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संकट में नेपाल चुनाव: पूर्व राजा ने क्यों की मतदान स्थगित करने की अपील? सियासत से समीकरण तक; समझिए पूरा मामला

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका Published by: शुभम कुमार Updated Thu, 19 Feb 2026 05:56 PM IST
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सार

नेपाल में चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक माहौल तनावपूर्ण हो गया है। इसका बड़ा कारण है कि पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने चुनाव स्थगित करने की अपील की है, क्योंकि उनका मानना है कि जनता की व्यापक असंतुष्टि और राजनीतिक अस्थिरता में मतदान कराना देश में संकट और संघर्ष बढ़ा सकता है।

Nepal election Days before former King message sparks political controversy News In Hindi
नेपाल चुनाव - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

नेपाल में होने वाले आम चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। एक तरफ जहां राजनीतिक पार्टियां चुनावी रण में अपना-अपना दावा ठोक रही हैं। वहीं दूसरी ओर नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के एक हालिया बयान ने पूरे मामले को और जटिल बना दिया है। शाह ने देश में जनता के बीच असंतोष का हावाल देते हुए चुनाव स्थगित करने की अपील की है। उनका कहना है कि देश में आम जनता की असंतुष्टि और राजनीतिक अस्थिरता के बीच चुनाव कराने से हालात और बिगड़ सकते हैं और संघर्ष बढ़ सकता है।

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ज्ञानेंद्र शाह को जुलाई 2008 में संसद के निर्णय से राजा पद से हटाया गया था और नेपाल में सदियों पुरानी राजशाही का अंत हो गया। लेकिन लगातार राजनीतिक अस्थिरता, सरकारों का बार-बार बदलना और जनता की नाराजगी ने उन्हें फिर से चर्चा में ला दिया है। उनके बयान अब भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

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नेपाल में पांच मार्च को होने हैं चुनाव
बता दें कि नेपाल में चुनाव 5 मार्च को होने वाले हैं। यह चुनाव पिछले साल प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली और उनके कई मंत्रियों के इस्तीफों के बाद तय किया गया। तब जेन जी के विरोध और सरकार में भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद के आरोपों के कारण इस्तीफे सामने आए थे।


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ज्ञानेनद्र शाह के बयान और इसके मायने
मामले में पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने एक वीडियो संदेश में कहा कि चुनाव को जनता की असहमति और विरोध के बीच आगे बढ़ाया जा रहा है। उनका कहना था कि जब जनता चुनाव के खिलाफ है, तब मतदान से स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। ऐसे में नेपाल की मीडिया ने उनके संदेश को इस तरह देखा कि शाह उन लोगों को प्रोत्साहित कर रहे हैं जो वर्तमान राजनीतिक प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि यह सरकार और राजनीतिक दलों पर दबाव डालने की कोशिश भी है।

हालांकि उन्होंने अस्थायी सरकार की वैधता पर सवाल उठाया और कहा कि यह सरकार पूरी तरह संवैधानिक प्रक्रिया से बनी नहीं है। इस पर सरकार की प्रतिक्रिया में एक मंत्री ने कहा कि शाह का बयान आपत्तिजनक है। वहीं, सरकार ने जोर देकर कहा कि चुनाव तय समय पर ही होंगे।

नेपाल में राजतांत्रिक आंदोलन और विरोध
दरअसल पिछले साल से नेपाल में एक राजतांत्रिक आंदोलन शुरू हुआ है, जो संसदीय हिंदू राजशाही की वापसी की मांग कर रहा है। इस आंदोलन ने काठमांडू और अन्य हिस्सों में बड़ी रैलियों को जन्म दिया। इसके समर्थक मानते हैं कि राजनीतिक अस्थिरता और बार-बार सरकार बदलने जैसी समस्याओं का समाधान राजशाही के लौटने से हो सकता है। इस आंदोलन में प्रमुख हैं राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी के नेता, जो पूर्व राजा के साथ नई समझौता कर राजनीतिक स्थिरता लाने की बात कर रहे हैं।

उन्हें हाल ही में राजतांत्रिक दुर्गा प्रसाईं को चुनाव को बाधित करने के प्रयास के आरोप में हिरासत में लिया गया। वहीं विश्लेषकों का कहना है कि इस आंदोलन की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या इसे जनता का व्यापक समर्थन मिलेगा, मुख्यधारा की पार्टियां और सुरक्षा संस्थाएं कैसे प्रतिक्रिया देती हैं, और आंदोलन की शिकायतों को राजनीतिक सुधारों के जरिए हल किया जाता है या नहीं।

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नेपाल में राजतंत्र की पूरी कहानी, यहां समझिए

गौरतलब है कि 1990 में बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली के बाद से ही नेपाल में कुछ हिस्सों में राजतंत्र का समर्थन बना रहा। 2000 के दशक में माओवादी विद्रोह और राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान यह समर्थन और मजबूत हुआ। राजा के सीधे शासन के बाद जन आंदोलनों ने संसद को बहाल करवाया और अंततः 2008 में राजशाही समाप्त कर गणराज्य की घोषणा हुई। तब से राजतांत्रिक ताकतें, राजनीतिक पार्टियों, नागरिक समूहों और प्रमुख व्यक्तियों के माध्यम से अपने एजेंडे को जीवित रखती रही हैं। ये समूह रैलियों, पार्टी राजनीति और सार्वजनिक अपील के जरिए संवैधानिक हिंदू राजशाही या राजा और दलों के बीच नई समझौता की मांग करते रहे हैं।

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