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Sri Lanka: श्रीलंका में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान खत्म, 75% हुई वोटिंग; 2019 के मुकाबले आठ फीसदी रहा कम

Sat, 21 Sep 2024 08:01 AM IST
शिव शुक्ला वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो Published by: शिव शुक्ला Updated Sat, 21 Sep 2024 08:01 AM IST
सार


श्रीलंका में मतदाता तीन उम्मीदवारों की वरीयता क्रम के आधार पर रैंकिंग कर एक विजेता का चयन करते हैं। अगर मतगणना में किसी उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत हासिल होता है, तो उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है। लेकिन अगर कोई उम्मीदवार पूर्ण बहुमत हासिल करने में नाकाम रहता है, तो दूसरे दौर की गिनती शुरू की जाती है, जिसमें दूसरी और तीसरी वरीयता के वोटों को ध्यान में रखा जाता है।

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Sri Lanka to hold Presidential election on Today know updates
श्रीलंका - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

श्रीलंका में शनिवार को राष्ट्रपति पद के लिए मतदान सपंन्न हो गया है। इस चुनाव पर भारत समेत दुनियाभर की नजरें टिकी रहीं। 2022 में आर्थिक संकट के कारण दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गए इस द्वीप राष्ट्र में इस बार सबसे ज्यादा 39 उम्मीदवार मैदान में थे। मुख्य मुकाबला मौजूदा राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे, नेशनल पीपुल्स पांवर गठबंधन के उम्मीदवार अनुरा कुमार दिसानायके और एसजेबी नेता सजित प्रेमदासा के बीच था।

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75 फीसदी रहा मतदान प्रतिशत
श्रीलंका में शनिवार को आयोजित राष्ट्रपति चुनाव में लगभग 75 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। महानिदेशक चुनाव ने यह जानकारी दी। राष्ट्रपति चुनाव में मतदान प्रतिशत 75 फीसदी के आसपास रहा, जो नवंबर 2019 में आयोजित पिछले राष्ट्रपति चुनाव से लगभग आठ प्रतिशत कम है। उस चुनाव में 83 फीसदी वोट पड़े थे। निर्वाचन अधिकारियों ने बताया कि राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान स्थानीय समयानुसार सुबह सात बजे शुरू हुआ और शाम चार बजे तक मतदान केंद्र में प्रवेश करने वाले सभी लोगों को निर्धारित समय सीमा के बाद भी वोट डालने की अनुमति दी गई।
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ऐसे किया जाता है राष्ट्रपति का चयन
श्रीलंका में मतदाता तीन उम्मीदवारों की वरीयता क्रम के आधार पर रैंकिंग कर एक विजेता का चयन करते हैं। अगर मतगणना में किसी उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत हासिल होता है, तो उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है। लेकिन अगर कोई उम्मीदवार पूर्ण बहुमत हासिल करने में नाकाम रहता है, तो दूसरे दौर की गिनती शुरू की जाती है, जिसमें दूसरी और तीसरी वरीयता के वोटों को ध्यान में रखा जाता है। श्रीलंका में अभी तक किसी भी चुनाव में दूसरे दौर की मतगणना की जरूरत नहीं पड़ी है, क्योंकि पहले दौर की गिनती में ही स्पष्ट विजेता उभरकर सामने आया है। 
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निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे विक्रमसिंघे और मुख्य विपक्षी नेता सजित प्रेमदासा का रुख आमतौर पर भारत समर्थक माना जाता है, जबकि चुनावी सर्वे में सबसे मजबूत स्थिति में नजर आ रहे दिसानायके चीन समर्थक हैं। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का वादा करके युवाओं के बीच काफी लोकप्रियता हासिल कर चुके हैं। विक्रमसिंघे देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए बरे उठाए गए कदमों के बलबूते जीतने की उम्मीद कर रहे हैं। वहीं, प्रेमदासा नर तमिलों से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं।  


रिकॉर्ड संख्या में कुल 39 प्रत्याशी मैदान उतरे
इस साल के चुनाव में रिकॉर्ड संख्या में कुल 39 प्रत्याशी ताल ठोक रहे थे। प्रत्याशियों की सूची में तीन अल्पसंख्यक तमिल और बौद्ध भिक्षु के नाम भी शामिल थे। चुनाव आयोग ने गुरुवार को बताया कि 21 सितंबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि 39 प्रत्याशियों में एक भी महिला शामिल नहीं थी। 2019 में कराए गए चुनाव में 35 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। इससे पहले अक्तूबर, 1982 में कराए गए देश के पहले राष्ट्रपति चुनाव में केवल छह उम्मीदवारों ने पंजीकरण कराया था।

श्रीलंका में 1.7 करोड़ से अधिक मतदाता
गौरतलब है कि श्रीलंका के चुनाव में 1.7 करोड़ से अधिक मतदाता देश के राष्ट्रपति को चुनने के लिए वोट डाल सकेंगे। 22 निर्वाचन क्षेत्रों में 17 मिलियन से अधिक पात्र मतदाताओं के सामने वर्तमान राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के अलावा युवा उम्मीदवार नमल राजपक्षे जैसे विकल्प भी होंगे। इन दोनों के अलावा प्रमुख उम्मीदवारों की सूची में देश के मुख्य विपक्षी नेता साजिथ प्रेमदासा और मार्क्सवादी जेवीपी नेता अनुरा कुमारा दिसानायके जैसी हस्तियों के नाम भी शामिल हैं। 38 साल के नमल राजपक्षे को राजनीतिक खानदान- राजपक्षे वंश का उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है।

लगभग ढाई साल बाद हो रहे चुनाव की इतनी चर्चा क्यों है?
चुनाव के बारे में यह भी उल्लेखनीय है कि अप्रैल 2022 में देश को दिवालिया घोषित किए जाने के बाद यह देश का पहला चुनाव है। 1948 में ब्रिटिश हुकूमत खत्म होने के बाद अभूतपूर्व आर्थिक संकट के कारण श्रीलंका में दशकों बाद गृह युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए थे। महीनों तक चले विरोध-प्रदर्शन और जनाक्रोश के सामने तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को पद छोड़ना पड़ा था। अब लगभग ढाई साल बाद कराए जा रहे चुनाव से जुड़ी एक खास बात यह भी है कि 2022 में जनांदोलन का प्रतिनिधित्व करने वाला एक शख्स खुद भी राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल है।
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