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'इस्राइल नहीं करेगा गैस फील्ड पर हमला': क्यों बैकफुट पर ट्रंप, कतर पर ईरान की कार्रवाई का दुनिया पर क्या असर?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Thu, 19 Mar 2026 04:21 PM IST
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सार

इस्राइल ने बुधवार को ईरान के अहम 'दक्षिण पार्स गैस फील्ड' पर हमला किया। जवाब में ईरान ने दुनिया की 20% एलएनजी मांग पूरी करने वाले कतर के 'रास लफ्फान' प्लांट पर मिसाइलें दागीं। इससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा गया है। ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार पहुंच गया और ऊर्जा से जुड़ी सप्लाई चेन खतरे में है। इस बीच ट्रंप पहली बार ईरान के किसी ठिकाने पर हमले को लेकर बचाव करते दिखे हैं।

Israel US War Iran South Pars Gas Field Attack Qatar Ras Laffan Industrial City Crude Oil LNG India effect
इस्राइल-ईरान संघर्ष की चपेट में आन से कतर को नुकसान। - फोटो : अमर उजाला/AI
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विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को कहा कि इस्राइल अब ईरान के मुख्य गैस केंद्र पर हमला नहीं करेगा। ट्रंप के इस बयान को उनका एहतियाती कदम माना जा रहा है। विश्लेषक मान रहे हैं कि इस युद्ध के दौरान पहली बार ट्रंप बैकफुट पर नजर आ रहे हैं। 
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इस जंग के दौरान ईरान की वायुसेना, नौसेना, उसके अहम सैन्य ठिकानों और परमाणु केंद्रों को पूरी तरह तबाह करने की धमकी ट्रंप देते रहे हैं। हालांकि, इस्राइल की ओर से ईरान की गैस फील्ड पर एक वार और उसके बाद ईरान के कतर पर पलटवार ने ट्रंप को एहतियाती बयान जारी करने को मजबूर कर दिया।  
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर डोनाल्ड ट्रंप को यह क्यों कहना पड़ गया कि इस्राइल का हमला उनकी जानकारी के बिना हुआ? ईरान ने इस पलटवार में कतर पर कहां हमले किए, जिससे कतर को भी ट्रंप से संपर्क करने की जरूरत पड़ गई? जिन जगहों पर ईरान और कतर में हमले हुए वह किस तरह जुड़ी हैं? यह पूरी दुनिया के लिए क्यों डराने वाला घटनाक्रम रहा? भारत के हित इन हमलों में किस तरह प्रभावित हुए हैं? आइये जानते हैं...

इस्राइल ने ईरान पर कहां हमला किया, जिसे लेकर ट्रंप भी हड़बड़ाए?

इस्राइल ने ईरान के दक्षिण पार्स गैस फील्ड पर हमला किया है, जिसे ईरान की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति की 'रीढ़' माना जाता है। यह ईरान और कतर के बीच साझा की जाने वाली दुनिया की सबसे बड़ा गैस फील्ड है, जो फारस की खाड़ी के नीचे लगभग 9,700 वर्ग किलोमीटर में फैली है। इसमें लगभग 1,800 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस मौजूद है, जो दुनिया के कुल प्रमाणित गैस भंडार का करीब 8% है। यह मात्रा पूरी दुनिया की 13 से ज्यादा वर्षों की ऊर्जा मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त मानी जाती है।

ईरान का 70-75% गैस का उत्पादन यहीं से होता है और देश की करीब 80% बिजली भी इसी प्राकृतिक गैस का उपयोग करके पैदा की जाती है। इस्राइल के हमले के जवाब में ईरान ने पश्चिम एशिया में एक अहम ऊर्जा केंद्र के तौर पर पहचाने जाने वाले कतर के कुछ ऐसे ठिकानों पर हमला किया, जिनसे दुनिया की गैस आपूर्ति ठप पड़ जाने का खतरा पैदा हो गया। इसी के बाद ट्रंप ने कहा कि उन्हें इस्राइली हमले की जानकारी नहीं थी और आगे इस्राइल दक्षिण पार्स गैस फील्ड को निशाना नहीं बनाएगा।

ईरान ने कतर में कहां हमला किया, जिसके बाद दुनिया में मची हलचल?

