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काम की बात: भारत में गोल तो अमेरिका में चपटे क्यों होते हैं प्लग के पिन? ये है इसके पीछे की असली वजह
Mon, 31 Aug 2026 03:25 PM IST
नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Mon, 31 Aug 2026 03:25 PM IST
सार
भारत में इस्तेमाल होने वाले प्लग के पिन गोल होते हैं, जबकि अमेरिका और जापान जैसे देशों में चपटे पिन का चलन है। जब तार के अंदर दौड़ने वाली बिजली एक है तो फिर अलग-अलग तरह के प्लग क्यों बनाए गए? आइए जानते हैं...
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जानिए प्लग के पिन अलग-अलग क्यों होते हैं।
- फोटो : अमेजॉन
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विस्तार
हम हर दिन मोबाइल चार्जर, टीवी, फ्रिज या लैपटॉप का प्लग बिजली के बोर्ड में लगाते हैं, लेकिन शायद ही कभी इसके डिजाइन पर गौर करते हैं। भारत में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले प्लग की पिन गोल (Round) होती हैं। लेकिन अगर आप अमेरिका या जापान जाएं, तो वहां आपको चपटे (Flat) पिन वाले प्लग ही देखने को मिलेंगे। आखिर एक ही तरह के बिजली उपकरणों के लिए अलग-अलग देशों में अलग-अलग प्लग की जरूरत क्यों पड़ती है? आइए इस अंतर के पीछे के रहस्य को समझने की कोशिश करते हैं।
बिजली के शुरुआती दौर से जुड़ा है कारण
इस अंतर की कहानी बिजली के घरेलू इस्तेमाल के शुरुआती दौर से शुरू होती है। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में जब घरों और दफ्तरों तक बिजली पहुंचने लगी, तब प्लग और सॉकेट का कोई वैश्विक मानक तय नहीं था।
अलग-अलग कंपनियों और देशों ने अपनी जरूरत के हिसाब से बिजली की व्यवस्था और उपकरण तैयार किए। धीरे-धीरे इन्हीं प्रणालियों के आधार पर घरों में वायरिंग और सॉकेट लगाए गए। जब तक दुनिया एक साझा नियम बनाने पर विचार करती, तब तक करोड़ों घरों में वायरिंग हो चुकी थी। इतने बड़े बुनियादी ढांचे को एक साथ बदलना लगभग असंभव था, इसलिए हर देश ने अपना अलग-अलग प्लग सिस्टम अपना लिया।
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भारत में गोल पिन का ब्रिटिश कनेक्शन
भारत में इस्तेमाल होने वाले गोल पिन वाले प्लग को तकनीकी भाषा में Type D और Type M कहा जाता है। इसका सीधा कनेक्शन ब्रिटिश हुकूमत से है। भारत का शुरुआती बिजली ग्रिड अंग्रेजों ने तैयार किया था और उस समय उन्होंने ब्रिटिश मानक 'BS 546' को लागू किया था। आजादी के बाद भी भारत ने इसी सिस्टम को बनाए रखा क्योंकि हमारी वायरिंग और ग्रिड उसी हिसाब से ढल चुके थे। दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटेन ने 1947 के बाद अपने यहां चपटे आकार वाले Type G प्लग अपना लिए, लेकिन भारत ने अपने पुराने गोल प्लग सिस्टम को ही जारी रखा।
वोल्टेज और सुरक्षा भी है अहम वजह
भारत और अमेरिका के प्लग में अंतर का सबसे बड़ा कारण वोल्टेज (Voltage) है। भारत और यूरोप में बिजली की सप्लाई 220-240V पर होती है, जो काफी अधिक है। हाई वोल्टेज में बिजली के झटके का खतरा ज्यादा होता है। गोल पिन वाले प्लग इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि उंगली आसानी से सॉकेट के अंदर जाकर लाइव पिन से न टकराए। साथ ही, भारतीय 3-पिन प्लग में सबसे ऊपरी अर्थिंग (Earthing) पिन लंबी और मोटी होती है, ताकि मुख्य करंट चालू होने से पहले डिवाइस को सुरक्षित अर्थिंग मिल जाए।
