल्लों के मैदानों से लेकर स्कूल परिसरों तक फुटबॉल मणिपुर के सामाजिक जीवन का हिस्सा है। स्थानीय मुकाबलों में उमड़ने वाली भीड़ और खिलाड़ियों के प्रति लोगों का जुनून इसका प्रमाण है। यहां किसी बच्चे के लिए राष्ट्रीय टीम तक पहुंचना दूर का सपना नहीं लगता। उसे लगता है कि जिस रास्ते पर उसके आदर्श खिलाड़ी चले हैं, वह रास्ता उसके सामने भी खुला है। यही विरासत मणिपुर को देश की बड़ी खेल प्रतिभा-भूमियों में शामिल करती है। ओइनम बेमबेम देवी ने भारतीय महिला फुटबॉल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। फीफा अंडर-17 विश्व कप में जीकसन सिंह का हेडर मणिपुर की खेल स्मृतियों का हिस्सा बन चुका है। नोरेम महेश सिंह उस लंबी होती सूची का नया नाम हैं।
नेरोका एफसी और ट्राउ एफसी जैसे क्लबों ने भी साबित किया है कि मणिपुर की फुटबॉल पहचान केवल व्यक्तिगत प्रतिभाओं पर निर्भर नहीं है। इसके पीछे एक मजबूत फुटबॉल संस्कृति और पूरा तंत्र मौजूद है। ऐसे राज्य में एक सदी से अधिक समय से भारतीय फुटबॉल की कहानी का हिस्सा रहे डूरंड कप का पहुंचना स्वाभाविक ही था। डूरंड कप सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि एक संस्था है। भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा आयोजित एशिया की सबसे पुरानी फुटबॉल प्रतियोगिता 1888 से अब तक समय के साथ बदलती रही, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी रही। सर्विसेज की टीमें आज भी बड़े शहरों के क्लबों और उभरती प्रतिभाओं के साथ मैदान में उतरती हैं। कई पीढ़ियों के खिलाड़ियों ने इसे अपनी प्रतिभा साबित करने के मंच के रूप में इस्तेमाल किया है। इसलिए जब 2022 में पहली बार डूरंड कप इम्फाल पहुंचा तो ऐसा नहीं लगा कि कोई नया शहर इस प्रतियोगिता से परिचित हो रहा है। ऐसा लगा, जैसे डूरंड कप अपने घर लौट आया हो।
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डूरंड कप 2026
- फोटो : amar ujala
2022 में डूरंड कप की 'घर वापसी'
डूरंड कप पहली बार 2022 में इम्फाल पहुंचा। नेरोका एफसी और ट्राउ एफसी के बीच इम्फाल डर्बी से प्रतियोगिता और शहर का रिश्ता शुरू हुआ। मुकाबले से पहले आधे दिन का अवकाश और स्टेडियम में उमड़ी भीड़ ने बता दिया कि डूरंड कप को यहां सिर्फ एक फुटबॉल प्रतियोगिता की तरह नहीं देखा जाता। खुमान लंपक देखते ही देखते इस ऐतिहासिक टूर्नामेंट के प्रमुख केंद्रों में शामिल हो गया। मुकाबले से काफी पहले दर्शक खुमान लंपक की ओर उमड़ने लगे। दोनों टीमें मैदान में उतरीं तो स्टेडियम रंगों और शोर से भर चुका था। हर टैकल पर गूंजता शोर, हर हमले के साथ आगे झुकती भीड़ और पूरे स्टेडियम में घूमती मानव-श्रृंखला ने साफ कर दिया कि यहां फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं, सामूहिक भावना है। इसके बाद हर संस्करण में खुमान लंपक की कहानी लगभग दोहराई जाती रही। यहां दर्शक सिर्फ खेल देखते नहीं, उसे समझते भी हैं।
सही समय पर किया गया टैकल हो या खिलाड़ियों के बीच से निकलता शानदार पास—दर्शकों की प्रतिक्रिया बता देती है कि वे खेल को कितनी गहराई से समझते हैं। बाहर से आने वाली टीमों को यहां माहौल बनाने की जरूरत नहीं पड़ती। वे मैदान पर पहुंचती हैं और माहौल पहले से उनका इंतजार कर रहा होता है। अब 135वें वर्ष में पहुंच चुका डूरंड कप 2026 में 24 टीमों के साथ पांच शहरों में खेला जा रहा है। 25 जुलाई को कोलकाता से शुरू हुआ यह सफर 23 अगस्त को फाइनल के साथ फिर कोलकाता पहुंचेगा। मौजूदा चैंपियन नॉर्थईस्ट यूनाइटेड है। इस बीच खुमान लंपक एक बार फिर प्रतियोगिता का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा।
