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होर्मुज में टैंकर, टेंशन और टकराव: क्या महंगा हो जाएगा तेल? ट्रंप के फैसले से दोगुना हो सकता है शिपिंग खर्च

Tue, 14 Jul 2026 02:01 PM IST
प्रशांत तिवारी वर्ल्ड डेस्क, नई दिल्ली
वर्ल्ड डेस्क, नई दिल्ली Published by: प्रशांत तिवारी Updated Tue, 14 Jul 2026 02:01 PM IST
सार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले सभी कार्गो पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाने का प्रस्ताव दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह लागू हुआ तो तेल और अन्य सामान की शिपिंग लागत दोगुनी तक बढ़ सकती है, जिसका असर वैश्विक तेल कीमतों, सप्लाई चेन और उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। 

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Will oil prices rise Trump decision could double shipping costs in Hormuz
जहाज - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और अन्य सामान ले जाने पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाए जाने की संभावना ने वैश्विक शिपिंग कंपनियों और लॉजिस्टिक्स सेक्टर की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रस्ताव लागू हुआ तो तेल और अन्य उत्पादों के समुद्री परिवहन की लागत में भारी उछाल आ सकता है।

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क्या है ट्रंप का नया प्रस्ताव?
शिपिंग ऑपरेटरों और लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर जो शुल्क लगाने की योजना बना रहे हैं, उससे इस अहम समुद्री मार्ग के जरिए तेल और अन्य उत्पादों की ढुलाई काफी महंगी हो जाएगी। सोमवार को ट्रंप ने कहा कि अमेरिका इस जलमार्ग का उपयोग करने वाले जहाजों को सैन्य सुरक्षा उपलब्ध कराने की लागत की भरपाई के लिए जलडमरूमध्य से गुजरने वाले सभी कार्गो पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाएगा।
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क्या यह शुल्क वास्तव में लागू हो पाएगा?
कुछ विश्लेषकों ने इस बात पर संदेह जताया है कि इतना बड़ा शुल्क व्यवहारिक रूप से लागू किया जा सकेगा या नहीं। उनका कहना है कि इससे परिवहन लागत में असामान्य वृद्धि होगी। फिलहाल जहाज संचालकों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह शुल्क नहीं, बल्कि ईरान और अमेरिका के बीच लगातार बढ़ता तनाव है। इसके बावजूद यह तथ्य चिंता बढ़ाता है कि अमेरिका, जो लंबे समय से इस जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता का समर्थक रहा है, अब खुद शुल्क लगाने की बात कर रहा है। खासकर प्रस्तावित शुल्क की दर बेहद अधिक मानी जा रही है।
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20 प्रतिशत शुल्क की गणना कैसे होगी?
ट्रंप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि 20 प्रतिशत शुल्क किस आधार पर तय किया जाएगा। हालांकि यदि यह शुल्क कार्गो के मूल्य के आधार पर लगाया गया, तो होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते तेल भेजने की लागत दोगुनी से भी अधिक हो सकती है।

तेल की ढुलाई कितनी महंगी हो सकती है?
आईएनजी रिसर्च में लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ और वरिष्ठ अर्थशास्त्री रिको लुमन के अनुसार, टैंकर कंपनियां फारस की खाड़ी से यूरोप तक तेल पहुंचाने के लिए लगभग 10 डॉलर प्रति बैरल का शुल्क लेती हैं। एक बैरल तेल की कीमत करीब 80 डॉलर मानें तो 20 प्रतिशत शुल्क के कारण प्रति बैरल लगभग 16 डॉलर अतिरिक्त जुड़ सकते हैं। इस तरह कुल परिवहन लागत बढ़कर करीब 26 डॉलर प्रति बैरल हो जाएगी। करीब 20 लाख बैरल तेल ले जाने वाले एक बड़े टैंकर के लिए यह अतिरिक्त लागत 3 करोड़ डॉलर से भी ज्यादा हो सकती है। ऐसी स्थिति में तेल आयातक इस बढ़े हुए खर्च का बड़ा हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका और ईरान में टकराव क्यों है?
होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया के कुल तेल कारोबार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता था। अमेरिकी सेना जहाजों को ओमान के नजदीकी मार्ग से सुरक्षित निकालने की कोशिश कर रही है। वहीं ईरान ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि जहाजों की आवाजाही पर नियंत्रण उसका होना चाहिए। हाल के दिनों में ईरान ने ओमान वाले मार्ग का इस्तेमाल करने वाले कुछ जहाजों पर हमले किए, जिसके जवाब में अमेरिका ने भी ईरान पर कार्रवाई की।

