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वॉशिंगटन पोस्ट में छंटनी क्यों?: अखबार 150 साल पुराना, 22 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति वाले बेजोस का इस पर हक

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 05 Feb 2026 03:47 PM IST
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सार

जेफ बेजोस के मालिकाना हक वाले द वॉशिंगटन पोस्ट ने बुधवार को अपने एक-तिहाई कर्मचारियों को नौकरी से हटाने का ईमेल भेजा। यह पोस्ट की अब तक की सबसे बड़ी छंटनी है, जिसमें खेल से लेकर बुक सेक्शन सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। इसके अलावा विदेश में कुछ ब्यूरो को बंद कर दिया गया और वरिष्ठ पत्रकारों को भी हटा दिया गया। 

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वॉशिंगटन पोस्ट में हुई छंटनी के बाद इसके मालिक जेफ बेजोस पर उठे सवाल। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अमेरिका के प्रमुख प्रतिष्ठित अखबारों में से एक 'द वॉशिंगटन पोस्ट' में बड़े स्तर पर छंटनी की गई है। बुधवार को जेफ बेजोस के मालिकाना हक वाले इस अखबार के करीब एक-तिहाई कार्यबल को निकाल दिया गया। बताया गया है कि अखबार ने कई अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो, मेट्रो संस्करणों और खेल विभाग में बड़े स्तर पर छंटनी की है। विशेषज्ञों की मानें तो यह अखबार के 150 साल के इतिहास में कार्यबल में सबसे बड़ी कटौती है। पोस्ट की ओर से की गई इस छंटनी को लेकर जहां दुनियाभर के मीडिया जानकार अखबार की गिरती साख को मुद्दा बना रहे हैं, वहीं कुछ और विश्लेषकों ने इसके लिए सीधे तौर पर अरबपति कारोबारी बेजोस को ही घेरा है। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर 'द वॉशिंगटन पोस्ट' का क्या इतिहास है?  अखबार में यह छंटनी क्यों और कितने बड़े स्तर पर हुई है? अखबार ने अपने किन विभागों-संस्करणों को बंद कर दिया है? इससे किन नामी पत्रकारों की सेवाएं समाप्त हुई हैं? अखबार में हुई इस छंटनी के पीछे क्या वजह बताई गई है? निकाले गए पत्रकारों ने इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया दी है? मामले में विश्लेषकों ने क्या कहा है? कैसे जेफ बेजोस के समय में अखबार पर लगातार पत्रकारिता के मानकों को नीचे गिराने और इस पर ट्रंप की नीतियों से प्रभावित होने के आरोप लगते रहे हैं? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- क्या है द वॉशिंगटन पोस्ट का इतिहास?

वॉशिंगटन पोस्ट अमेरिका के सबसे प्रभावशाली और ऐतिहासिक अखबारों में से एक है। इसका इतिहास करीब 150 साल पुराना है। इसकी शुरुआत 1877 में हुई थी। यह एक क्षेत्रीय समाचार पत्र के रूप में शुरू हुआ। हालांकि, अपने खोजी पत्रकारों की टीम के जरिए इस संस्थान ने धीरे-धीरे अमेरिका और फिर वैश्विक स्तर पर पहचान बना ली। इसका स्वामित्व कई दशकों तक अमेरिका के प्रतिष्ठित 'ग्राहम परिवार' के पास रहा। इसका मोटा (ध्येय वाक्य)- डेमोक्रेसी डाइज इन डार्कनेस (लोकतंत्र अंधेरे में मर जाता है) आज भी काफी प्रचलित है।

वॉटरगेट स्कैंडल के खुलासे ने बनाया सितारा: वॉशिंगटन पोस्ट के इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ वॉटरगेट घोटाले की वह खोजी रिपोर्टिंग थी, जिसका नेतृत्व बॉब वुडवर्ड और कार्ल बर्नस्टीन ने किया था। इस रिपोर्टिंग को आधुनिक पत्रकारिता के सबसे अहम पलों में गिना जाता है। 

