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एससीओ समिट: एक से जिनपिंग तो दूसरे से पुतिन का हाथ थामे दिखे पीएम मोदी, बिश्केक की इस तस्वीर के मायने क्या?
Tue, 01 Sep 2026 01:33 PM IST
देवेश त्रिपाठी
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बिश्केक
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बिश्केक
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Tue, 01 Sep 2026 01:33 PM IST
सार
बिश्केक में एससीओ सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की चीन और रूस के राष्ट्राध्यक्षों के साथ नजर आई तस्वीर ने भारत की विदेश नीति के बदलते स्वरूप को रेखांकित किया। एक ही मंच पर जिनपिंग और पुतिन के साथ पीएम मोदी की मौजूदगी यह बताती है कि नई दिल्ली अलग-अलग वैश्विक शक्ति केंद्रों के साथ अपने संबंधों को समानांतर रूप से आगे बढ़ा रही है।
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एससीओ शिखर सम्मेलन में चीन-रूस के राष्ट्राध्यक्षों के साथ पीएम मोदी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के शिखर सम्मेलन में मंगलवार को भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत की तस्वीर देखने को मिली। वैश्विक नेताओं के साथ ग्रुप फोटो से पहले जब राष्ट्राध्यक्ष मंच पर पहुंच रहे थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देखकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कुछ देर के लिए रुके।
इस दौरान पीएम मोदी एक ओर जिनपिंग और दूसरी ओर पुतिन के साथ हाथ थामे नजर आए। एक ही तस्वीर में दुनिया की दो बड़ी शक्तियों के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी ने भारत की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति की ओर दुनिया का ध्यान खींचा। आइए जानते हैं कि इस तस्वीर के मायने क्यों इतने खास हैं...
भारत की विदेश नीति का क्या है मास्टरस्ट्रोक?
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह रही है कि वह अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ अपने संबंधों को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश करता है। अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने के साथ भारत रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को भी बनाए हुए है। वहीं चीन के साथ सीमा विवाद और लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बावजूद बातचीत के रास्ते खुले रखे गए हैं।
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पीएम मोदी-जिनपिंग के बीच दिखी गर्मजोशी क्यों अहम?
गलवां की घटना के बाद भारत और चीन के संबंधों में लंबे समय तक तनाव रहा। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की तैनाती और सीमा विवाद दोनों देशों के बीच रिश्तों का सबसे संवेदनशील मुद्दा बना रहा। ऐसे माहौल में एससीओ सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और जिनपिंग के बीच दिखी गर्मजोशी को अहम माना जा रहा है।
हाल ही में भारत और चीन ने सीमा से जुड़े मतभेदों के प्रबंधन और आपसी संवाद को मजबूत करने के लिए कई उपायों पर सहमति जताई है। बीजिंग में एनएसए अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी की बातचीत के दौरान सैन्य स्तर पर बेहतर समन्वय के लिए अतिरिक्त बैठक बिंदु और संपर्क चैनल बनाने का फैसला हुआ। इस दौरान आठ बिंदुओं पर सहमति बनी थी। इसके तहत दोनों देश एलएसी पर तनाव और गलतफहमी रोकने के लिए नए सैन्य संपर्क केंद्र स्थापित करेंगे।
पुतिन के साथ संबंधों की अलग अहमियत क्यों?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ प्रधानमंत्री मोदी के संबंध भी भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान की वकालत की है।
रूस लंबे समय से भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है। रक्षा के साथ ऊर्जा और दूसरे रणनीतिक क्षेत्रों में भी दोनों देशों का सहयोग जारी है। पश्चिमी देशों की ओर से मॉस्को पर दबाव बढ़ने के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह खत्म नहीं किया।
रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर भी भारत ने अपने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी है। पश्चिम एशिया में संकट बढ़ने के दौरान रूस से भारत के तेल आयात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और नई दिल्ली ने बाहरी दबाव के बावजूद अपनी ऊर्जा जरूरतों के अनुरूप फैसले लेने का संकेत दिया।
एक साथ कई शक्ति केंद्रों से संवाद
भारत बन रहा वैश्विक दक्षिण की आवाज
भारत की कूटनीतिक सक्रियता केवल बड़ी शक्तियों के साथ संबंधों तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली लगातार विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से जुड़े मुद्दों को वैश्विक मंचों पर उठाती रही है। खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, विकास और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भारत वैश्विक दक्षिण की चिंताओं को प्रमुखता से सामने रख रहा है। इससे विकासशील देशों के बीच भारत की भूमिका भी व्यापक हुई है।
बिश्केक में जिनपिंग और पुतिन के साथ पीएम मोदी की तस्वीर इसी व्यापक कूटनीतिक सक्रियता की एक झलक है। इसका संदेश यह है कि भारत किसी एक शक्ति समूह का हिस्सा बनने के बजाय अलग-अलग देशों और मंचों के साथ अपने हितों के अनुरूप संबंध विकसित कर रहा है।
इसलिए एससीओ सम्मेलन की तस्वीर महज तीन नेताओं की मुलाकात भर नहीं है। इसके पीछे भारत की उस विदेश नीति की तस्वीर दिखाई देती है, जिसमें रणनीतिक स्वायत्तता, संवाद और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देते हुए बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
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इस दौरान पीएम मोदी एक ओर जिनपिंग और दूसरी ओर पुतिन के साथ हाथ थामे नजर आए। एक ही तस्वीर में दुनिया की दो बड़ी शक्तियों के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी ने भारत की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति की ओर दुनिया का ध्यान खींचा। आइए जानते हैं कि इस तस्वीर के मायने क्यों इतने खास हैं...
