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तिब्बत: चीन कर रहा प्राकृतिक संसाधनों का हनन, दलाई लामा की दुनिया से अपील- पर्यावरण पर खासा ध्यान देने की जरूरत

Sun, 31 Oct 2021 09:57 PM IST
मुकेश कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग Published by: मुकेश कुमार झा Updated Sun, 31 Oct 2021 09:57 PM IST
सार

आध्यात्मिक गुरु ने कहा कि कम से कम एशिया में तिब्बत पानी का सबसे बड़ा स्रोत है। हमें तिब्बत के पर्यावरण को बचाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

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Dalai Lama urges world to pay attention to Tibet ecology amid resource exploitation by China
दलाई लामा - फोटो : ट्विटर

विस्तार

बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा ने दुनिया से तिब्बत के पर्यावरण की भूमिका और वैश्विक जलवायु संकट पर अधिक ध्यान देने की अपील की है। दरअसल, तिब्बत पर कब्जे के बाद से चीन यहां के प्राकृतिक संसाधनों का हनन कर रहा है। आध्यात्मिक गुरु ने कहा कि कम से कम एशिया में तिब्बत पानी का सबसे बड़ा स्रोत है। सभी बड़ी नदियां, पाकिस्तान की सिंधु नदी, भारत की गंगा और ब्रह्मपुत्र, चीन में येलो नदी, वियतनाम की मेकोंग नदी तिब्बत से बहती है। इसलिए तिब्बत के पर्यावरण पर खासा ध्यान देने की जरूरत है। दलाई लामा ने यह अपील ऐसे समय पर की है, जब दुनियाभर के नेता 26वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP26) के लिए ग्लासगो इकट्ठा हुए हैं। 

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हमें तिब्बत के पर्यावरण को बचाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए
दलाई लामा ने कहा, 'हमें तिब्बत के पर्यावरण को बचाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यह केवल 60-70 लाख तिब्बतियों नहीं बल्कि क्षेत्र के सभी लोगों के हित में है।' आध्यात्मिक गुरु ने कहा कि 140 करोड़ चीनी आबादी, 130 करोड़ भारतीय, 17.5 करोड़ दक्षिणपूर्वी एशियाई और पाकिस्तान व बांग्लादेश के करोड़ों लोग तिब्बत से निकलने वाली नदियों के पानी पर निर्भर हैं। बता दें कि तिब्बत पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार का शासन है, जिसमें स्थानीय निर्णय लेने की शक्ति भी चीनी पार्टी के अधिकारियों के हाथों में ही है। 1950 में चीन के आक्रमण से पहले तिब्बत एक संप्रभु राज्य था। कब्जे के बाद से प्राकृतिक रूप से बेहद संपन्न तिब्बत को चीन लूटने में जुटा है।
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चीन को तिब्बत में अधिकारों के हनन पर लगी थी फटकार
इसी साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 48वें सत्र के दौरान चीन को तिब्बत में अधिकारों के हनन पर फटकार लगाई गई थी। अमेरिका, डेनमार्क, जर्मनी और यूरोपीय यूनियन के प्रतिनिधियों ने तिब्बत में चीनी सरकार की ओर से लगाई गई धार्मिक, भाषाई, सांस्कृतिक पाबंदियों की पर चिंता जाहिर की थी। 

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