बैकफुट पर ट्रंप: पश्चिम एशिया के तूफान ने पूरी दुनिया का अमन चैन छीना, अमेरिका-इस्राइल की लगाई आग कब बुझेगी?
ईद मनाने से पहले पश्चिम एशिया में उठे तूफान ने दुनिया की नींद हराम कर दी है।कतर के ‘रास लफ्फान’प्लांट पर ईरान के हमले के बाद भारत में भी चिंता है। ईरान ने यह हमला अपने दक्षिणी पार्स फील्ड पर इस्राइल के हमले के जवाब में किया है।
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इस संकट के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने कुवैत के क्राऊन प्रिंस, ओमान के सुल्तान, फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों और मलयेशिया के प्रधानमंत्री से बात की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने रणधीर जायसवाल ने मौजूदा संकट को केवल भारत का ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का संकट बताया है। दिलचस्प है कि ईरान को बड़ा सबक सिखाने की चेतावनी देने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इसकी गंभीरता को देखकर बैकफुट पर हैं। पूर्व विदेश सचिव शशांक का भी मानना है कि आने वाले समय में परेशानी बढ़ने वाली है। शशांक कहते हैं कि पता नहीं आने वाले समय में हमें कतर रसोई गैस की आपूर्ति करने में समर्थ है या नहीं। इस्राइल, अमेरिका द्वारा ईरान के दक्षिणी पार्स फील्ड पर हमले ने पूरी दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। ईरान ने भी इसकी प्रतिक्रिया में तेल अवीव समेत अन्य स्थानों पर हमले के साथ-साथ कतर के रास लफ्फान प्लांट पर हमला कर दिया। यहां से दुनिया के जरूरत की 20 प्रतिशत रसोई गैस की आपूर्ति होती है। अब यह लड़ाई अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच युद्ध से निकलकर तेल, गैस, प्राकृतिक संसाधन और आर्थिक पहिए की गाड़ी को ठप करने की होड़ पर आकर टिक गई है। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं समय बहुत पेंचीदा दौर में आ चुका है।
अंतरराष्ट्रीय कानून को धता बता रही है लड़ाई
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने शांति और सौहार्द को प्रमुखता देने की पहल की। संयुक्त राष्ट्र संघ बना। अंतरराष्ट्रीय नियम कानून और कायदे बने, लेकिन अब दुनिया के महाबली ही इसकी धज्जियां उड़ा रहे हैं। खास बात यह की सबकुछ आत्म रक्षा के नाम पर हो रहा है। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि सच में यह इंतिहा की तरफ बढ़ चला है। अंतरराष्ट्रीय नियम और इससे मामले का जैसे मतलब ही नहीं रहा। रंजीत कुमार कहते हैं कि पुराना मुहावरा है,‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’।आज स्थिति वैसी ही है। तेल के दाम बढ़ने से दुनिया में युद्ध से भुखमरी का खतरा बढ़ता जा रहा है। लाखों करोडों लोग बेघर, विस्थापित हो रहे हैं। मंहगाई, बेरोजगारी बढ़ रही है और दुनिया के नियामक लगातार नियम तोड़ने में रिकार्ड तोड़ रहे हैं।
आत्म रक्षा के बहाने जमकर जंगलराज
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटरेस मौजूदा लड़ाई और इसके तौर तरीके पर सवाल खड़ा करते हैं। वह इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हैं। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत वहां के बड़े नेताओं पर हमला करके उनके खात्मे को सीधे हत्या करने जैसी कार्रवाई से जोड़ते हैं। अजीब स्थिति है कि ईरान के हुक्मरान प्रतिक्रिया में इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतेन्याहू को खोजकर मारने की धमकी देते हैं। यानी इस युद्ध में हमले का निशाना सैन्य बल, उनके ठिकानों के साथ-साथ देश के हुक्मरान हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश के सैनिकों पर हमले की इजाजत तो देता है, लेकिन राष्ट्राध्यक्ष अथवा राजनीतिक नेतृत्व आदि पर हमले को अनुचित मानता है। इसे अमेरिका और इस्राइल के राष्ट्राध्यक्ष आत्मरक्षा की कार्रवाई बता रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र का चार्टर(अनुच्छेद 2(4)) किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता, राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग की इजाजत नहीं देता। दूसरे ईरान के साथ कूटनीतिक प्रयास चल रहे थे। परमाणु अप्रसार को रोकने, क्षेत्र में शांति बहाली के लिए शांति वार्ता की प्रक्रिया चल रही थी। इस दौरान अचानक 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इस्राइल के संयुक्त प्रयास में ईरान पर हमला कर दिया गया। इसे विश्व में प्रचलित कूटनीतिक प्रयास और व्यवहार का उल्लंघन माना जाता है।
अमेरिका और इस्राइल क्या कर रहे हैं?
