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Explainer: पिछली बार से कितनी बदली अमेरिका-ईरान की जंग, मध्यस्थता में नाकामी के बाद पाकिस्तान की क्या कूटनीति?

Tue, 14 Jul 2026 06:48 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 14 Jul 2026 06:48 PM IST
सार

अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी 2026 को युद्ध शुरू हुआ था। 17 जून दोनों देशों ने संघर्ष रोकने के लिए समझौता भी कर लिया। हालांकि, महज 20 दिन बाद ही होर्मुज को लेकर एक बार फिर अमेरिका-ईरान आमने-सामने हैं। इस बीच पाकिस्तान की तरफ से कराई गई मध्यस्थता भी सवालों के घेरे में है और दुनिया की नजर इस युद्ध के अगले पड़ाव पर लगी हैं। 

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US Iran War Hormuz Strait West Asia Conflict Attacks in Bahrain Jordan Kuwait UAE Tehran Donald Trump Pakistan
अमेरिका-ईरान संघर्ष। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध एक बार फिर भड़क गया है। दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम लागू होने से पहले 17 जून तक चली जंग के बाद अब युद्ध का एक और चरण काफी घातक बनता जा रहा है। ईरान ने इस बार युद्ध की शुरुआत ही होर्मुज में जहाजों-टैंकरों पर हमले कर के और इसे आवाजाही बंद कर के की है। वहीं, अमेरिका भी अब पीछे हटने के मूड में नहीं है। उसकी तरफ से लगातार ईरान में अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा है। जहां ईरान के निशाने अब पूरे पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी ठिकाने और सहयोगी बने हैं तो वहीं अमेरिका ने अपने हमलों को ज्यादा तीव्र कर दिया है। 
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इस पूरे घटनाक्रम के बीच विश्लेषकों की नजर दोनों देशों के बदले हुए युद्ध के तरीकों पर है। साथ ही पहली बार लागू हुए युद्ध विराम में अहम भूमिका निभाने वाले कतर और पाकिस्तान की भूमिका पर भी अब सवाल उठ रहे हैं और दोनों देशों की कूटनीति पर करीब से नजर रखी जा रही है। आइये जानते हैं कि 28 फरवरी से 17 जून तक चले अमेरिका-ईरान युद्ध और अब बीते हफ्ते शुरू हुए संघर्ष में क्या अलग है और ताजा हमलों से दोनों देशों की क्या मंशा नजर आती है...
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पहले जानें- अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध विराम खत्म कैसे हुआ?

अमेरिका और ईरान के बीच हुआ संघर्ष विराम को लेकर जो समझौता (एमओयू) हुआ था, वह अब मुख्य रूप से व्यापारिक जहाजों पर हमले और उसके बाद दोनों देशों की तरफ से एक-दूसरे पर की गई जवाबी सैन्य कार्रवाइयों की वजह से खत्म हुआ है। इसका घटनाक्रम कुछ इस तरह का रहा है...

6 जुलाई: व्यापारिक जहाजों पर ईरानी हमला
समझौते के टूटने की सीधी शुरुआत तब हुई जब ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने ओमान के तट के पास एक कतर के एलएनजी टैंकर सहित तीन व्यापारिक जहाजों पर हमला किया। ईरान का आरोप था कि ये जहाज उसकी अनुमति के बिना होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करने की कोशिश कर रहे थे। ईरान के मुताबिक, जून में अमेरिका से हुए समझौते ने उसे इस जलमार्ग के यातायात के प्रबंधन का अधिकार दिया था।

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अमेरिका-ईरान में 17 जून को लागू हो गया था संघर्ष विराम। - फोटो : अमर उजाला
7-8 जुलाई: अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और ईरान का पलटवार 
  • जहाजों पर हुए इस हमले के तुरंत बाद 7 जुलाई को अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर जवाबी हवाई हमले किए।
  • इसके जवाब में 8 जुलाई को ईरान ने बहरीन, कुवैत और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन दागे। 
  • इन हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एलान किया कि उन्हें लगता है कि युद्ध विराम अब खत्म हो चुका है। उन्होंने ईरान पर आगे और हमलों की धमकी दी।

क्या रही युद्ध विराम खत्म होने की वजह?