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भारत की विदेश नीति का क्या है मास्टरस्ट्रोक?
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह रही है कि वह अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ अपने संबंधों को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश करता है। अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने के साथ भारत रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को भी बनाए हुए है। वहीं चीन के साथ सीमा विवाद और लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बावजूद बातचीत के रास्ते खुले रखे गए हैं।
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पीएम मोदी-जिनपिंग के बीच दिखी गर्मजोशी क्यों अहम?
गलवां की घटना के बाद भारत और चीन के संबंधों में लंबे समय तक तनाव रहा। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की तैनाती और सीमा विवाद दोनों देशों के बीच रिश्तों का सबसे संवेदनशील मुद्दा बना रहा। ऐसे माहौल में एससीओ सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और जिनपिंग के बीच दिखी गर्मजोशी को अहम माना जा रहा है।
हाल ही में भारत और चीन ने सीमा से जुड़े मतभेदों के प्रबंधन और आपसी संवाद को मजबूत करने के लिए कई उपायों पर सहमति जताई है। बीजिंग में एनएसए अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी की बातचीत के दौरान सैन्य स्तर पर बेहतर समन्वय के लिए अतिरिक्त बैठक बिंदु और संपर्क चैनल बनाने का फैसला हुआ। इस दौरान आठ बिंदुओं पर सहमति बनी थी। इसके तहत दोनों देश एलएसी पर तनाव और गलतफहमी रोकने के लिए नए सैन्य संपर्क केंद्र स्थापित करेंगे।
पुतिन के साथ संबंधों की अलग अहमियत क्यों?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ प्रधानमंत्री मोदी के संबंध भी भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान की वकालत की है।
रूस लंबे समय से भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है। रक्षा के साथ ऊर्जा और दूसरे रणनीतिक क्षेत्रों में भी दोनों देशों का सहयोग जारी है। पश्चिमी देशों की ओर से मॉस्को पर दबाव बढ़ने के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह खत्म नहीं किया।
रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर भी भारत ने अपने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी है। पश्चिम एशिया में संकट बढ़ने के दौरान रूस से भारत के तेल आयात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और नई दिल्ली ने बाहरी दबाव के बावजूद अपनी ऊर्जा जरूरतों के अनुरूप फैसले लेने का संकेत दिया।
एक साथ कई शक्ति केंद्रों से संवाद
- बिश्केक में पीएम मोदी की सक्रियता भारत की उस विदेश नीति की मिसाल है, जिसमें नई दिल्ली एक साथ कई वैश्विक शक्ति केंद्रों के साथ संवाद बनाए रखना चाहती है।
- भारत अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहा है। वहीं रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध जारी हैं। चीन के साथ मतभेदों के बावजूद संवाद का सिलसिला कायम है।
- भारत क्वाड में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ काम करता है, तो एससीओ और ब्रिक्स जैसे मंचों पर चीन और रूस के साथ भी भागीदारी करता है। यह संतुलन भारत को अलग-अलग वैश्विक मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र स्थिति रखने की गुंजाइश देता है।
भारत बन रहा वैश्विक दक्षिण की आवाज
भारत की कूटनीतिक सक्रियता केवल बड़ी शक्तियों के साथ संबंधों तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली लगातार विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से जुड़े मुद्दों को वैश्विक मंचों पर उठाती रही है। खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, विकास और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भारत वैश्विक दक्षिण की चिंताओं को प्रमुखता से सामने रख रहा है। इससे विकासशील देशों के बीच भारत की भूमिका भी व्यापक हुई है।
बिश्केक में जिनपिंग और पुतिन के साथ पीएम मोदी की तस्वीर इसी व्यापक कूटनीतिक सक्रियता की एक झलक है। इसका संदेश यह है कि भारत किसी एक शक्ति समूह का हिस्सा बनने के बजाय अलग-अलग देशों और मंचों के साथ अपने हितों के अनुरूप संबंध विकसित कर रहा है।
इसलिए एससीओ सम्मेलन की तस्वीर महज तीन नेताओं की मुलाकात भर नहीं है। इसके पीछे भारत की उस विदेश नीति की तस्वीर दिखाई देती है, जिसमें रणनीतिक स्वायत्तता, संवाद और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देते हुए बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।