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Supreme Court: बिना पर्यावरण मंजूरी वाली परियोजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट में बहस, वकील ने सुरक्षा उपाय पर दिया जोर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: Nirmal Kant
Updated Thu, 26 Mar 2026 12:13 AM IST
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सार
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट में वकील सृष्टि अग्निहोत्री ने कहा कि पर्यावरण मंजूरी सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि सुरक्षा उपाय है और ‘प्रदूषण फैलाओ और भुगतान करो’ का सिद्धांत खतरनाक होगा। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भाटी ने कहा कि सरकार पर्यावरण कानूनों को कमजोर नहीं कर रही और नए नियम उद्योगों को कड़ी जांच और जुर्माने के दायरे में लाते हैं। पढ़ें रिपोर्ट-
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट में वकील सृष्टि अग्निहोत्री ने कहा कि परियोजनाओं को पूर्व पर्यावरण मंजूरी देना महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ठोस सुरक्षा उपाय है। 'प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे' के सिद्धांत को 'प्रदूषण फैलाओ और भुगतान करो' में नहीं बदला जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष सृष्टि अग्निहोत्री ने पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को भारी जुर्माने के भुगतान पर पूर्वव्यापी पर्यावरण मंजूरी देने के विचार का विरोध किया। वकील अग्निहोत्री ने कहा कि एक बार परियोजना चालू हो जाने के बाद विकल्पों का कोई भी विश्लेषण सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह जाता है, क्योंकि नुकसान पहले ही हो चुका होता है।
उन्होंने कहा, 'अगर प्रदूषण फैलाने वाले को भुगतान करना होगा' के सिद्धांत को 'प्रदूषण फैलाओ और भुगतान करो' में बदलने दिया गया तो यह एक खतरनाक स्थिति पैदा करेगा। यदि कोई परियोजना गलत तरीके से परिकल्पित है, भूकंपीय क्षेत्र में स्थित है या मिट्टी के कटाव से ग्रस्त क्षेत्र में है, तो अंततः सार्वजनिक धन की बर्बादी होती है। सृष्टि ने कहा, सुविधा के नाम पर इन मानदंडों को शिथिल करना अच्छी चीज को बुरी चीज के साथ फेंक देने के समान होगा। उन्होंने आगे चेतावनी दी कि आनुपातिकता के सिद्धांत का उपयोग गैरकानूनी गतिविधियों को उचित ठहराने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
पर्यावरण से जुड़े कानूनों को कमजोर करने की कोई सिफारिश हमारी नहीं: भाटी
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने सरकार के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि यह कोई बड़ा या सामान्य राहत देने वाला फैसला नहीं है। उन्होंने कहा, पर्यावरण से जुड़े कानूनों को कमजोर करने की कोई सिफारिश हमारी नहीं है। सरकार कानून के दायरे को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
ये भी पढ़ें: दहेज मामलों पर अदालत की सख्त टिप्पणी, कहा- सामान्य आरोपों पर ससुराल पक्ष को नहीं घसीटा जा सकता
उन्होंने नियामक व्यवस्थाओं के विकास की व्याख्या करते हुए कहा कि उद्योगों या परियोजनाओं का एक ऐसा वर्ग है जिन्हें पहले पर्यावरण संरक्षण प्रमाणपत्र (ईसी) की आवश्यकता नहीं थी, अब उन्हें इसके दायरे में लाया गया है। यहां तक कि उन इकाइयों के लिए भी जो कानूनी रूप से संचालित हो सकती थीं, पहला कदम बंद करना है और फिर उन्हें एक विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) के कठोर मूल्यांकन से गुजरना होगा, भारी पर्यावरणीय जुर्माना अदा करना होगा और पिछले नुकसान के लिए एक सुधार योजना प्रस्तुत करनी होगी।
पीठ ने कहा- क्या राज्य बिना मंजूरी के चल रही परियोजनाओं से अनभिज्ञता जता सकते हैं