दो संपादकों को मिलता है शिखर पर पहुंचाने का श्रेय: लंबे समय तक संपादक रहे बेन ब्रैडली के कार्यकाल के दौरान, समाचार पत्र का स्टाइल सेक्शन अपनी विशेष फीचर लेखन शैली के लिए देश भर में लोकप्रिय हुआ। पूर्व कार्यकारी संपादक मार्डी बैरन के नेतृत्व में भी अखबार ने आक्रामक रूप से विस्तार किया और खोजी पत्रकारिता में भारी निवेश किया।

जेफ बेजोस के पास कैसे आया मालिकाना हक?

द वॉशिंगटन पोस्ट जब ग्राहम परिवार के पास था, तब इसकी खोजी पत्रकारिता को वैश्विक स्तर पर मानक माना जाता था। हालांकि, अखबार आधुनिक समय में डिजिटल फॉर्मेट के आने की वजह से नुकसान में जा रहा था। इसका सर्कुलेशन लगातार गिर रहा था। ऐसे में अखबार को डिजिटल स्तर पर आगे ले जाने और इसके तकनीकी निवेश को बढ़ावा देने के लिए निवेश की जरूरत हुई। 

2013 वह साल था, जब अमेजन के संस्थापक और अरबपति कारोबारी जेफ बेजोस ने वॉशिगंटन पोस्ट को आगे बढ़ाने के लिए इसे 25 करोड़ डॉलर में खरीद लिया। बेजोस के स्वामित्व में आने के बाद न्यूजरूम के आकार को बढ़ाया गया और तकनीक और डिजिटल इंटरफेस पर भी निवेश किया गया। अपने उच्चतम स्तर पर वॉशिंगटन पोस्ट का स्टाफ पहले के मुकाबले 85 फीसदी तक भर्ती बढ़ा चुका था। 

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वॉशिंगटन पोस्ट में कितने बड़े स्तर पर हुई है हालिया छंटनी?

वॉशिंगटन पोस्ट ने हाल ही में अपने कार्यबल में व्यापक स्तर पर कटौती की है, जिसके तहत संस्थान के लगभग एक-तिहाई कर्मचारियों की छंटनी कर दी गई है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस छंटनी में 300 से ज्यादा पत्रकारों और संपादकों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है। 

घरेलू स्तर पर
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अखबार ने अपने मेट्रो डेस्क में 70 प्रतिशत की भारी कमी की है। इससे वहां की टीम 40 पत्रकारों से घटकर अब सिर्फ 12 रह गई है। इसके अलावा, दशकों पुराने स्पोर्ट्स सेक्शन और बुक्स सेक्शन को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। संस्थान के पॉडकास्ट यूनिट पर भी गाज गिरी है, जिसके तहत इनके मुख्य पॉडकास्ट 'पोस्ट रिपोर्ट्स' को निलंबित कर दिया गया है।

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अखबार की पहुंच को काफी सीमित कर दिया गया है। वॉशिंगटन पोस्ट ने पश्चिम एशिया के अपने सभी संवाददाताओं और संपादकों को हटा दिया है और येरूशलम, यूक्रेन और नई दिल्ली जैसे अहम केंद्रों के ब्यूरो बंद कर दिए गए हैं। प्रभावित होने वाले प्रमुख पत्रकारों में नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा और वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय कॉलम्निस्ट ईशान थरूर (शशि थरूर के बेटे) शामिल हैं।

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वॉशिंगटन पोस्ट ने छंटनी के पीछे क्या वजह बताई?