ईरान ने कतर के रास लफ्फान इंडस्ट्रियल सिटी पर मिसाइल हमले किए, जो कतर का एक बेहद अहम तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और ऊर्जा केंद्र है। कतर दुनिया की लगभग 20% एलएनजी मांग को अकेले पूरा करता है। इस हमले से यूरोप और एशिया को होने वाले सालाना लगभग 7.7 करोड़ टन एलएनजी निर्यात पर गंभीर खतरा पैदा हो गया। कतर एनर्जी की ओर से जारी बयान के मुताबिक, ईरानी मिसाइल हमले के कारण रास लफ्फान कॉम्प्लेक्स में आग लग गई और प्लांट को व्यापक नुकसान पहुंचा है, जिसके कारण वहां उत्पादन रोकना पड़ा। यह कॉम्प्लेक्स करीब 295 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है और ये अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर का एक-तिहाई है। 

ये भी पढ़ें: West Asia: ट्रंप ने कहा- इस्राइल तब तक शांत, जब तक ईरान.., क्या कतर में LNG संयंत्र पर हमले से बदला US का रुख?



अमेरिकी मीडिया समूह एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक, रास लफ्फान परिसर पर हुए हमले के बाद कतर के शीर्ष नेताओं ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बात की। इस बातचीत के बाद ही ट्रंप ने कहा कि इस्राइल अब ईरान की दक्षिण पार्स गैस फील्ड पर हमले नहीं करेगा। 

इस पूरे घटनाक्रम में ट्रंप की क्या भूमिका, क्या सच में नहीं थी इस्राइली हमलों की जानकारी?

इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका काफी अहम रही है। एक्सिओस के मुताबिक, ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर जो दावे किए, अंदरखाने की सच्चाई उससे बिल्कुल अलग थी। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर दावा किया था कि अमेरिका को इस हमले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और इस्राइल ने पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों पर गुस्से में आकर यह हमला किया है। लेकिन, अमेरिकी और इस्राइली अधिकारियों ने एक्सिओस से कहा कि साउथ पार्स गैस फील्ड पर किया गया हमला पूरी तरह से व्हाइट हाउस की सहमति और पूर्व-समन्वय के साथ किया गया था। इसका मकसद ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित करने से रोकना और उसे डराना था।

ईरान के हमले के बाद ट्रंप पर कैसे बढ़ा दबाव?

जब ईरान ने इस्राइली हमले का बदला लेने के लिए कतर के गैस प्लांट पर मिसाइलें दागीं, तो कतर के अधिकारियों ने तुरंत व्हाइट हाउस से संपर्क किया और जवाब मांगा। इसके बाद हालात को शांत करने के लिए ट्रंप ने यह बयान जारी किया। ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी कि अगर उसने कतर के एलएनजी संयंत्रों पर दोबारा हमला करने की कोशिश की, तो अमेरिका पूरी ताकत के साथ साउथ पार्स गैस फील्ड को पूरी तरह से उड़ा देगा।

इस्राइल के ईरान और ईरान के कतर की गैस फील्ड पर हमले का दुनिया पर क्या असर?

तेल और गैस की कीमतों में बेतहाशा उछाल 
ऊर्जा संयंत्रों पर हमले की खबर आते ही वैश्विक बाजारों में घबराहट फैल गई। ब्रेंट क्रूड की कीमत उछलकर 111.07 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड 98.61 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। इस ऊर्जा संकट के कारण अधिकतर उत्पादों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है और अमेरिका जैसे देशों में भी डीजल की कीमतें पांच डॉलर प्रति गैलन के पार चली गई हैं। 
 

