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Age Verification: सोशल मीडिया कंपनियां क्यों मांग रही हैं बच्चों का आईडी, क्या प्राइवेसी को है खतरा?

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Jagriti Updated Fri, 17 Apr 2026 04:41 PM IST
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सार

Age verification laws: दुनियाभर में इंटरनेट पर उम्र की पुष्टि को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। कई देश बच्चों को ऑनलाइन खतरनाक कंटेंट से बचाने के लिए Age Verification अनिवार्य करने की कोशिश कर रहे हैं, कई ने तो लागू भी कर दिया है। ऐसे में अब इससे बड़ो की निजता पर सवाल उठ रहे हैं? इस लेख में जानिए क्या यह वयस्कों की निजिता के लिए खतरा खड़े कर रहा है...
 

Age Verification Laws: Child Safety or Privacy Threat?
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : adobe stock
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विस्तार

Digital privacy concerns: इंटरनेट अब सिर्फ जानकारी का माध्यम नहीं रहा, बल्कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। ऐसे में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सरकारें और टेक कंपनियां लगातार नए कदम उठा रही हैं। इन्हीं के बीच अब उम्र सत्यापन को अनिवार्य बनाने की बहस तेज हो गई है। कुछ लोगों का मानना है कि उम्र सत्यापन से बड़ो की निजता पर असर पड़ सकता है। इस लेख में जानिए उम्र सत्यापन क्या है? यह कैसे होता है? यह किन देशों में लागू हो चुका है और इसकी जरूरत क्यों पड़ रही है?
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Age confirmation technology: उम्र सत्यापन क्या है?
उम्र सत्यापन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें वेबसाइट या एप यह सुनिश्चित करती है कि यूजर की उम्र क्या है और उसी आधार पर उसे कंटेंट दिखाया जाता है। ये बच्चों को अश्लील या हानिकारक कंटेंट दिखाने से बचाता है और सोशल मीडिया पर सुरक्षा प्रदान करता है। इसी दिशा में कई देशों ने कदम उठाया है। अमेरिका में किड्स इंटरनेट एंड डिजिटल सेफ्टी एक्ट जैसे कानून प्रस्तावित किए हैं, जिन्हें दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों का समर्थन मिल रहा है।
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उम्र सत्यापन की जरूरत क्यों पड़ी?
इंटरनेट पर बच्चों की बढ़ती पहुंच और उन तक पहुंच रहे हानिकारक सामग्री जैसे अश्लील कंटेंट, हिंसक वीडियो या जुए वाली साइट ने सरकारों और पैरेंट्कोस को चिंतित कर दिया है। ऐसे में बच्चों को ऐसी सामग्री से बचाने के लिए, जो उनके मानसिक विकास के लिए सही नहीं है के लिए उम्र सत्यापन की जरूरत पड़ी। साथ ही, बच्चों को ऑनलाइन बुलिंग और साइबर अपराधियों से सुरक्षित रखने के लिए भी इसे जरूरी माना जा रहा है।

यह कैसे होता है?
कंपनियां उम्र की पुष्टि के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल करती हैं, जैसे:
  • सरकारी आईडी: यूजर को अपना आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या पासपोर्ट अपलोड करना पड़ता है।
  • बायोमेट्रिक स्कैन: एआई-आधारित फेशियल स्कैन तकनीक का उपयोग करके चेहरे की बनावट से उम्र का अंदाजा लगाया जाता है।
  • क्रेडिट कार्ड: कई जगहों पर कार्ड्स के माध्यम से भी उम्र की पुष्टि होती है, क्योंकि आमतौर पर कार्ड धारक वयस्क ही होते हैँ।
  • थर्ड-पार्टी वेरिफिकेशन: वेबसाइट्स एक अलग सर्विस का उपयोग करती हैं जो यूजर की पहचान का मिलान सरकारी रिकॉर्ड से करती है।
कहां-कहां लागू है और किन देशों में चर्चा है?
कई बड़े देशों में उम्र सत्यापन लागू हो गया है, लेकिन कुछ देश ऐसे भी हैं, जो यह नियम लागू करने की तैयारी में है। लागू देशों में ऑस्टेलिया, अमेरिका जैसे देश शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का कानून पास हो चुका है।
अमेरिका: यहां कई राज्यों में अश्लील साइट्स और सोशल मीडिया के लिए उम्र की पुष्टि को लेकर कानून पारित किए जा रहे हैं।
यूरोपीय देश और यूके: यहां ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट जैसे कानूनों के तहत उम्र की पुष्टि की व्यवस्था पर काम चल रहा है।
भारत: भारत में भी डेटा संरक्षण कानून और डिजिटल सुरक्षा को लेकर उम्र की पुष्टि पर चर्चा जारी है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि वो दिन दूर नहीं, जब भारत में भी उम्र सत्यापन जैसे नियम लागू हो सकते हैं।

