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जापान में समलैंगिक अधिकारों के पक्ष में अब बढ़ने लगा जनमत
Mon, 05 Apr 2021 06:04 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Mon, 05 Apr 2021 06:04 PM IST
सार
जापान की न्यूज एजेंसी क्योदो के एक सर्वे में सामने आया कि देश की ज्यादातर स्थानीय सरकारों की राय है कि सेक्सुअल माइनोरिटीज यानी समलैंगिक और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए जापान की मौजूदा राष्ट्रीय प्रणाली पर्याप्त नहीं है...
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विस्तार
जापान में अब समलैंगिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए पहल स्थानीय स्तरों पर शुरू हो गई है। पिछले दिनों राष्ट्रीय संसद के इस मामले में ठोस उपाय ना कर पाने के बाद अब ये पहल स्थानीय सरकारों ने अपने हाथ में ले ली है। जापान में ऐसी कुल 87 स्थानीय सरकारें हैं। उनमें 59 फीसदी ने समलैंगिक पार्टनरशिप सिस्टम शुरू करने के नियम या तो पारित कर दिए हैं, या वे ऐसा करने की तैयारी में हैं।
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जापान की न्यूज एजेंसी क्योदो के एक सर्वे में सामने आया कि देश की ज्यादातर स्थानीय सरकारों की राय है कि सेक्सुअल माइनोरिटीज यानी समलैंगिक और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए जापान की मौजूदा राष्ट्रीय प्रणाली पर्याप्त नहीं है। रविवार को जारी हुई इस सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक क्योदो एजेंसी ने इस बारे में जिन नगरपालिकाओं और अन्य स्थानीय सरकारों के पदाधिकारियों की राय ली, उनमें किसी ने यह नहीं कहा कि मौजूदा सिस्टम काफी है। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक 36 फीसदी स्थानीय सरकारें इस दिशा में कदम उठाने को लेकर अनिश्चय में हैं।
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इस सर्वे रिपोर्ट को जापान के सामाजिक ढांचे के बीच एक महत्वपूर्ण संकेत समझा जा रहा है। जापान आज भी एक बेहद कंजरवेटिव समाज है। यहां महिलाओं को भी व्यवहार में समानता हासिल नहीं है, जबकि समलैंगिक संबंधों को लेकर आम तौर पर यहां रूढ़िवादी नजरिया रहा है। मगर विश्लेषकों के मुताबिक ताजा सर्वे इस बात का संकेत है कि जापान में भी अब सोच बदल रही है। एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन-गे-बाइसेक्सुअल-ट्रांसजेंडर-क्वीयर) अधिकारों की समर्थक संस्था निजिरो डायवर्सिटी के संस्थापक माकी मुराकी ने टोक्यो के अखबार जापान टाइम्स से कहा- ‘इस सर्वे में मिली प्रतिक्रियाओं से जाहिर होता है कि पीड़ित समूहों की आवाज स्थानीय सरकारों तक पहुंच गई है। अब गेंद डियेट (राष्ट्रीय संसद) के पाले में है।’ दूसरे विशेषज्ञों का भी कहना है कि स्थानीय सरकारें इस मामले में अपनी भूमिका निभा रही हैं, लेकिन राज्य और केंद्र सरकारों का रुख नाकाफी बना हुआ है।
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गौरतलब है कि पिछले 17 मार्च को सोपोरो स्थित डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि समलैंगिक विवाहों को मान्यता ना देने का सरकार का रुख असंवैधानिक है। यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है। गौरतलब है कि धनी देशों के समूह जी-7 के बीच जापान अकेला ऐसा देश है, जहां समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं मिली हुई है। एक विशेष कानून के तहत लिंग परिवर्तन कराने की इजाजत जरूर मिली हुई है।
इसके बीच कई नगरपालिकाओं ने अपने यहां समलैंगिक जोड़ों को पार्टनरशिप सर्टिफिकेट देने की शुरुआत की है। लेकिन इन प्रमाणपत्रों की कानूनी तौर पर कोई वैधता नहीं है। इसका मतलब यह है कि समलैंगिक जोड़ों को वे लाभ नहीं मिलते, जो अन्य विवाहित जोड़ों को मिलते हैं। इन लाभों में इलाज, और जीवन साथी के आयकर में डिडक्शन, जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसलिए अब कुछ स्थानीय सरकारों ने कहा है कि समलैंगिक विवाह को पूरी मान्यता दी जानी चाहिए। क्योदो के सर्वे के दौरान टोक्यो के एडोगावा वार्ड ने अपने जवाब में लिखा कि बिना समलैंगिक विवाहों को मान्यता दिए एलजीबीटीक्यू लोगों को टैक्स, पेंशन और उत्तराधिकार संबंधी अधिकार नहीं मिल पाएंगे। सोजा शहर की नगरपालिका ने ध्यान दिलाया है कि पार्टनरशिप सर्टिफिकेट सिर्फ एक शहर के लिए होता है। इसलिए अगर जोड़े किसी दूसरे शहर में जाते हैं, उनके सामने सारी पुरानी दिक्कतें फिर आ खड़ी होती हैं।
समलैंगिक अधिकार के समर्थकों ने इस जवाबों में उम्मीद की किरण देखी है। उनका कहना है कि ये सर्वे इस बात का संकेत है कि जापान में आम मानस अब समलैंगिक रिश्तों को स्वीकार करने के लिए तैयार हो गया है। ऐसे में केंद्रीय सरकार भी बहुत समय तक इस मामले से मुंह नहीं चुरा पाएगी।