वॉशिंगटन पोस्ट में इतनी बड़ी संख्या में छंटनी के पीछे मुख्य रूप से वित्तीय घाटा, सब्सक्राइबर्स की घटती संख्या और संस्थान के काम करने के पुराने तरीके में बदलाव जैसे कारण बताए गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अखबार को पिछले दो वर्षों में लगभग 17.7 करोड़ डॉलर का भारी वित्तीय घाटा हुआ है। इसके साथ ही सब्सक्राइबर्स की संख्या में भी बड़ी गिरावट देखी गई है। ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान इसके सब्सक्राइबर्स की संख्या 30 लाख के शिखर पर पहुंच गई थी, जो अब काफी कम हो गई है। विज्ञापन से होने वाली आय में कमी और प्रिंट मीडिया के पाठकों की घटती संख्या को भी इसके लिए जिम्मेदार माना गया है।



अखबार के कार्यकारी संपादक मैट मरे ने इन कटौतियों को एक 'रणनीतिक रिसेट' बताया है। उनका तर्क है कि अखबार को अब उन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, जिनका प्रभाव सबसे अधिक होता है, जैसे कि संघीय राजनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकारी निगरानी। वॉशिंगटन पोस्ट के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि अखबार का आंतरिक ढांचा अभी भी उस पुराने दौर के हिसाब से बना हुआ था, जब यह एक स्थानीय प्रिंट अखबार के रूप में एकाधिकार रखता था। डिजिटल युग की चुनौतियों और पाठकों की बदलती आदतों के अनुसार खुद को ढालने के लिए इस ढांचे को बदलना अनिवार्य बताया गया है। मैट मरे के मुताबिक, अखबार का कवरेज अक्सर पाठकों के एक बहुत छोटे हिस्से को ही आकर्षित कर रहा था, जबकि इसे व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचने की जरूरत है।

निकाले गए पत्रकारों ने क्या प्रतिक्रिया दी?

वॉशिंगटन पोस्ट से निकाले गए पत्रकारों ने सोशल मीडिया और अन्य जरियों से छंटनी को लेकर गहरी निराशा और दुख व्यक्त किया है। वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय मामलों के स्तंभकार ईशान थरूर ने कहा कि वह न्यूजरूम और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेवा देने वाले बेजोड़ पत्रकारों के लिए दुख महसूस कर रहे हैं। उन्होंने इसे एक बुरा दिन बताया और खाली न्यूजरूम की एक तस्वीर भी साझा की।

नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि वह बहुत दुखी हैं और अपने उन कई प्रतिभाशाली मित्रों के लिए आहत हैं, जिन्हें हटाया गया है। उन्होंने अखबार के लिए काम करने को एक विशेषाधिकार और सम्मान बताया। मिस्र स्थित काहिरा ब्यूरो चीफ क्लेयर पार्कर ने अपनी और पूरी पश्चिम एशिया रिपोर्टिंग टीम की छंटनी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस तर्क को समझना कठिन है।
 

यूक्रेन की संवाददाता लिजी जॉनसन, जो युद्ध क्षेत्र से रिपोर्टिंग कर रही थीं, ने कहा कि उनके पास कोई शब्द नहीं हैं और वह इस फैसले से पूरी तरह टूट गई हैं। इसी तरह, नस्ल और जातीयता मामलों के पहले संवाददाता इमैनुएल फेल्टन ने इसे वित्तीय नहीं, बल्कि एक वैचारिक फैसला करार दिया।

कई पत्रकारों ने इस पूरी प्रक्रिया को अचानक और भावनात्मक रूप से विनाशकारी बताया, क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी जाने की जानकारी ईमेल के माध्यम से मिली थी। वॉशिंगटन पोस्ट गिल्ड (यूनियन) ने जेफ बेजोस की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर वह इसके मिशन में निवेश करने के इच्छुक नहीं हैं, तो इस संस्थान को एक ऐसे संरक्षक की आवश्यकता है जो इसे समझ सके। पूर्व कार्यकारी संपादक मार्टिन बैरन ने इन फैसलों की कड़ी आलोचना करते हुए इसे एक खुद खड़े किए गए ब्रांड के विनाश का उदाहरण बताया और कहा कि मालिक (बेजोस) ने उन मूल्यों के साथ विश्वासघात किया है, जिन्हें उन्हें बनाए रखना चाहिए था।

विश्लेषकों ने वॉशिंगटन पोस्ट की छंटनी पर क्या कहा?

