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ईरान को घेरने की तैयारी इन तीन देशों की तिकड़ी: पाकिस्तान भी शामिल, समझौते पर तेहरान ने क्यों जताई आपत्ति?

Fri, 07 Aug 2026 10:39 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेहरान
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेहरान Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Fri, 07 Aug 2026 10:39 PM IST
सार

तीन देशों की तिकड़ी ने एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस तिकड़ी में एक देश पाकिस्तान भी है। इस पर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। और भड़कते हुए कहा कि ऐसे समझौते से किसी को सुरक्षा नहीं मिलेगी। तीनों देशों का कहना है कि यह समझौता केवल रक्षा सहयोग के लिए है और किसी देश के खिलाफ नहीं है। लेकिन क्या यह नया गठजोड़ पश्चिम एशिया की राजनीति का संतुलन बदल देगा? क्या ईरान की चिंता वाजिब है? आइए, विस्तार से जानते हैं, ये तीनों देश कौन से हैं? क्या रणनीति बना रहे हैं...

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Iran Slams Pakistan-Saudi-Türkiye Defence Pact Is a New Regional Alliance Taking Shape Against Tehran?
क्या पाकिस्तान ने ईरान को दिया धोखा? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा हालात के बीच एक बड़ा घटनाक्रम हुआ। तीन देशों की तिकड़ी ने एक समझौता किया। इससे ईरान की मुश्किलें थोड़ी बढ़ गई। जो पाकिस्तान अमेरिका-ईरान में शांति वार्ता करानें में भूमिका निभा रहा था, वो भी इस तिकड़ी में शामिल है। दरअसल, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच हुए संयुक्त रक्षा समझौता हुआ है। इस समझौते में ये कहा गया है कि अगर इन तीन देशों में किसी एक पर भी हमला किया गया, तो वो इन तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
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इस समझौते के बाद ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसे कागजी समझौते सऊदी अरब को सुरक्षा नहीं दे सकते। अमेरिका-ईरान तनाव और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच सामने आई यह प्रतिक्रिया पूरे इलाके के बदलते शक्ति संतुलन की ओर इशारा कर रही है।
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क्या है तीन देशों के बीच हुआ नया रक्षा समझौता?

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने ऐसा संयुक्त रक्षा समझौता किया है, जिसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होने की स्थिति में उसे सभी पर हमला माना जाएगा। इस समझौते पर सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए। तीनों देशों ने कहा कि इसका उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग बढ़ाना और बदलते सुरक्षा माहौल में आपसी समन्वय मजबूत करना है।
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ईरान ने इस समझौते पर क्या प्रतिक्रिया दी?

ईरान की संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य इब्राहिम रेजाई ने इस समझौते की आलोचना की। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब को यह समझ लेना चाहिए कि तुर्किए और पाकिस्तान के साथ किया गया कोई कागजी समझौता उसे सुरक्षा नहीं देगा। उनका कहना था कि अमेरिका के साथ वर्षों के संबंध भी सऊदी अरब को पूरी सुरक्षा नहीं दे सके। ईरानी नेता ने सऊदी अरब से अपनी नीतियों में बदलाव करने की सलाह भी दी।

तीनों देशों ने समझौते को कैसे बताया?

  • सऊदी अरब ने कहा कि यह किसी सैन्य गुट या धार्मिक ध्रुवीकरण का हिस्सा नहीं है।
  • सरकार का कहना है कि समझौते का मकसद आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता विकसित करना है।
  • तुर्किए ने इसे पूरी तरह रक्षात्मक समझौता बताया और कहा कि यह किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है।
  • तुर्किए ने यह भी कहा कि भविष्य में अन्य क्षेत्रीय देश भी इससे जुड़ सकते हैं।
  • समझौते में रक्षा उद्योग, सैन्य समन्वय और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है।

यह समझौता अभी क्यों अहम माना जा रहा है?

यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, इस्राइल से जुड़े सुरक्षा मुद्दे, लाल सागर और होर्मुज क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियां तथा समुद्री व्यापार पर मंडराते खतरे ने कई देशों को रक्षा सहयोग मजबूत करने के लिए प्रेरित किया है। पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता, सऊदी अरब अपनी आर्थिक ताकत और तुर्किए अपने विकसित रक्षा उद्योग के कारण इस साझेदारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

क्या इससे क्षेत्रीय राजनीति पर असर पड़ सकता है?

माना जा रहा है कि यह समझौता केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पश्चिम एशिया की कूटनीति और सुरक्षा रणनीति पर भी असर डाल सकता है। हालांकि तीनों देशों ने साफ किया है कि यह किसी देश के खिलाफ नहीं है और इसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ाना है। दूसरी ओर ईरान की आलोचना से यह संकेत मिलता है कि तेहरान इस नए सुरक्षा ढांचे को लेकर सतर्क है। आने वाले समय में इस समझौते के व्यावहारिक प्रभाव और क्षेत्रीय प्रतिक्रियाओं पर सभी की नजर रहेगी।
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