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हिंद-प्रशांत क्षेत्र में जंग के बादल: चीन से बढ़ता खतरा संभाल पाएगा अमेरिका? कमांडर ने किया आगाह; बढ़ी चिंता

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन Published by: Shubham Kumar Updated Tue, 28 Apr 2026 08:39 AM IST
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सार

अमेरिका इस समय ईरान के खिलाफ आक्रामक अभियान में उलझा है, वहीं हिंद-प्रशांत में चीन का दबाव बढ़ रहा है और ताइवान के आसपास हालात तनावपूर्ण हैं। इसी बीच इंडो-पैसिफिक कमांड के प्रमुख सैमुअल जे पापारो ने चेताया कि अमेरिकी हथियारों का भंडार सीमित है। ऐसे में एक साथ कई मोर्चों पर युद्ध की स्थिति अमेरिका के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती बन सकती है।

US commander highlights the threat China poses Indo-Pacific RegionNews In Hindi
अमेरिकी सेना - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

दुनिया इस समय एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ अमेरिका ईरान के खिलाफ अपने आक्रामक सैन्य अभियान में पूरी ताकत झोंक रहा है, तो दूसरी ओर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में जंग के बादल और गहरे होते जा रहे हैं। चीन लगातार सैन्य दबाव बढ़ा रहा है और ताइवान के आसपास उसकी गतिविधियां किसी बड़े हमले की रिहर्सल जैसी दिख रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है, क्या अमेरिका दो मोर्चों पर युद्ध लड़ने के लिए तैयार है या उसकी सैन्य ताकत धीरे-धीरे कमजोर हो रही है?

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इसी तनावपूर्ण माहौल के बीच 21 अप्रैल को अमेरिकी संसद की अहम सुनवाई में इंडो-पैसिफिक कमांड के प्रमुख सैमुअल जे पापारो ने चौंकाने वाला संकेत दिया। उन्होंने साफ माना कि अमेरिका के हथियारों का जखीरा असीमित नहीं है। यानी अगर युद्ध की आग एक साथ कई मोर्चों पर भड़कती है, तो अमेरिका के लिए यह लड़ाई बेहद कठिन और निर्णायक साबित हो सकती है। उन्होंने बताया कि उनके जिम्मे आने वाला इलाका हवाई से लेकर हिंद महासागर तक फैला हुआ है। 
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ईरान युद्ध से कैसे और कितनी बढ़ी चिंता?
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका तेहरान के खिलाफ युद्ध में रोजाना लगभग 1 अरब डॉलर खर्च कर रहा है। इससे मिसाइलों और हथियारों का भंडार तेजी से कम हो रहा है। डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि इस युद्ध का असर काफी गंभीर है और अमेरिका को जल्द अपने हथियारों का भंडार फिर से भरना होगा।

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इंडो-पैसिफिक से हटाई जा रही सेना
दूसरी ओर चिंता की एक और वजह यह है कि अमेरिका ने कुछ सैन्य संसाधन इंडो-पैसिफिक से हटाकर मध्य-पूर्व भेज दिए हैं। उदाहरण के लिए जापान में तैनात 31वीं मरीन यूनिट को भेजा गया। विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन भी वहां चला गया। इसके अलावा, फरवरी में अमेरिकी निगरानी उड़ानों में 30% की कमी भी दर्ज की गई।

चीन की बढ़ती ताकत अमेरिका के लिए कितना खतरनाक?
अमेरिकी कमांडर पापारो ने कहा कि चीन तेजी से अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है और ताइवान के आसपास उसकी गतिविधियां रिहर्सल जैसी लगती हैं। उन्होंने जोर दिया कि चीन की सेना दुनिया की सबसे बड़ी सेना है। उसके पास बड़ी संख्या में मिसाइलें हैं। हाइपरसोनिक मिसाइल जैसे DF-17 भी शामिल हैं। इतना ही नहीं चीन सिर्फ अपने आसपास ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सैन्य प्रभाव बढ़ाना चाहता है।

अमेरिकी कमांडर ने तीन खतरनाक युद्ध ट्रेंड भी गिनाए
इसके साथ ही इंडो-पैसिफिक कमांड के प्रमुख सैमुअल जे पापारो ने आधुनिक युद्ध के तीन बड़े ट्रेंड गिनाए। उन्होंने कहा कि अब लड़ाई सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि सूचना और साइबर हमलों से भी लड़ी जा रही है। फर्जी एआई तस्वीरों के जरिए दुश्मन पर मानसिक दबाव बनाया जा रहा है। इसके अलावा सस्ते और बड़ी संख्या में ड्रोन और बिना चालक वाले हथियार युद्ध का चेहरा बदल रहे हैं, जबकि लंबी दूरी की मिसाइलें तेजी से हमला करने की क्षमता बढ़ा रही हैं।

पापारो ने यह भी चेतावनी दी कि चीन, रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ता सहयोग अमेरिका के लिए खतरे को और जटिल बना रहा है। उनके मुताबिक, यह गठजोड़ किसी भी क्षेत्रीय संकट को और गंभीर बना सकता है। ताइवान को लेकर अमेरिका ने अपना रुख साफ रखा है। उसने कहा है कि वह ताइवान की रक्षा क्षमता को मजबूत करता रहेगा। यह नीति ताइवान संबंध अधिनियम पर आधारित है, जिसके तहत अमेरिका ताइवान को सुरक्षा सहायता देता है।

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अमेरिका की रणनीति कितनी साफ?
हालांकि अमेरिका की रणनीति साफ है कि वह चीन को सैन्य आक्रामकता से रोकना चाहता है और अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर ताकत बढ़ा रहा है। इसके साथ ही नई तकनीक और आधुनिक हथियारों में तेजी से निवेश किया जा रहा है। पापारो ने कहा कि अमेरिका को अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए ज्यादा मिसाइल और ड्रोन बनाने होंगे, एयर डिफेंस सिस्टम को मजबूत करना होगा और नौसेना व वायुसेना का विस्तार करना होगा। उन्होंने यह भी माना कि मौजूदा उत्पादन क्षमता युद्ध की जरूरतों के मुकाबले धीमी है।

अपने संशाधन बढ़ा रहा चीन, अमेरिका के लिए खतरा कैसे?
गौरतलब है कि चीन तेजी से अपने सैन्य संसाधन बढ़ा रहा है। 2024 के बाद से चीन 12 पनडुब्बियां, एक विमानवाहक पोत, 10 युद्धपोत और 7 फ्रिगेट तैयार कर चुका है, जो उसकी बढ़ती सैन्य ताकत को दिखाता है। पापारो ने साफ कहा कि 21वीं सदी में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र सबसे अहम है। अगर अमेरिका अभी तैयारी और निवेश नहीं करता, तो भविष्य में उसे कमजोर स्थिति में युद्ध का सामना करना पड़ सकता है। कुल मिलाकर, अमेरिका के सामने इस समय दोहरी चुनौती है, एक तरफ ईरान के साथ जारी संघर्ष और दूसरी ओर चीन से बढ़ता खतरा, जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर नई चिंता पैदा कर रहा है।

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