होर्मुज पर नियंत्रण का विवाद: अमेरिका और ईरान दोनों ने संघर्ष विराम समझौते की अलग-अलग व्याख्या की। ईरान का मानना था कि समझौते के तहत उसे इस जलमार्ग पर पूरा नियंत्रण मिल गया है। दूसरी ओर अमेरिका ने इसके प्रबंधन में हस्तक्षेप करते हुए वैकल्पिक मार्ग बनाने की कोशिश की। इसके चलते होर्मुज में जहाज-टैंकर एक साथ तीन अलग-अलग मार्गों से निकलने लगे, जिस पर ईरान भड़क गया और उसने हमले शुरू कर दिए।
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होर्मुज में जहाजों के गुजरने के लिए बने तीन रास्ते। - फोटो : अमर उजाला
इस्राइल की कार्रवाइयां: अमेरिका-ईरान के बीच हुए समझौते में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्ध रोकने की बात शामिल थी। हालांकि, इस्राइल ने खुद को इस अमेरिकी समझौते से बाध्य नहीं माना और लेबनान में हिजबुल्ला के खिलाफ अपने सैन्य हमले जारी रखे। ईरान ने इस्राइल की इन कार्रवाइयों को समझौते का सीधा उल्लंघन माना और इसके जवाब में होर्मुज को फिर से बंद करने जैसी चेतावनियां दीं। 

इन सभी घटनाओं और एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन के आरोपों के चलते शांति स्थापित करने की कोशिशें विफल हो गईं और दोनों देशों के बीच फिर से सीधी सैन्य भिड़ंत शुरू हो गई।


दोनों पक्षों की एक-दूसरे पर क्या ताजा कार्रवाई की?

युद्ध विराम टूटने के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ अपनी सैन्य और रणनीतिक कार्रवाइयां काफी तेज कर दी हैं।
 

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अमेरिका-ईरान संघर्ष - फोटो : अमर उजाला

1. अमेरिका ने अब तक क्या-क्या कदम उठाए

ईरान पर बड़े स्तर के नौसैनिक हमले: अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने होर्मुज जलडमरूमध्य में यातायात बाधित करने की ईरान की क्षमता को नष्ट करने के लिए कई सटीक हमले किए हैं। अमेरिका ने ईरान की वायु रक्षा प्रणालियों, तटीय रडार साइटों, मिसाइल/ड्रोन सुविधाओं और छोटी नौकाओं को निशाना बनाया है। इसके लिए पहली बार लड़ाकू विमानों, नौसैनिक जहाजों के साथ-साथ आत्मघाती समुद्री और हवाई ड्रोनों का भी इस्तेमाल किया गया। पश्चिमी ईरान के खुजेस्तान प्रांत में भी कम से कम आठ ठिकानों पर रात भर अमेरिकी हमले हुए।

ईरानी बंदरगाहों की पूर्ण नाकाबंदी: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 14 जुलाई से ईरान के सभी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों परफिर से पूर्ण नौसैनिक नाकाबंदी लागू कर दी है। इसके तहत किसी भी जहाज को (सिवाय मानवीय मदद के) ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश करने या वहां से निकलने की अनुमति नहीं होगी। 

अब अमेरिका भी लगाएगा होर्मुज पर शुल्क: ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका खुद को जलडमरूमध्य का रक्षक (गार्डियन) मानता है और मालवाहक जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के एवज में वह सभी कार्गो पर 20% का शुल्क वसूलेगा।
 

2. ईरान की तरफ से हुई ताजा जवाबी कार्रवाइयां

ईरान की आईआरजीसी ने पश्चिम एशिया में अमेरिका के सहयोगी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर सीधे मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं।

बहरीन: ईरान ने अल जुफेयर बेस, जहां अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा स्थित है और शेख ईसा एयर बेस पर हमला किया।
जॉर्डन: आईआरजीसी ने प्रिंस हसन एयर बेस पर हमला करके कमांड सेंटरों और कई ईंधन व गोला-बारूद डिपो में आग लगा दी। 
कुवैत: ईरान ने कुवैत में एक अमेरिकी मिसाइल बेस को निशाना बनाया और दो मिसाइल लॉन्चरों को पूरी तरह नष्ट करने का दावा किया। 
ओमान: ओमान में लंबी दूरी के हवाई और जहाज का पता लगाने वाले रडार सिस्टम को तबाह करने का दावा किया गया है।

आईआरजीसी ने ओमान के जलक्षेत्र में यूएई के दो शिपिंग टैंकरों- मोम्बासा और अल बाहिया पर क्रूज मिसाइलों से हमला किया। इस हमले से जहाजों में आग लग गई जिसमें एक भारतीय नाविक की मौत हो गई और छह अन्य भारतीयों सहित आठ क्रू सदस्य घायल हो गए। इससे पहले ईरान ने साइप्रस के झंडे वाले एक कंटेनर जहाज पर भी हमला किया था।