दूसरी तरफ, अमेरिका और जापान में बिजली की सप्लाई 110-120V पर होती है। कम वोल्टेज पर उपकरणों को एक समान पावर देने के लिए ज्यादा करंट (Current) की जरूरत होती है। चपटे पिन (Flat pins) ज्यादा जगह (सरफेस एरिया) कवर करते हैं, जिससे भारी मात्रा में करंट बिना किसी खतरे के आसानी से प्रवाहित हो जाता है। इसके अलावा अमेरिकी प्लग में अक्सर एक पिन दूसरी से चौड़ी होती है, ताकि प्लग केवल सही दिशा में ही सॉकेट के अंदर जा सके।
यही कारण है कि यह सिर्फ एक डिजाइन नहीं, बल्कि देशों के अपने-अपने सुरक्षा मानकों और ऐतिहासिक बुनियादी ढांचे का नतीजा है, और इसी वजह से विदेश यात्रा करते समय आपको एक यूनिवर्सल ट्रैवल अडैप्टर की सख्त जरूरत पड़ती है।
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बिजली के शुरुआती दौर से जुड़ा है कारण
इस अंतर की कहानी बिजली के घरेलू इस्तेमाल के शुरुआती दौर से शुरू होती है। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में जब घरों और दफ्तरों तक बिजली पहुंचने लगी, तब प्लग और सॉकेट का कोई वैश्विक मानक तय नहीं था।
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अलग-अलग कंपनियों और देशों ने अपनी जरूरत के हिसाब से बिजली की व्यवस्था और उपकरण तैयार किए। धीरे-धीरे इन्हीं प्रणालियों के आधार पर घरों में वायरिंग और सॉकेट लगाए गए। जब तक दुनिया एक साझा नियम बनाने पर विचार करती, तब तक करोड़ों घरों में वायरिंग हो चुकी थी। इतने बड़े बुनियादी ढांचे को एक साथ बदलना लगभग असंभव था, इसलिए हर देश ने अपना अलग-अलग प्लग सिस्टम अपना लिया।
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भारत में गोल पिन का ब्रिटिश कनेक्शन
भारत में इस्तेमाल होने वाले गोल पिन वाले प्लग को तकनीकी भाषा में Type D और Type M कहा जाता है। इसका सीधा कनेक्शन ब्रिटिश हुकूमत से है। भारत का शुरुआती बिजली ग्रिड अंग्रेजों ने तैयार किया था और उस समय उन्होंने ब्रिटिश मानक 'BS 546' को लागू किया था। आजादी के बाद भी भारत ने इसी सिस्टम को बनाए रखा क्योंकि हमारी वायरिंग और ग्रिड उसी हिसाब से ढल चुके थे। दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटेन ने 1947 के बाद अपने यहां चपटे आकार वाले Type G प्लग अपना लिए, लेकिन भारत ने अपने पुराने गोल प्लग सिस्टम को ही जारी रखा।
वोल्टेज और सुरक्षा भी है अहम वजह
भारत और अमेरिका के प्लग में अंतर का सबसे बड़ा कारण वोल्टेज (Voltage) है। भारत और यूरोप में बिजली की सप्लाई 220-240V पर होती है, जो काफी अधिक है। हाई वोल्टेज में बिजली के झटके का खतरा ज्यादा होता है। गोल पिन वाले प्लग इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि उंगली आसानी से सॉकेट के अंदर जाकर लाइव पिन से न टकराए। साथ ही, भारतीय 3-पिन प्लग में सबसे ऊपरी अर्थिंग (Earthing) पिन लंबी और मोटी होती है, ताकि मुख्य करंट चालू होने से पहले डिवाइस को सुरक्षित अर्थिंग मिल जाए।
दूसरी तरफ, अमेरिका और जापान में बिजली की सप्लाई 110-120V पर होती है। कम वोल्टेज पर उपकरणों को एक समान पावर देने के लिए ज्यादा करंट (Current) की जरूरत होती है। चपटे पिन (Flat pins) ज्यादा जगह (सरफेस एरिया) कवर करते हैं, जिससे भारी मात्रा में करंट बिना किसी खतरे के आसानी से प्रवाहित हो जाता है। इसके अलावा अमेरिकी प्लग में अक्सर एक पिन दूसरी से चौड़ी होती है, ताकि प्लग केवल सही दिशा में ही सॉकेट के अंदर जा सके।
यही कारण है कि यह सिर्फ एक डिजाइन नहीं, बल्कि देशों के अपने-अपने सुरक्षा मानकों और ऐतिहासिक बुनियादी ढांचे का नतीजा है, और इसी वजह से विदेश यात्रा करते समय आपको एक यूनिवर्सल ट्रैवल अडैप्टर की सख्त जरूरत पड़ती है।