वॉशिंगटन पोस्ट में हुई भारी छंटनी पर मीडिया विश्लेषकों और विशेषज्ञों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसके लंबी अवधि के परिणामों पर चिंता जताई है। द नेशन (The Nation) के संपादक जैक मिर्किंसन कहते हैं कि यह कोई वित्तीय निर्णय नहीं है, क्योंकि जेफ बेजोस की कुल संपत्ति 250 बिलियन डॉलर से अधिक है और वे करोड़ों का नुकसान सहने में सक्षम हैं। मिर्किंसन के मुताबिक, यह मूल रूप से बेजोस का पोस्ट को नष्ट करने का एक राजनीतिक और व्यक्तिगत निर्णय है। पूर्व कार्यकारी संपादक मार्टिन बैरन ने इसे ब्रांड के विनाश का एक बड़ा उदाहरण बताया है। उन्होंने कहा कि वफादार पाठक इसलिए दूर जा रहे हैं क्योंकि मालिक ने उन मूल्यों के साथ विश्वासघात किया है जिन्हें उन्हें बनाए रखना चाहिए था।

कोलंबिया विश्वविद्यालय की पत्रकारिता प्रोफेसर मार्गरेट सुलिवन ने इस छंटनी को अमेरिका और दुनियाभर की पत्रकारिता के लिए विनाशकारी खबर बताया है। कुछ विश्लेषकों और पूर्व संपादकों का मानना है कि अखबार अब खुद को एक संकुचित संघीय शक्ति के प्रकाशक के तौर पर बदल रहा है, जो न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ व्यापक मुकाबले के बजाय पॉलिटिको जैसे विशेष आउटलेट्स के साथ मुकाबला करेगा। नेशनल प्रेस क्लब के अध्यक्ष मार्क शोफ जूनियर ने इसे पत्रकारिता के पेशे के लिए एक बड़ा झटका करार दिया है।

डेमोक्रेट नेता और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की पूर्व स्पीकर नैंसी पेलोसी ने इसे कॉर्पोरेट निर्णयों के जरिए न्यूजरूम को खोखला करने का एक दुखद पैटर्न करार दिया। उन्होंने इसे देश के लोकतंत्र को कमजोर करने वाला फैसला बताया। डेमोक्रेट सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने बेजोस के निजी आलीशान जिंदगी पर होने वाले खर्च का हवाला देते हुए कहा कि छंटनी की कोई वित्तीय आवश्यकता नहीं थी। इसके अलावा, वॉशिंगटन पोस्ट गिल्ड ने चेतावनी दी है कि इन कटौतियों के बाद न्यूजरूम उस आकार से भी छोटा हो सकता है, जितना बेजोस के इसे खरीदने के समय था। विश्लेषकों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि वर्तमान नेतृत्व के फैसले जारी रहे, तो अखबार का अस्तित्व और भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

वॉशिंगटन पोस्ट में हुई छंटनी, बेजोस क्यों घिरे?

अमेरिकी सांसद बर्नी सैंडर्स की तरफ से बेजोस की विलासितापूर्ण जिंदगी पर होने वाले खर्च का मुद्दा उठाया गया है। दरअसल, जेफ बेजोस दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों में शामिल हैं। फोर्ब्स के मुताबिक, जेफ बेजोस की कुल संपत्ति करीब 244 अरब डॉलर (22 लाख करोड़ रुपये) है और वे दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में चौथे नंबर पर हैं। 



जेफ बेजोस के खिलाफ सोशल मीडिया पर भी आवाज उठी है। कई लोगों ने उनके महंगे तलाक और उसके बाद करोड़ों खर्च कर एक पत्रकार से की गई शादी के आंकड़े सामने रखे हैं। बता दें कि जेफ बेजोस का 2019 में अपनी पहली पत्नी मैकेंजी स्कॉट से तलाक हो गया था। तब बेजोस को इस तलाक के लिए मैकेंजी को करीब 38 अरब डॉलर (3.5 लाख करोड़ रुपये) की संपत्ति देनी पड़ी थी। 