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने पर्यावरण मानदंडों के प्रवर्तन को लेकर चिंता व्यक्त की और सवाल उठाया कि क्या राज्य बिना मंजूरी के चल रही परियोजनाओं से अनभिज्ञता जता सकते हैं। उन्होंने कहा, राज्य और केंद्र सरकारें कानून के शासन की संरक्षक मानी जाती हैं। हालांकि कार्यालय ज्ञापन (ओएम) में पहले चरण के रूप में बंद करने का प्रावधान है, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इससे भिन्न होती है। यदि ओएम नहीं है... तो पूर्व सहमति के बिना किसी भी कार्य में पूर्णतः बाधा उत्पन्न होती है। आपने जो व्यवस्था बनाई है, वह पर्यावरण नियमों के पालन की आवश्यकता का पूर्णतः उन्मूलन है। सुनवाई अनिर्णायक रही और अगले सप्ताह फिर से शुरू होगी।
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मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष सृष्टि अग्निहोत्री ने पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को भारी जुर्माने के भुगतान पर पूर्वव्यापी पर्यावरण मंजूरी देने के विचार का विरोध किया। वकील अग्निहोत्री ने कहा कि एक बार परियोजना चालू हो जाने के बाद विकल्पों का कोई भी विश्लेषण सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह जाता है, क्योंकि नुकसान पहले ही हो चुका होता है।
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उन्होंने कहा, 'अगर प्रदूषण फैलाने वाले को भुगतान करना होगा' के सिद्धांत को 'प्रदूषण फैलाओ और भुगतान करो' में बदलने दिया गया तो यह एक खतरनाक स्थिति पैदा करेगा। यदि कोई परियोजना गलत तरीके से परिकल्पित है, भूकंपीय क्षेत्र में स्थित है या मिट्टी के कटाव से ग्रस्त क्षेत्र में है, तो अंततः सार्वजनिक धन की बर्बादी होती है। सृष्टि ने कहा, सुविधा के नाम पर इन मानदंडों को शिथिल करना अच्छी चीज को बुरी चीज के साथ फेंक देने के समान होगा। उन्होंने आगे चेतावनी दी कि आनुपातिकता के सिद्धांत का उपयोग गैरकानूनी गतिविधियों को उचित ठहराने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
पर्यावरण से जुड़े कानूनों को कमजोर करने की कोई सिफारिश हमारी नहीं: भाटी
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने सरकार के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि यह कोई बड़ा या सामान्य राहत देने वाला फैसला नहीं है। उन्होंने कहा, पर्यावरण से जुड़े कानूनों को कमजोर करने की कोई सिफारिश हमारी नहीं है। सरकार कानून के दायरे को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
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उन्होंने नियामक व्यवस्थाओं के विकास की व्याख्या करते हुए कहा कि उद्योगों या परियोजनाओं का एक ऐसा वर्ग है जिन्हें पहले पर्यावरण संरक्षण प्रमाणपत्र (ईसी) की आवश्यकता नहीं थी, अब उन्हें इसके दायरे में लाया गया है। यहां तक कि उन इकाइयों के लिए भी जो कानूनी रूप से संचालित हो सकती थीं, पहला कदम बंद करना है और फिर उन्हें एक विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) के कठोर मूल्यांकन से गुजरना होगा, भारी पर्यावरणीय जुर्माना अदा करना होगा और पिछले नुकसान के लिए एक सुधार योजना प्रस्तुत करनी होगी।
पीठ ने कहा- क्या राज्य बिना मंजूरी के चल रही परियोजनाओं से अनभिज्ञता जता सकते हैं
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने पर्यावरण मानदंडों के प्रवर्तन को लेकर चिंता व्यक्त की और सवाल उठाया कि क्या राज्य बिना मंजूरी के चल रही परियोजनाओं से अनभिज्ञता जता सकते हैं। उन्होंने कहा, राज्य और केंद्र सरकारें कानून के शासन की संरक्षक मानी जाती हैं। हालांकि कार्यालय ज्ञापन (ओएम) में पहले चरण के रूप में बंद करने का प्रावधान है, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इससे भिन्न होती है। यदि ओएम नहीं है... तो पूर्व सहमति के बिना किसी भी कार्य में पूर्णतः बाधा उत्पन्न होती है। आपने जो व्यवस्था बनाई है, वह पर्यावरण नियमों के पालन की आवश्यकता का पूर्णतः उन्मूलन है। सुनवाई अनिर्णायक रही और अगले सप्ताह फिर से शुरू होगी।