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एक्सप्लेनर: क्या हर स्मार्ट डिवाइस पर मंडरा रहा है एआई वॉर्म का खतरा? एंथ्रोपिक के शोध में हुआ ये बड़ा खुलासा

Tue, 20 Oct 2026 06:18 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Tue, 20 Oct 2026 06:18 AM IST
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सार
एआई वॉर्म साइबर हमलों की दुनिया में नया खतरा बन सकता है। यह बिना इंसानी मदद के एक डिवाइस से दूसरे तक फैलने की कोशिश कर सकता है। लेकिन क्या यह वाकई स्मार्ट डिवाइसों को अपनी चपेट में ले सकता है? एंथ्रोपिक के शोध में इसे लेकर क्या सामने आया? आइए जानते हैं।
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Explainer: Is Every Smart Device at Risk from AI Worms? Anthropic’s Research Reveals a New Threat
एआई वार्म - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

इंटरनेट से जुड़े उपकरण हमारी जिंदगी आसान बना रहे हैं, लेकिन यही कनेक्शन साइबर हमले का रास्ता भी बन सकता है। एआई कंपनी एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं ने ऐसे वॉर्म की संभावना परखी है, जो खुद को दूसरे उपकरणों तक फैलाने की कोशिश कर सकता है।



ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एआई वॉर्म है क्या? यह कैसे काम कर सकता है? शोधकर्ताओं ने क्या पाया?  यह सामान्य वॉर्म से कितना अलग है? इसे रोकने में क्या चुनौतियां हो सकती हैं? क्या पहले भी ऐसी घटनाएं हुई हैं?

क्या है एआई वॉर्म?

कंप्यूटर की दुनिया में वॉर्म एक ऐसा प्रोग्राम होता है, जो बिना इंसान की मदद के एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर तक अपनी कॉपी पहुंचा सकता है। इसके लिए जरूरी नहीं कि कोई व्यक्ति किसी अनजान लिंक पर क्लिक करे या संक्रमित फाइल डाउनलोड करे।

एआई वॉर्म में एआई की मदद से दूसरे उपकरणों को खोजने, उनकी सुरक्षा में मौजूद कमियों का फायदा उठाने और वहां खुद को चलाने का तरीका खोजने की कोशिश की जा सकती है। एंथ्रोपिक की शोध रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा प्रोग्राम किसी उपकरण पर चलने के बाद वहां से आगे फैलने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि एआई हर सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ सकता है।

स्मार्ट टीवी और फ्रिज जैसे उपकरण क्यों बन सकते हैं निशाना?

एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं के मुताबिक, ऐसे वॉर्म को फैलने के लिए महंगे कंप्यूटर या बड़े डेटा केंद्रों की ही जरूरत नहीं होगी। इंटरनेट से जुड़े कम कीमत वाले उपकरण भी इसके लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

स्मार्ट टीवी, स्मार्ट फ्रिज, स्मार्ट ओवन, रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर और सुरक्षा कैमरे जैसे उपकरण इंटरनेट से जुड़े होते हैं। इनमें से कुछ को समय पर सुरक्षा अपडेट नहीं मिलते। ऐसे में पुराने सॉफ्टवेयर की कमियां साइबर हमले का रास्ता खोल सकती हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि कई उपकरणों की कंप्यूटिंग क्षमता को मिलाकर एआई मॉडल चलाया जा सकता है। इस व्यवस्था में अलग-अलग उपकरण मॉडल के हिस्सों को संभाल सकते हैं और मिलकर काम कर सकते हैं।

रिपोर्ट में किमवुल्फ नाम के एक बड़े साइबर नेटवर्क का उदाहरण भी दिया गया है, जिसने अपने चरम पर 20 लाख से ज्यादा उपकरणों को प्रभावित किया था। इनमें बड़ी संख्या कम कीमत वाले एंड्रॉयड टीवी बॉक्स की थी। यह उदाहरण दिखाता है कि इंटरनेट से जुड़े सस्ते उपकरण भी बड़े साइबर नेटवर्क का हिस्सा बन सकते हैं।

कैसे करता है हमला?
कैसे करता है हमला? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

एंथ्रोपिक ने प्रयोग में क्या पाया?

एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं विलियम झोउ और डैनियल फ्रीमैन ने यह जांच की कि क्या छोटे एआई मॉडल अलग-अलग तरह के उपकरणों पर खुद को चलाने के लिए जरूरी व्यवस्था तैयार कर सकते हैं।

इसके लिए शोधकर्ताओं ने करीब 55 डॉलर यानी लगभग 4,600 रुपये प्रति उपकरण की कीमत वाले 15 सस्ते एंड्रॉयड टीवी बॉक्स खरीदे और उन्हें एक नेटवर्क से जोड़ा। इसके बाद जेम्मा 4-26बी-ए4बी नाम के एआई मॉडल को इन उपकरणों में बांटकर चलाया गया। प्रयोग में मॉडल ने प्रति सेकंड 0.39 टोकन की रफ्तार से काम किया। यानी मॉडल इन उपकरणों पर चल तो पाया, लेकिन उसकी गति काफी धीमी थी।

शोधकर्ताओं ने नौ अरब पैरामीटर वाले एक छोटे एआई मॉडल को भी अलग-अलग तरह के हार्डवेयर पर परखा। यह मॉडल प्रयोग में शामिल नौ में से आठ तरह के हार्डवेयर पर एआई चलाने के लिए जरूरी व्यवस्था तैयार करने में सफल रहा।

पैरामीटर वे संख्यात्मक मान होते हैं, जिनकी मदद से एआई मॉडल जानकारी से पैटर्न सीखता है और जवाब तैयार करता है। इनकी संख्या से मॉडल की क्षमता का कुछ अंदाजा मिलता है, लेकिन सिर्फ इसी से उसकी पूरी क्षमता तय नहीं होती।

रिपोर्ट के मुताबिक, 30 अरब या उससे कम पैरामीटर वाले मॉडल खुद को फैलाने की प्रक्रिया के कई अलग-अलग चरण पूरे कर सकते हैं। हालांकि, इन सभी चरणों को जोड़कर पूरी प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी करने में उन्हें गलतियां होती हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि उनके सरल परीक्षणों में जीएलएम-5.2 और इससे अधिक सक्षम मॉडल पूरी प्रक्रिया को एक साथ पूरा कर सकते थे। उनका अनुमान है कि छोटे एआई मॉडल अपनी मौजूदा विकास दर से आगे बढ़ते रहे, तो 2026 के अंत तक यह क्षमता हासिल कर सकते हैं। यह भविष्य को लेकर शोधकर्ताओं का अनुमान है।

क्या है अंतर?
क्या है अंतर? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

एआई वॉर्म खुद को कैसे फैला सकता है?

एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं ने इस प्रक्रिया को चार चरणों में बांटा है। पहला चरण है नेटवर्क से जुड़े दूसरे उपकरणों को खोजना। इसके बाद प्रोग्राम किसी उपकरण की सुरक्षा में मौजूद कमी का फायदा उठाकर उसमें प्रवेश करने की कोशिश कर सकता है।

तीसरे चरण में उसे नए उपकरण पर एआई मॉडल चलाने की व्यवस्था तैयार करनी होगी। इसके लिए सही सॉफ्टवेयर चुनना और तकनीकी गड़बड़ियों को ठीक करना जरूरी हो सकता है। चौथे चरण में नए उपकरण पर मॉडल चलने के बाद वह दूसरे उपकरणों तक पहुंचने की कोशिश कर सकता है।

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में खास तौर पर इस बात पर ध्यान दिया कि एआई मॉडल को किसी नए उपकरण पर कैसे चलाया जा सकता है। अलग-अलग उपकरणों में अलग सॉफ्टवेयर और तकनीक इस्तेमाल होती है। ऐसे में छोटी-सी गलती भी पूरी प्रक्रिया को रोक सकती है।

सामान्य वॉर्म से कैसे अलग हो सकता है एआई वॉर्म?

सामान्य कंप्यूटर वॉर्म भी बिना इंसान की मदद के एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर तक फैल सकता है। एआई की मदद से ऐसा प्रोग्राम अलग-अलग उपकरणों के हिसाब से काम करने का तरीका खोजने और तकनीकी समस्याओं को हल करने की कोशिश कर सकता है।

एंथ्रोपिक की रिपोर्ट में खुद को फैलाने के दूसरे संभावित तरीकों का भी जिक्र है। उदाहरण के लिए, कोई एआई प्रोग्राम दूसरे सिस्टम तक पहुंचने के लिए चोरी किए गए खातों या एपीआई की जानकारी का इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकता है। एपीआई एक ऐसा माध्यम है, जिससे अलग-अलग सॉफ्टवेयर आपस में जुड़कर काम करते हैं।

हालांकि, ये संभावित तरीके हैं। शोध में इन सभी तरीकों से वास्तविक नेटवर्क पर बड़े पैमाने पर फैलने वाले वॉर्म का सफल परीक्षण नहीं किया गया।

बड़े साइबर हमले
बड़े साइबर हमले - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

एआई वॉर्म को रोकना मुश्किल क्यों हो सकता है?