इतना ही नहीं बीते साल बेजोस ने फॉक्स न्यूज की पूर्व पत्रकार और गर्लफ्रेंड लॉरेन सांचेज से शादी की थी। इटली में हुई इस शादी में उस वक्त बेजोस ने करीब 5.5 करोड़ डॉलर (करीब 400 करोड़ रुपये) खर्च किए थे, जो कि महंगी शादियों का एक रिकॉर्ड माना जाता है। उनकी शादी में हॉलीवुड एक्टर्स से लेकर मॉडल्स और गायकों तक पर करोड़ों खर्च हुए थे। अब वॉशिंगटन पोस्ट में अमेरिकी सांसदों और विश्लेषकों ने बेजोस की इसी विलासिता पूर्ण जिंदगी पर सवाल उठाए हैं। 

क्या छंटनी में भी ट्रंप की भूमिका?

अमेरिकी मीडिया समूह सीएनएन और द न्यूयॉर्कर ने वॉशिंगटन पोस्ट में हुई छंटनी को लेकर लेख प्रकाशित किए हैं। इनमें साफ किया गया है कि जहां जेफ बेजोस ने ट्रंप के पहले कार्यकाल (2017-2021) के बीच वॉशिंगटन पोस्ट की निष्पक्ष छवि को बरकरार रखते हुए संपादकीय बोर्ड को एक हद तक स्वतंत्र रखा था। हालांकि, 2025 में ट्रंप के लौटने के बाद बेजोस ने ट्रंप के साथ अपने संबंधों को फिर से संतुलित करने की कोशिश शुरू कर दी। 

1. बेजोस के ट्रंप के लिए बदलते रुख पर एक बड़ी चर्चा तब शुरू हुई, जब वॉशिंगटन पोस्ट ने नवंबर 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में किसी भी उम्मीदवार का समर्थन (एंडोर्समेंट) न करने का निर्णय लिया। यह अखबार की दशकों पुरानी परंपरा के विपरीत था और इसे बेजोस के हस्तक्षेप के रूप में देखा गया। इस फैसले के विरोध में पाठकों ने लगभग 2,00,000 डिजिटल सब्सक्रिप्शन रद्द कर दिए थे।

2. सीएनएन के मुताबिक, मार्च 2025 में इसका असर दिखना शुरू हुआ था। तब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से जेफ बेजोस की तारीफ की थी। उन्होंने कहा था कि बेजोस वॉशिंगटन पोस्ट के साथ एक असली काम कर रहे हैं। बता दें कि अपने पहले कार्यकाल के दौरान डोनाल्ड ट्रंप वॉशिंगटन पोस्ट के जबरदस्त आलोचक रहे थे और उन्होंने कई मौकों पर इस अखबार पर नकारात्मक टिप्पणियां की थीं। 

3. सीनेटर सैंडर्स ने बेजोस की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी मेलानिया ट्रंप पर आधारित एक फिल्म- मेलानिया के लिए 7.5 करोड़ डॉलर खर्च किए। सैंडर्स का तर्क था कि जो व्यक्ति इतनी बड़ी राशि इन (ट्रंप से जुड़े) कार्यों पर खर्च कर सकता है, उसे वित्तीय घाटे का बहाना बनाकर पत्रकारों की छंटनी नहीं करनी चाहिए।

4. बेजोस के स्वामित्व में अखबार के ओपिनियन सेक्शन को नया रूप दिया गया है, जिसका ध्यान अब व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मुक्त बाजार पर ज्यादा है। रिप्रजेंटेटिव अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज ने इसे राजनीतिक एजेंडे वाले अरबपतियों के मीडिया पर नियंत्रण का असर बताया है।
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