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अमेरिका ईरान के बीच वार-पलटवार का नया दौर। - फोटो : अमर उजाला
होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से बंद करना: ईरान ने आधिकारिक तौर पर घोषणा कर दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से बंद कर दिया गया है। इन हमलों और धमकियों के कारण इस अहम जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या पिछले पांच हफ्तों के सबसे निचले स्तर पर आ गई है।


क्या दोनों देशों के बीच इसे पूर्ण युद्ध माना जाए?

मौजूद स्थिति पूर्ण युद्ध के स्तर पर नहीं पहुंची है। हालांकि, संघर्ष विराम का समझौता टूट चुका है और दोनों देशों के बीच सैन्य हमले तेज हो गए हैं। दोनों देश अब युद्ध में एक-दूसरे के ऊर्जा बुनियादी ढांचे और नागरिक ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले करने से बच रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी पुलों या बिजली संयंत्रों जैसे नागरिक जीवन को प्रभावित करने वाले ठिकानों पर हमले की धमकियों पर अभी तक अमल नहीं किया है। साथ ही ईरान ने भी अपने हमलों को सीमित रखा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह युद्ध बेकाबू होकर भड़कने के बजाय अभी धीरे-धीरे सुलग रहा है। 

भले ही राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्ध विराम को खत्म घोषित कर दिया है, लेकिन दोनों देशों ने अभी तक बातचीत से पूरी तरह इनकार नहीं किया है। ट्रंप ने खुद संकेत दिया था कि दोनों पक्ष बातचीत जारी रखेंगे। विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही पूर्ण रूप से एक नया युद्ध शुरू नहीं करना चाहते हैं और कूटनीति के लिए अभी भी गुंजाइश बाकी है। मौजूदा हमलों को मुख्य रूप से होर्मुज पर अपना नियंत्रण साबित करने और एक-दूसरे पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।


मार्च से जून तक चले युद्ध और अब के संघर्ष में क्या अंतर?

हमलों का पैमाना और लक्ष्य बदले
फरवरी के अंत और मार्च में अमेरिका और इस्राइल ने ईरानी शहरों, ऊर्जा सुविधाओं और नागरिक बुनियादी ढांचे पर एक व्यापक हवाई अभियान चलाया था। उदाहरण के लिए, मिनाब के एक स्कूल पर हुए अमेरिकी हमले में 168 बच्चे मारे गए थे, और इसके जवाब में ईरान ने भी दुबई की गगनचुंबी इमारतों और खाड़ी देशों के तेल व गैस संयंत्रों पर मिसाइलें दागी थीं। इसके उलट मौजूदा संघर्ष मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों तक सीमित है और फिलहाल दोनों ही पक्ष नागरिक या ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने से बच रहे हैं।

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अमेरिका-ईरान संघर्ष में जनहानि। - फोटो : अमर उजाला
रणनीतिक मकसद भी बदले
पहले के युद्ध में अमेरिका और इस्राइल का मुख्य उद्देश्य ईरान के सैन्य व कमांड ढांचे को नष्ट करना और उसका परमाणु निरस्त्रीकरण करना था, जिसके तहत युद्ध के पहले ही दिन ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या कर दी गई थी। लेकिन अब जो लड़ाई हो रही है, वह लगभग पूरी तरह से होर्मुज जलडमरूमध्य के नियंत्रण को लेकर एक-दूसरे को पीछे हटने पर मजबूर करने पर केंद्रित है।

इस्राइल की भूमिका सीमित
पहले चरण के युद्ध में इस्राइल एक मुख्य भागीदार था और उसने अमेरिका के साथ मिलकर खुले तौर पर ईरान पर हमले किए थे। हालांकि, इस ताजा संघर्ष में इस्राइल खुले तौर पर ईरान पर हो रहे अमेरिकी हमलों में शामिल नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका और इस्राइल के ईरान को लेकर अलग-अलग लक्ष्य भी हैं। इसे लेकर ट्रंप और नेतन्याहू में मतभेद भी हो चुका है। हालांकि, इस्राइल लेबनान में अपने सैन्य अभियान जारी रखे हुए है। 