तो क्या एज वेरिफिकेशन से प्राइवेसी पर खतरा?
बच्चों की सुरक्षा के लिए तो यह एक सही कदम माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि इससे काफी हद तक बच्चें हानिकारक ऑनलाइन कंटेंट से बच सकेंगे, लेकिन इसी के साथ वयस्कों की निजिता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं या उम्र की पुष्टि का सिस्टम सुरक्षा के नाम पर उनकी भी निजता (Privacy) के लिए बड़ा खतरा पैदा हो रहा है। जैसे:
  • डेटा लीक का जोखिम: उम्र साबित करने के लिए दी गई सरकारी आईडी या बायोमेट्रिक डेटा कंपनियों के सर्वर पर जमा हो जाता है। अगर इन कंपनियों का डेटा हैक हुआ, तो करोड़ों लोगों के निजी दस्तावेज साइबर अपराधियों के हाथ लग सकते हैं।
  • स्थायी पहचान का खतरा: बायोमेट्रिक डेटा (जैसे चेहरे का स्कैन) को बदला नहीं जा सकता। एक बार यह डेटा लीक हो गया, तो इसका दुरुपयोग कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है।
  • निगरानी और गुमनामी का अंत: इंटरनेट का एक बड़ा लाभ यह भी है कि आप अपनी पहचान छुपाकर जानकारी खोज सकते हैं। उम्र की पुष्टि हर कदम पर आपकी पहचान को आपकी गतिविधियों से जोड़ देती है, जिससे सरकारें और कंपनियां आपकी हर ऑनलाइन हरकत पर नजर रख सकती हैं।
  • थर्ड-पार्टी पर निर्भरता: ज्यादातर वेबसाइट्स पुष्टि के लिए बाहर की छोटी कंपनियों की सेवाएं लेती हैं, जिनकी सुरक्षा नीतियां स्पष्ट नहीं होतीं, जिससे डेटा चोरी होने का डर और बढ़ जाता है।
यानी की एक तरफ जहां उम्र सत्यापन बच्चों की सुरक्षा बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह यूजर्स की निजी जानकारी और डिजिटल स्वतंत्रता के लिए खतरा भी बन सकता है।

Social media age restriction: डेटा लीक की समस्याओं में भी इजाफा
इसके अलावा आजकल डेटा लीक की घटनाएं आम हो गई हैं। कई मामलों में हजारों यूजर्स के पहचान पत्र और निजी जानकारी लीक हो चुकी है। इसी वजह से कुछ प्लेटफॉर्म्स ने अपने Age Verification सिस्टम को लागू करने से पीछे हटने का फैसला भी लिया।

Mandatory age verification debate: टेक कंपनियों का क्या तर्क है?
बड़ी टेक कंपनियां भी इस चुनौती को स्वीकार कर रही हैं। मेटा प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम का कहना है कि ऑनलाइन उम्र पहचानना पूरी इंडस्ट्री के लिए एक मुश्किल काम माना जा रहा है। वहीं, यूट्यूब लगातार टीन्स के लिए नए सेफ्टी फीचर्स जोड़ रहा है। कंपनियों का मानना है कि पेरेंटल कंट्रोल और एप स्टोर लेवल पर वेरिफिकेशन ज्यादा प्रभावी और सुरक्षित विकल्प हो सकते हैं।


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