Sri lanka: श्रीलंका में समलैंगिकता को वैध बनाने के मुद्दे पर छिड़ा विवाद
कुछ व्यक्तियों ने इस वर्ष श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस विधेयक को रोकने की गुजारिश की थी। उनका दावा है कि यह बिल श्रीलंका के संविधान के खिलाफ है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी...
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समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने की कोशिश को लेकर श्रीलंका में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस मकसद के लिए श्रीलंका की रानिल विक्रमसिंघे सरकार ने एक विधेयक तैयार किया है। लेकिन उसे लेकर श्रीलंकाई संसद में भी मतभेद गहराने के संकेत हैं। पर्यवेक्षकों ने अंदेशा जताया है कि विभिन्न धार्मिक संस्थानों और धर्म गुरुओं की तरफ से भी सरकार की इस पहल का पुरजोर विरोध होगा। ऐसे में यह सवाल भी उठा है कि जिस समय राष्ट्रपति विक्रमसिंघे देश में समय से पहले चुनाव करवा कर अपने लिए नया जनादेश हासिल करने की तैयारी में बताए जाते हैं, क्या सत्ताधारी पार्टी के सांसदों का बहुमत इस विधेयक का समर्थन करेगा?
बिल को संसद में पेश करने वाले सत्ताधारी पार्टी श्रीलंका पोडुजना पेरामुना (एसएलपीपी) के सांसद ने सोमवार को स्वीकार किया कि इस विधेयक को लेकर पार्टी के एक हिस्से में विरोध है। लेकिन पार्टी का एक दूसरा हिस्सा इसका समर्थन कर रहा है और वह चाहता है कि यह बिल जल्द से जल्द पारित कराया जाए।
संसद में विधेयक को एसएलपीपी के सांसद प्रेमनाथ डोलावट्टा ने पेश किया। श्रीलंका की संसद में 225 सदस्य हैं। इसलिए बिल को पारित होने के लिए इसे कम से कम 113 सदस्यों का समर्थन चाहिए। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अभी तक बिल के पक्ष में बहुमत का समर्थन होने का संकेत नहीं है।
डोलावट्टा ने कहा कि विपक्ष के भी कई सदस्यों ने बिल का समर्थन किया है। इसके बावजूद इसके पारित होने के लिए जितने सदस्यों के समर्थन की जरूरत है, अभी तक इसके पक्ष में जुटी संख्या उससे लगभग 30 कम है। डोलावट्टा ने समलैंगिक और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटीक्यू) समुदाय की एक बैठक को संबोधित करते हुए बताया- ‘कुछ हलकों से बिल का विरोध हो रहा है। खास कर धार्मिक और सिविल सोसायटी कुछ संगठन इसका विरोध कर रहे हैँ।’ लेकिन उन्होंने दावा किया कि सरकार और विपक्षी दलों के नेतृत्व का पूरा समर्थन इस बिल के पक्ष में है।
कुछ व्यक्तियों ने इस वर्ष श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस विधेयक को रोकने की गुजारिश की थी। उनका दावा है कि यह बिल श्रीलंका के संविधान के खिलाफ है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि संसद में प्राइवेट मेंबर बिल के तहत लाया गया यह विधेयक असंवैधानिक नहीं है।
एक याचिकाकर्ता ने वेबसाइट इकॉनमीनेक्स्ट.कॉम से कहा- ‘समलैंगिकता अप्राकृतिक है। इसे वैध बनाने का प्रयास बेहद चिंता की बात है।’ याचिकाकर्ता ने ध्यान दिलाया कि श्रीलंका के संविधान के तहत समलैंगिकता एक अपराध है। श्रीलंका की दंड संहिता के मुताबिक समलैंगिकता प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ है। इस संहिता के तहत समलैंगिक गतिविधियों में शामिल होना दंडनीय अपराध है।
कुछ हलकों से कहा गया है कि अगर यह बिल पारित हो गया, तो देश में बच्चों से यौन दुर्व्यवहार की घटनाओं की बाढ़ आ जाएगी। डोलावट्टा ने बताया कि सांसदों को कई धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों की तरफ से अर्जियां मिली हैं। लेकिन वकीलों के किसी संगठन या मनोवैज्ञानिकों की तरफ से किसी ने इस विधेयक का विरोध नहीं किया है।