कूटनीति और बातचीत का दौर जारी 
फरवरी और मार्च के दौरान धमकियों और संघर्ष का दौर अपने चरम पर था और अमेरिका-इस्राइल ने ईरान पर बेतरतीब हमले जारी रखे थे। जवाब में ईरान ने भी पलटवार किया और क्षेत्र में मौजूद देशों की मध्यस्थता की कोशिश को नकार दिया। लेकिन मौजूदा हमलों के बीच भी अमेरिका और ईरान ने बातचीत के विकल्प को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। 

एक तरफ ट्रंप ने माना है कि दोनों पक्ष बातचीत जारी रखेंगे तो दूसरी तरफ कतर-पाकिस्तान जैसे देश अभी भी तनाव कम करने के लिए पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं। 

अमेरिकी की घरेलू राजनीति और संसद का दबाव
राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अब घरेलू राजनीतिक स्थिति अलग है। उन पर वॉर पॉवर्स एक्ट को लेकर दबाव है, जिसके तहत 60 दिन से अधिक समय तक सैन्य कार्रवाई जारी रखने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी की जरूरत होती है। इसके अलावा, अमेरिका में युद्ध लगातार अलोकप्रिय हो रहा है और बढ़ती महंगाई, तेल की उच्च कीमतों की वजह से ट्रंप की लोकप्रियता में भी गिरावट आई है। इसका असर यह हुआ है कि अमेरिका अब ईरान के खिलाफ युद्ध में फूंक-फूंक कर कदम उठा रहा है। 


पाकिस्तान की नाकाम मध्यस्थता में अब आगे क्या?

1. कोशिश में जुटा है पाकिस्तान-अन्य मध्यस्थ
पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुआ अमेरिका-ईरान समझौता टूटने के बावजूद वह और अन्य मध्यस्थ देश, जैसे- कतर और ओमान अभी भी कूटनीतिक प्रयास जारी रखे हुए हैं। हमलों के फिर से शुरू होने के बाद, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उप-प्रधानमंत्री इशाक डार लगातार ईरानी नेताओं- राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और विदेश मंत्री अब्बास अरागची के संपर्क में हैं। वे चेतावनी दे रहे हैं कि शांति के प्रयास खतरे में हैं और बातचीत ही इस संकट को सुलझाने का एकमात्र रास्ता है। 

2. समझौता कराया, पर उसे लागू कराने की ताकत नहीं
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान के पास इस समझौते को लागू करवाने की वास्तविक शक्ति या साधन नहीं हैं। इसके अलावा एक अहम बात यह है कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के मुद्दे को पाकिस्तान की मध्यस्थता के एजेंडे से पहले ही हटा दिया था, क्योंकि ईरान नहीं चाहता था कि वॉशिंगटन को इसमें कोई राजनीतिक चाल चलने का मौका मिले। ईरान इसे मुख्य रूप से ओमान के साथ एक द्विपक्षीय मामला मानता है। 

3. शक्ति संतुलन के लिए सैन्य दबाव
मौजूदा संघर्ष में कूटनीति के लिए जगह कम हो गई है। दोनों देश अब बातचीत की मेज पर लौटने से पहले शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में करने के लिए सैन्य हमलों का सहारा ले रहे हैं। कतर की जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर पॉल मसग्रेव के मुताबिक, पिछले संघर्ष के बाद जहां ईरान की आकांक्षाएं बढ़ गई हैं, वहीं अमेरिका की कम हुई हैं। इसके बावजूद जब तक दोनों पक्षों को यह नहीं लगता कि पलड़ा किसी एक की तरफ झुक गया है, तब तक वे पूरी तरह से फिर से बातचीत के लिए तैयार नहीं होंगे।

4. क्या है समझौते की औपचारिक स्थिति 
भले ही दोनों देश एक-दूसरे पर हमले कर रहे हैं, लेकिन किसी भी पक्ष ने औपचारिक रूप से एमओयू को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। ईरान इन हमलों को समझौते से बाहर निकलने के बजाय अमेरिकी उल्लंघनों की प्रतिक्रिया बता रहा है, जिससे भविष्य में बातचीत के लिए उम्मीद की एक किरण बाकी है। ऐसे में भले ही वर्तमान में पाकिस्तान की मध्यस्थता बेअसर दिख रही हो, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान को अमेरिका और ईरान दोनों का भरोसा हासिल है। इसलिए जब भी दोनों देश किसी गतिरोध को दूर करने के लिए तैयार होंगे, मध्यस्थों का हस्तक्षेप और पाकिस्तान की भूमिका फिर से सामने आएगी।

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