ईरान के रास्ते गुजरने वाले जहाजों पर क्या असर पड़ेगा?
कई जहाज ईरान की अनुमति लेकर उसके तटीय मार्गों से इस जलडमरूमध्य को पार करते रहे हैं। सोमवार को ट्रंप ने यह भी घोषणा की कि ईरानी बंदरगाहों का इस्तेमाल करने वाले जहाजों के खिलाफ अमेरिका फिर से नौसैनिक नाकेबंदी लागू करेगा।

विशेषज्ञों को किस बात की सबसे ज्यादा चिंता है?
एनर्जी मार्केट एनालिसिस फर्म 'स्पार्टा' में ऑयल रिसर्च प्रमुख नील क्रॉस्बी का कहना है कि उन्हें संदेह है कि यह शुल्क लागू हो पाएगा। लेकिन यदि ऐसा हुआ तो जहाज संचालकों के सामने मुश्किल स्थिति होगी। उनके मुताबिक ऑपरेटरों को तय करना होगा कि वे अतिरिक्त शुल्क देकर ईरानी हमलों का जोखिम उठाएं या फिर अमेरिकी निर्देशों की अनदेखी कर ईरान के साथ काम करें। उन्होंने कहा, 'यह सिर्फ हमलों का मामला नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र में जहाज मालिकों के लिए असहज माहौल बनने की आशंका भी है।' 

शिपिंग कंपनियां इस प्रस्ताव को कैसे देख रही हैं?
दो जहाज संचालकों ने नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बताया कि प्रस्तावित शुल्क इतना अधिक है कि यह उस रकम से भी ज्यादा होगा, जितना वे पूरे जलडमरूमध्य से कार्गो ढुलाई के लिए वसूलते हैं।

दुनिया के दूसरे जलडमरूमध्यों से यह कितना अलग है?
वर्जीनिया यूनिवर्सिटी में सप्लाई चेन विशेषज्ञ और एसोसिएट प्रोफेसर विद्या मणि ने कहा कि 20 प्रतिशत शुल्क बेहद बड़ा आर्थिक बोझ होगा। उन्होंने बताया कि दक्षिण-पूर्व एशिया के मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए स्वैच्छिक शुल्क कार्गो की कीमत के 0.5 प्रतिशत से भी कम रहा है।

ईरान पहले भी शुल्क वसूलने की कोशिश कर चुका है?
ईरान पहले भी इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क लेने की कोशिश कर चुका है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कितने जहाजों ने भुगतान किया और ईरान वास्तव में कितनी राशि वसूलता रहा है। सोमवार को ट्रंप के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, '20 प्रतिशत निश्चित रूप से बहुत ज्यादा है। हम निष्पक्ष रहेंगे।' 


ये भी पढ़ें: UN में फलस्तीन की सदस्यता को भारत का समर्थन: ब्रुसेल्स की बैठक में एलान, इस्राइल को लेकर क्या कहा?

अंतरराष्ट्रीय कानून इस पर क्या कहता है?
जब-जब ईरान ने इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क लेने की कोशिश की, तब-तब अमेरिकी अधिकारियों ने इसका विरोध किया। उनका कहना रहा कि युद्ध से पहले इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर किसी तरह का शुल्क नहीं लिया जाता था। जून के आखिर में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा था,'किसी भी देश को अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर टोल या शुल्क लेने की अनुमति नहीं है। यही मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानून है।'

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