लंबे समय तक बुनियादी ढांचे के ठप रहने का 
आर्थिक मामलों के जानकारों के मुताबिक, कच्चे तेल और गैस उत्पादन सुविधाओं (खासकर एलएनजी प्लांट्स) को पहुंचे नुकसान की मरम्मत करने में कई महीनों से लेकर कई साल तक का समय लग सकता है। 2003 के इराक युद्ध और मौजूदा यूक्रेन संघर्ष को देखा जाए तो सामने आता है कि ऊर्जा संयंत्रों को दोबारा चालू करने में भारी रसद और उपकरणों की कमी का सामना करना पड़ता है। इसका मतलब है कि यह ऊर्जा संकट और महंगाई लंबे समय तक दुनिया को प्रभावित कर सकता है।

ग्लोबल सप्लाई चेन पर पड़ेगा नकारात्मक असर
दुनिया के कुल तेल और गैस का एक बहुत बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव और इसके लगभग बंद होने की स्थिति ने दुनियाभर की सप्लाई चेन को पहले ही बुरी तरह प्रभावित किया है। अब कतर का एशियाई और यूरोपीय देशों के लिए जरूरत के मुताबिक 7.7 करोड़ टन एलएनजी उत्पादन न कर पाना, युद्ध के बाद भी दुनियाभर के लिए बुरी खबर बन सकता है।

पूरे पश्चिम एशिया में ऊर्जा युद्ध फैलने का खतरा 
ईरान ने कतर पर हमले के बाद खुले तौर पर चेतावनी दी है कि वह सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के तेल और गैस संयंत्रों को भी अपना वैध निशाना बना सकता है। ईरान ने इसी चेतावनी को असलियत बनाते हुए सऊदी की अरामको-एक्सॉन मोबाइल से जुड़े एक केंद्र को निशाना भी बनाया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर यह जारी रहता है तो वैश्विक बाजार से हर दिन लाखों बैरल तेल का उत्पादन ठप हो जाएगा, जिसकी भरपाई युद्ध रुकने के बाद भी नहीं की जा सकेगी।

क्या भारत पर भी पड़ सकता है इस नए संघर्ष का असर?


1. ऊर्जा-गैस जरूरतों पर सीधा प्रभाव
भारत अपनी ऊर्जा और गैस की जरूरतों के लिए कतर पर काफी हद तक निर्भर है। कतर ने भारत की पेट्रोनेट कंपनी के साथ लंबी अवधि के एलएनजी समझौते किए हुए हैं। ऐसे में कतर के दुनिया के सबसे बड़े गैस हब रास लफ्फान पर हुए हमले और वहां उत्पादन रुकने से भारत को होने वाली गैस आपूर्ति पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

ये भी पढ़ें: West Asia Crisis: 'गैस फील्ड पर हमला हुआ तो करारा जवाब देंगे', कतर के ऊर्जा ठिकाने पर हमले के बाद ईरान की धमकी

2. शेयर बाजार में तेज गिरावट
पश्चिम एशिया में तेजी से बढ़ते इस तनाव और ऊर्जा युद्ध ने भारतीय निवेशकों को बुरी तरह डरा दिया है। इसका असर यह रहा है कि भारतीय शेयर बाजार का सूचकांक सेंसेक्स दो हजार अंकों से ज्यादा गिर गया। 

3.  भारतीय उद्योगों को भारी नुकसान 
ग्लोबल सप्लाई चेन टूटने और परिवहन मार्गों (जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य) के प्रभावित होने के कारण भारत के कई उद्योग सीधे तौर पर नुकसान झेल रहे हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिम एशिया के इस युद्ध के कारण कोलकाता का 4.5 अरब डॉलर का लेदर (चमड़ा) उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

4. वैश्विक तेल कीमतों में उछाल का खतरा 
ऊर्जा संयंत्रों पर हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतों का उछलकर 111 डॉलर प्रति बैरल के पार जाना भारत की तेल कंपनियों को भी दबाव में डाल रहा है। दरअसल, भारत अपनी तेल-गैस जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। इसलिए एशिया और दुनिया भर की सप्लाई चेन पर असर पड़ने से भारत में भी महंगाई और ऊर्जा संकट बढ़ने का सीधा जोखिम पैदा हो गया है। आने वाले दिनों में तेल कंपनियां महंगे तेल की खरीद के बोझ को कम करने के लिए पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने पर विचार कर सकती हैं।

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