सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर कहा, "किसी ने सही कहा है कि वे एक नकली संत है। पूरे देश को यह जानना चाहिए.रामायण में भी इसी तरह की वेशभूषा पहनकर कोई आया था और मां सीता को चुराकर ले गया था। मैं बंगाल के लोगों को कहना चाहता हूं कि वो रामायण को याद करें.ये नकली संत हैं जिन्होंने उत्तर प्रदेश को बर्बाद कर दिया है
अखिलेश यादव ने कहा, "पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की ऐतिहासिक जीत होने जा रही है। ममता बनर्जी वहां जीतेंगी.जिन राज्यों में मतदान हो चुका है, वहां भाजपा की जो हार होने जा रही है, उसको छिपाने के लिए यह पूरा तंत्र लगा रहे हैं.भाजपा चुनाव नहीं लड़ रही है बल्कि चुनाव आयोग चुनाव लड़ रहा है
"समाजवादी पार्टी विकास की दिशा में उत्तर प्रदेश को लेकर जाएगी.सरकार को सोचना चाहिए कि किसान की आय दोगुना हुई है या नहीं। यह जो महिला आरक्षण विधेयक लेकर आ रहे हैं.जहां आपने सशक्तिकरण के लिए कोई काम नहीं किया, सुरक्षा को लेकर कोई काम नहीं किया और वो आरक्षण की बात कर रहे हैं.उन्होंने जनगणना नहीं कराई.वो जनगणना से घबरा रहे हैं। वो यह इसलिए नहीं कराना चाहते हैं क्योंकि वो सब आंकड़े छिपाना चाहते हैं.
अखिलेश यादव का तर्क था कि योगी आदित्यनाथ खुद को एक संत या धार्मिक व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन उनके कार्य और निर्णय उस छवि के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर सरकार विफल रही है, जबकि धार्मिक पहचान का इस्तेमाल केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है। इस बयान के जरिए अखिलेश ने यह संदेश देने की कोशिश की कि योगी का “संत” होना सिर्फ एक छवि निर्माण है, वास्तविकता में उनकी राजनीति अलग है।
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और योगी आदित्यनाथ के समर्थकों ने इस बयान की कड़ी आलोचना की। उनका कहना था कि यह टिप्पणी न केवल एक व्यक्ति विशेष पर हमला है, बल्कि संत परंपरा और धार्मिक भावनाओं का भी अपमान है। भाजपा नेताओं ने अखिलेश यादव से माफी की मांग की और इसे उनकी “नकारात्मक राजनीति” का उदाहरण बताया। उन्होंने यह भी कहा कि योगी आदित्यनाथ एक प्रतिष्ठित मठ से जुड़े हैं और वर्षों से धार्मिक जीवन जीते आ रहे हैं, इसलिए उनकी धार्मिक पहचान पर सवाल उठाना अनुचित है।
यह विवाद केवल व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म और राजनीति के संबंध पर भी बहस छिड़ गई। एक ओर विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष धर्म का राजनीतिकरण कर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि विपक्ष धार्मिक परंपराओं का सम्मान नहीं करता। इस तरह के बयान चुनावी माहौल में अक्सर देखने को मिलते हैं, जहाँ नेता एक-दूसरे पर तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं ताकि जनता का ध्यान आकर्षित किया जा सके। कुल मिलाकर, यह मुद्दा राजनीतिक रणनीति, वैचारिक मतभेद और जनभावनाओं के बीच संतुलन की जटिलता को दर्शाता है।