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चीन की अदालत ने समलैंगिकता को माना दिमागी रोग, छिड़ा विवाद

Thu, 04 Mar 2021 02:55 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 04 Mar 2021 02:55 PM IST
सार

चीन में 1997 में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया था। 2001 में इसे मानसिक रोग की श्रेणी से भी हटा दिया गया। लेकिन समलैंगिकता के कुछ प्रकारों को अभी भी मानसिक रोग की श्रेणी में रखा जाता है...

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A middle court of China thinks homosexuality a psychological disease
LGBT - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

एक अदालती फैसले में समलैंगिकता को ‘मनोवैज्ञानिक रोग’ बताए जाने को लेकर चीन में विवाद खड़ा हो गया है। कोर्ट ने इस मामले में एक टेक्स्ट बुक (पाठ्य पुस्तक) प्रकाशक के पक्ष में फैसला दिया। ये टेक्स्ट बुक विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के लिए तैयार की गई है। इसमें समलैंगिकता को ‘मनोवैज्ञानिक रोग’ बताया गया है। इसके खिलाफ डाली गई याचिका पर फैसला देते हुए सुचियान के माध्यमिक पीपुल्स कोर्ट ने कहा कि किताब में जो बात गई है, उसमें कोई तथ्यात्मक गलती नहीं है। बल्कि याचिकाकर्ता ने जो दलीलें दीं, वे इस मुद्दे पर केवल अकादमिक वैचारिक मतभेद की वजह से कही गई हैं। इस तरह पूर्वी प्रांत जियांग्सु में स्थित एक डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के पिछले साल दिए गए निर्णय को इंटरमीडियट कोर्ट ने सही ठहराया।

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इस फैसले पर चीन के एलजीबीटी (समलैंगिक और ट्रांसजेंडर) समुदाय ने गहरी निराशा जताई है। इस समुदाय के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने कहा है कि ऐसा लगता है किताब प्रकाशक और कोर्ट का आधुनिक संस्कृति से कोई संपर्क नहीं है। एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था पीएफएलएजी ने कहा कि इस फैसले में वैसी राय झलकी है, जैसे कि कहा जाता था कि सूरज ही धरती का चक्कर लगाता है। उसने कहा कि किताब में जो बात कही गई है, वह चीनी समाज के एलजीबीटी समुदाय के बारे में सोच से मेल नहीं खाती।
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किताब में लिखी गई बात को खुद को समलैंगिक बताने वाली शी शी नाम की एक महिला ने 2017 में कोर्ट में चुनौती दी थी। शी शी मानसिक स्वास्थ्य की छात्रा थीं। कॉलेज में होने के दौरान उन्हें ये किताब पढ़ाई गई थी। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने किताब में देखा कि समलैंगिकता को मानसिक रोग की श्रेणी रखा गया है, तो इस बात से उन्हें गहरा सदमा लगा।
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किताब में कहा गया है कि समलैंगिकता प्यार और यौन संबंध के भटकने या यौन पार्टनर की पतनशीलता का परिणाम है। शी शी ने अपनी अर्जी में कोर्ट से गुजारिश की थी कि किताब के प्रकाशक को संबंधित अध्याय को किताब से हटाने का आदेश दिया जाए। साथ ही उसे अवैज्ञानिक बात छापने के एवज में माफी मांगने को कहा जाए। लेकिन पिछले नवंबर में डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने उनकी अर्जी ठुकरा दी। अब इंटरमीडिएट कोर्ट ने भी प्रकाशक के पक्ष में फैसला दिया है।

चीन में 1997 में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया था। 2001 में इसे मानसिक रोग की श्रेणी से भी हटा दिया गया। लेकिन समलैंगिकता के कुछ प्रकारों को अभी भी मानसिक रोग की श्रेणी में रखा जाता है। इनमें ऐसे लोग शामिल हैं, जो अपनी समलैंगिक पहचान को लेकर सहज नही होते या अपने इस रूझान के कारण खुद से संघर्ष की अवस्था में रहते हैं। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1990 में समलैंगिकता को मानसिक रोग की श्रेणी से हटाया था।


विश्लेषकों का कहना है कि चीन में प्रगतिशील सामाजिक नीतियां अपनाए जाने के बावजूद मोटे तौर पर चीनी समाज आज भी कई मामलों में रूढ़िवादी ही है। समलैंगिकता या स्त्री-पुरुष समानता के मामले में आज भी वहां सामाजिक नजरिया विकसित पश्चिमी समाजों की तुलना में पिछड़ा हुआ है।

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