आपरेशन एपिक फ्यूरी और आपरेशन रोरिंग लायन दुनिया को उलझन में डाल रहे हैं। अमेरिका और इस्राइल इसे आत्मरक्षा में उठाया कदम बताते हैं। ईरान जवाब में हमले को अपनी रक्षा में उठाया कदम बता रहा है। इस्राइल-अमेरिका के हमले का प्रतिवाद कर रहा है। अमेरिका और इस्राइल का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर रहा है। उसका यह प्रयास अमेरिका और इस्राइल तथा स्थिरता के लिए खतरा है। उनके यह हमले आत्मरक्षा के अनुच्छेद 51 के अंतर्गत आसन्न खतरों को खत्म करने के लिए किए गए हैं। ईरान के राजनीतिक नेतृत्व पर हमले को अमेरिका और इस्राइल सत्ता परिवर्तन (रिजीम चेंज) से जोड़ रहे हैं। दोनों देशों का तर्क है कि जबतक ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई द्वारा ईरान में खड़े किए गए तंत्र और उसके प्रभुत्व को खत्म नहीं किया जाता, तब तक उनके ऊपर(अमेरिका, इस्राइल) पर आसन्न खतरा समाप्त नहीं होगा।
ईरान के साथ खड़े हैं रूस, चीन और अलग-थलग हैं अमेरिका-इस्राइल
ईरान पर अमेरिका-इस्राइल की सैन्य कार्रवाई का रूस और चीन लगातार विरोध कर रहे हैं। दोनों देश ईरान को खुफिया जानकारी समेत अन्य परोक्ष समर्थन दे रहे हैं। ईरान ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए स्टेट ऑफ हार्मुज को ब्लाक कर दिया है। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि ईरान और उसके तेल, गैस संयंत्र पर हमले से भी ऐसा नहीं लग रहा है कि ईरान पीछे हटेगा। हां, दुनिया के देशों के लिए बड़ी परेशानी जरूर खड़ी होती जा रही है। दूसरे अमेरिका ने दुनिया के देशों से स्टेट ऑफ हार्मुज में ईरान के गतिरोध से मुक्ति के लिए आह्वान किया, लेकिन नाटो संगठन, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, रूस, चीन, उत्तर कोरिया समेत किसी भी देश ने अमेरिका का साथ नहीं दिया। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप इससे काफी खफा हैं।
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जारी रहा गतिरोध तो आगे क्या?
ईरान और इस्राइल-अमेरिका की लड़ाई छिड़ी रही तो दुनिया के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल की टिप्पणी साफ इशारा कर रही है। चीन ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और प्रबंधन का खाका खीचना शुरू कर दिया है। वह पारंपरिक, कोयला, वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों समेत अन्य को अपनाने पर जोर दे रहा है। भारत के पास तेल नहीं है, लेकिन गैस के कुछ स्रोत हैं। शशांक कहते हैं कि भारत को गैस के स्रोत को खंगालना चाहिए। हालांकि इसमें समय लगेगा। बिल्कुल साफ है कि कतर और ईरान के प्लांट, स्टेट ऑफ हार्मुज पर हमले के बाद दुनिया में ऊर्जा का संकट काफी बढ़ेगा। इसके कारण मंहगाई बढ़ेगी और विकासशील तथा अल्प विकसित देशों को इसकी त्रासदी झेलनी पड़ेगी।
आखिर कब बुझेगी अमेरिका-इस्राइल की लगाई आग?
अमेरिका के पूर्व एनएसए जॉन बोल्टन से लेकर तमाम पूर्व राजनयिक इसके लिए अपने देश में मौजूद मजबूत इस्राइली लॉबी को जिम्मेदार ठहराते हैं। ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खामेनेई भी इस स्थिति और पूर्व में हुई अशांति के लिए इस्राइल को ही जिम्मेदार ठहरा रहे थे। हालांकि इजरायल के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ट्रंप को इसकी बहुत परवाह नहीं दिखाई देती। ट्रंप इस युद्ध को जीतना चाहते हैं। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि बीच में शांति वार्ता का प्रयास शुरू हुआ था, लेकिन बंद हो गया। अब शांति बहाली के प्रयास की सूरत दिखाई नहीं दे रही है। रूस और चीन भी चाहते हैं कि अमेरिका की हेकड़ी नीचे हो। उसकी अर्थव्यवस्था पर तनाव बढ़े। यूरोप भी अमेरिका के मौजूदा तर्क से खुश नहीं है। रिश्ता भरोसे के संकट से गुजर रहा है। शशांक कहते हैं कि इसके लिए अमेरिकी कांग्रेस को ही आगे आना होगा। जब तक अमेरिकी कांग्रेस कोई ठोस पहल नहीं करेगी, मुझे नहीं लगता कि कोई रास्ता निकलने की उम्मीद है।