इस बार इम्फाल में, चार टीमें, चारों ओर फुटबॉल का जुनून
डूरंड कप के ग्रुप डी में ट्राउ एफसी, नेरोका एफसी, एफसी रेंगदाई और इंडियन नेवी एफटी शामिल हैं। इम्फाल चरण 28 जुलाई से शुरू होगा। शुरुआत ट्राउ एफसी और नेरोका एफसी के बीच इम्फाल डर्बी से होगी, जबकि स्थानीय चरण का समापन 12 अगस्त को नेरोका एफसी और एफसी रेंगदाई के मुकाबले से होगा। ग्रुप डी में मुकाबले सिर्फ रणनीति और अंक तालिका के लिए नहीं होंगे। भूगोल और पुरानी प्रतिद्वंद्विताएं भी अपना असर डालेंगी। हर जीत का मतलब तीन अंक से कहीं ज्यादा होगा और हर हार का असर मैदान से बाहर भी महसूस किया जाएगा। 2022 में पहली आधिकारिक डर्बी में नेरोका ने 3-1 से जीत दर्ज की थी। इसके बाद दोनों टीमों के बीच मुकाबले लगातार रोमांचक रहे हैं। पिछले साल 10 खिलाड़ियों के साथ खेलने के बावजूद ट्राउ लगभग आखिरी क्षण तक नेरोका को रोकने में सफल रहा, लेकिन इंजरी टाइम में अरुणकुमार सिंह के हेडर ने मुकाबला बराबरी पर ला दिया।
इम्फाल डर्बी क्यों खास?
दोनों टीमों का मुकाबला अब इम्फाल की फुटबॉल पहचान का हिस्सा बन चुका है। 28 जुलाई का मैच एक बार फिर खुमान लंपक को फुटबॉल के रंग में रंगने के लिए तैयार है। यहां मुकाबला केवल 90 मिनट का खेल नहीं होगा, बल्कि शहर की पुरानी फुटबॉल प्रतिद्वंद्विता और प्रतिष्ठा का सवाल भी होगा। मणिपुर के लिए हालांकि दांव केवल अंक तालिका का नहीं है। हर मुकाबला उस फुटबॉल संस्कृति का उत्सव है, जो स्कूलों, स्थानीय क्लबों और मोहल्लों के मैदानों में सांस लेती है। स्टैंड में बैठे बच्चों के लिए यह देखना किसी सपने से कम नहीं कि जिन खिलाड़ियों को वे मैदान पर देख रहे हैं, वे कभी उन्हीं की तरह किसी छोटे से मैदान पर गेंद के पीछे दौड़ा करते थे। शायद डूरंड कप का सबसे स्थायी योगदान भी यही है—ट्रॉफी से आगे बढ़कर युवा खिलाड़ियों के लिए दरवाजे खोलना और उस फुटबॉल संस्कृति को मंच देना, जिसे अपनी पहचान साबित करने के लिए किसी बाहरी प्रमाण की जरूरत नहीं। डूरंड कप कुछ सप्ताह के लिए इम्फाल में रहेगा। लेकिन फुटबॉल यहां हमेशा रहेगा—स्कूलों में, स्थानीय क्लबों में और उन छोटे मैदानों में, जहां हर सुबह कोई न कोई बच्चा गेंद के पीछे दौड़ता दिखाई देता है। इसलिए जब खुमान लंपक एक बार फिर दर्शकों से भर जाएगा, तो यह याद दिलाएगा कि डूरंड कप को यहां कोई नया घर नहीं मिला है। वह बस उस जगह लौट आया है, जहां से फुटबॉल कभी गया ही नहीं था।
डूरंड कप पहली बार 2022 में इम्फाल पहुंचा। नेरोका एफसी और ट्राउ एफसी के बीच इम्फाल डर्बी से प्रतियोगिता और शहर का रिश्ता शुरू हुआ। मुकाबले से पहले आधे दिन का अवकाश और स्टेडियम में उमड़ी भीड़ ने बता दिया कि डूरंड कप को यहां सिर्फ एक फुटबॉल प्रतियोगिता की तरह नहीं देखा जाता। खुमान लंपक देखते ही देखते इस ऐतिहासिक टूर्नामेंट के प्रमुख केंद्रों में शामिल हो गया। मुकाबले से काफी पहले दर्शक खुमान लंपक की ओर उमड़ने लगे। दोनों टीमें मैदान में उतरीं तो स्टेडियम रंगों और शोर से भर चुका था। हर टैकल पर गूंजता शोर, हर हमले के साथ आगे झुकती भीड़ और पूरे स्टेडियम में घूमती मानव-श्रृंखला ने साफ कर दिया कि यहां फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं, सामूहिक भावना है। इसके बाद हर संस्करण में खुमान लंपक की कहानी लगभग दोहराई जाती रही। यहां दर्शक सिर्फ खेल देखते नहीं, उसे समझते भी हैं।