अगर कोई वॉर्म एक ही केंद्रीय सर्वर से नियंत्रित हो रहा है, तो उस सर्वर को बंद करने से उसका फैलाव रोका जा सकता है। लेकिन अगर वह कई उपकरणों पर फैल चुका हो और उन्हीं पर चल रहा हो, तो प्रभावित उपकरणों की पहचान करके उन्हें सुरक्षित करना जरूरी हो सकता है।

एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं ने आशंका जताई कि ऐसे वॉर्म को रोकना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि उसे बंद करने के लिए कोई एक केंद्रीय जगह नहीं होगी। हालांकि, उन्होंने यह भी अनुमान लगाया कि इसका फैलाव धीमा हो सकता है और ऐसे प्रोग्राम की संख्या दोगुनी होने में कई दिन लग सकते हैं।

क्या पहले भी हो चुके हैं बड़े साइबर हमले?

इंटरनेट के इतिहास में कई ऐसे वॉर्म और साइबर हमले सामने आए हैं, जिन्होंने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है।

मॉरिस वॉर्म (1988): 2 नवंबर 1988 को इंटरनेट पर फैलने वाले इस वॉर्म ने उस समय नेटवर्क से जुड़े करीब 60 हजार कंप्यूटरों में से लगभग 6 हजार को प्रभावित किया था। इसकी वजह से कई कंप्यूटर धीमे पड़ गए और नेटवर्क सेवाएं बाधित हुईं।

स्टक्सनेट (2010): यह वॉर्म ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी औद्योगिक प्रणालियों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया था। इसने खास सॉफ्टवेयर के जरिए यूरेनियम संवर्धन में इस्तेमाल होने वाले सेंट्रीफ्यूज की कार्यप्रणाली में गड़बड़ी पैदा की। इस हमले ने दिखाया कि साइबर हमले से औद्योगिक उपकरणों को भी नुकसान पहुंच सकता है।

वॉनाक्राई (2017): इस साइबर हमले में वॉर्म की तरह खुद फैलने की क्षमता रखने वाले रैनसमवेयर का इस्तेमाल हुआ। इसने कंप्यूटरों की फाइलें लॉक कर दीं और उन्हें खोलने के बदले फिरौती मांगी। यूरोपोल के मुताबिक, इस हमले ने 150 से ज्यादा देशों में करीब दो लाख कंप्यूटरों को प्रभावित किया। अस्पतालों, कंपनियों और दूसरी संस्थाओं का काम भी बाधित हुआ।

नॉटपेट्या (2017): यह हमला जून 2017 में शुरू हुआ और यूक्रेन से निकलकर दुनिया के कई देशों तक फैल गया। शुरुआत में यह रैनसमवेयर जैसा दिखा, लेकिन इसका असर केवल फाइलें लॉक करने तक सीमित नहीं था। इसने कंप्यूटर प्रणालियों को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया और कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के कामकाज को बाधित किया। अमेरिकी सरकार ने इसे दुनिया के सबसे नुकसानदेह साइबर हमलों में से एक बताया था।

द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने साइबर हमलों में कई बार ऐसी सुरक्षा कमियों का फायदा उठाया गया, जिनके लिए अपडेट उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें उपकरणों में इंस्टॉल नहीं किया गया था। इंटरनेट से जुड़े स्मार्ट उपकरणों में भी सुरक्षा अपडेट की कमी जोखिम बढ़ा सकती है।

क्या एआई वॉर्म का खतरा अभी वास्तविक है?

द गार्डियन की रिपोर्ट में टोरंटो विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ता जोनास गुआन ने कहा कि एआई की क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं। वहीं, साइबर सुरक्षा कंपनी सेंटिनलवन के उपाध्यक्ष जुआन आंद्रेस गुएरेरो-सादे ने प्रयोग के वास्तविक असर को लेकर सवाल उठाए। उनके मुताबिक, इसकी व्यावहारिक उपयोगिता को लेकर किए जाने वाले दावों में सावधानी बरतनी चाहिए।

विशेषज्ञों के मुताबिक, नेटवर्क की अलग-अलग सुरक्षा व्यवस्थाओं से ऐसे हमलों का पता लगाने और उन्हें रोकने में मदद मिल सकती है। मजबूत पासवर्ड रखना, दो चरणों में पहचान की पुष्टि करना और सॉफ्टवेयर को समय पर अपडेट करना कई साइबर हमलों से बचाव में मदद करता है।

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