मंथन: ईरान-इस्राइल युद्ध से बेनकाब हुई मुस्लिम देशों की एकता, सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहीं OIC जैसी संस्थाएं
प्रमुख मुस्लिम देशों द्वारा ईरान को सीधी सैन्य मदद देने की संभावना बेहद कम दिखी। अधिकतर मुस्लिम देश अमेरिका से अपने व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध बिगाड़ने का जोखिम नहीं लेना चाहते। इसी कारण उम्माह की ओर से न तो हथियार भेजे गए और न ही कोई प्रत्यक्ष सैन्य गठजोड़ बनता दिखा।
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ईरान और इस्राइल के बीच जारी सैन्य टकराव और उस पर अमेरिका के सीधे हस्तक्षेप से पश्चिम एशिया युद्ध के मुहाने पर खड़ा दिखा। इस दौरान मुस्लिम उम्माह यानी इस्लामी देशों के समूह की ओर से कोई ठोस और एकजुट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। ओआईसी (इस्लामिक सहयोग संगठन) जैसी संस्थाएं बयानबाजी तक सीमित रहीं जबकि ईरान अकेला लड़ता रहा। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इनका संगठन और एकजुटता सिर्फ दिखावे की है। विशेषज्ञों का कहना है कि मुस्लिम उम्माह केवल राजनीतिक बयान तक सीमित रह जाएगी या वाकई ईरान को सैन्य या रणनीतिक समर्थन भी दे पाएगी। जब अमेरिका ने खुलकर इस्राइल का पक्ष लिया, सैन्य मदद भेजी और उसके बाद ईरानी परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले किए तब मुस्लिम देशों में हलचल तो दिखी, लेकिन कोई सामूहिक बैठक या साझा रणनीति सामने नहीं आई।
नहीं हुई सीधी सैन्य मदद की पेशकश
इस्लामिक रिपब्लिक न्यूज एजेंसी (इरना) और अल जजीरा की रिपोर्टों के अनुसार प्रमुख मुस्लिम देशों द्वारा ईरान को सीधी सैन्य मदद देने की संभावना बेहद कम दिखी। अधिकतर मुस्लिम देश अमेरिका से अपने व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध बिगाड़ने का जोखिम नहीं लेना चाहते। इसी कारण उम्माह की ओर से न तो हथियार भेजे गए और न ही कोई प्रत्यक्ष सैन्य गठजोड़ बनता दिखा। इस्लामी देशों की भूमिका फिलहाल अधिकतर नीतिगत बयानबाजी तक सीमित रह गई है। जब इस्राइल ने शुरुआती हमले किए तब माना जा रहा था कि मुस्लिम दुनिया एकजुट होकर ईरान के साथ खड़ी होगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
अब वैचारिक रूप से विभाजित हो चुकी है उम्माह
विशेषज्ञ मानते हैं कि मुस्लिम उम्माह अब वैचारिक रूप से विभाजित हो चुकी है। ईरान एक शिया बहुल देश है, जबकि अधिकांश मुस्लिम देशों में सुन्नी नेतृत्व है, जो ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को संदेह की निगाह से देखता है। सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से छाया छद्म युद्ध भी इस एकता में बाधा बनता है। ओआईसी अब तक केवल एक सामान्य निंदा प्रस्ताव तक ही सीमित रहा है।
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कई अरब देश ईरान से सशंकित
मध्य पूर्व मामलों के जानकार रॉबर्ट मल्ली का कहना है कि मुस्लिम देशों की आपसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय असुरक्षा और अमेरिका या चीन जैसे महाशक्तियों के साथ रणनीतिक गठबंधनों के चलते उम्माह की एकता केवल भाषणों तक सीमित रह गई है। अरब देशों में कई सरकारें ईरान की नीति और उसके विस्तारवादी रवैये को लेकर सशंकित हैं।
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