सही समय पर किया गया टैकल हो या खिलाड़ियों के बीच से निकलता शानदार पास—दर्शकों की प्रतिक्रिया बता देती है कि वे खेल को कितनी गहराई से समझते हैं। बाहर से आने वाली टीमों को यहां माहौल बनाने की जरूरत नहीं पड़ती। वे मैदान पर पहुंचती हैं और माहौल पहले से उनका इंतजार कर रहा होता है। अब 135वें वर्ष में पहुंच चुका डूरंड कप 2026 में 24 टीमों के साथ पांच शहरों में खेला जा रहा है। 25 जुलाई को कोलकाता से शुरू हुआ यह सफर 23 अगस्त को फाइनल के साथ फिर कोलकाता पहुंचेगा। मौजूदा चैंपियन नॉर्थईस्ट यूनाइटेड है। इस बीच खुमान लंपक एक बार फिर प्रतियोगिता का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा।
इस बार इम्फाल में, चार टीमें, चारों ओर फुटबॉल का जुनून
डूरंड कप के ग्रुप डी में ट्राउ एफसी, नेरोका एफसी, एफसी रेंगदाई और इंडियन नेवी एफटी शामिल हैं। इम्फाल चरण 28 जुलाई से शुरू होगा। शुरुआत ट्राउ एफसी और नेरोका एफसी के बीच इम्फाल डर्बी से होगी, जबकि स्थानीय चरण का समापन 12 अगस्त को नेरोका एफसी और एफसी रेंगदाई के मुकाबले से होगा। ग्रुप डी में मुकाबले सिर्फ रणनीति और अंक तालिका के लिए नहीं होंगे। भूगोल और पुरानी प्रतिद्वंद्विताएं भी अपना असर डालेंगी। हर जीत का मतलब तीन अंक से कहीं ज्यादा होगा और हर हार का असर मैदान से बाहर भी महसूस किया जाएगा। 2022 में पहली आधिकारिक डर्बी में नेरोका ने 3-1 से जीत दर्ज की थी। इसके बाद दोनों टीमों के बीच मुकाबले लगातार रोमांचक रहे हैं। पिछले साल 10 खिलाड़ियों के साथ खेलने के बावजूद ट्राउ लगभग आखिरी क्षण तक नेरोका को रोकने में सफल रहा, लेकिन इंजरी टाइम में अरुणकुमार सिंह के हेडर ने मुकाबला बराबरी पर ला दिया।
इम्फाल डर्बी क्यों खास?
दोनों टीमों का मुकाबला अब इम्फाल की फुटबॉल पहचान का हिस्सा बन चुका है। 28 जुलाई का मैच एक बार फिर खुमान लंपक को फुटबॉल के रंग में रंगने के लिए तैयार है। यहां मुकाबला केवल 90 मिनट का खेल नहीं होगा, बल्कि शहर की पुरानी फुटबॉल प्रतिद्वंद्विता और प्रतिष्ठा का सवाल भी होगा। मणिपुर के लिए हालांकि दांव केवल अंक तालिका का नहीं है। हर मुकाबला उस फुटबॉल संस्कृति का उत्सव है, जो स्कूलों, स्थानीय क्लबों और मोहल्लों के मैदानों में सांस लेती है। स्टैंड में बैठे बच्चों के लिए यह देखना किसी सपने से कम नहीं कि जिन खिलाड़ियों को वे मैदान पर देख रहे हैं, वे कभी उन्हीं की तरह किसी छोटे से मैदान पर गेंद के पीछे दौड़ा करते थे। शायद डूरंड कप का सबसे स्थायी योगदान भी यही है—ट्रॉफी से आगे बढ़कर युवा खिलाड़ियों के लिए दरवाजे खोलना और उस फुटबॉल संस्कृति को मंच देना, जिसे अपनी पहचान साबित करने के लिए किसी बाहरी प्रमाण की जरूरत नहीं। डूरंड कप कुछ सप्ताह के लिए इम्फाल में रहेगा। लेकिन फुटबॉल यहां हमेशा रहेगा—स्कूलों में, स्थानीय क्लबों में और उन छोटे मैदानों में, जहां हर सुबह कोई न कोई बच्चा गेंद के पीछे दौड़ता दिखाई देता है। इसलिए जब खुमान लंपक एक बार फिर दर्शकों से भर जाएगा, तो यह याद दिलाएगा कि डूरंड कप को यहां कोई नया घर नहीं मिला है। वह बस उस जगह लौट आया है, जहां से फुटबॉल कभी गया ही नहीं था।