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ब्रह्मपुत्र में बढ़ेगा पानी का बहाव: नेपाल के बाद चीन के बांध से तिब्बत में बाढ़ का खतरा, जानें क्या है वजह

Mon, 26 Oct 2026 03:21 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी पीटीआई, बीजिंग
पीटीआई, बीजिंग Published by: अस्मिता त्रिपाठी Updated Mon, 26 Oct 2026 03:21 PM IST
सार

चीनी शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इस सदी में तिब्बत की ब्रह्मपुत्र नदी का बहाव बढ़ सकता है और बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है। इसी क्षेत्र में चीन 168 अरब डॉलर की लागत से दुनिया की सबसे बड़ी प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना बना रहा है।

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Water flow in the Brahmaputra to increase: Risk of flooding in Tibet due to a Chinese dam—find out why.
क्या चीन का बांध बढ़ाएगा ब्रह्मपुत्र की मुश्किलें? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ एआई

विस्तार

चीनी शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी में इस सदी के दौरान पानी का बहाव बढ़ सकता है और बाढ़ का खतरा भी अधिक हो सकता है। बता दें कि इसी जगह पर चीन 168 अरब अमेरिकी डॉलर की अनुमानित लागत से दुनिया का सबसे बड़ा बांध बना रहा है। 
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चीनी विज्ञान अकादमी और युन्नान विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने दक्षिण-पूर्वी तिब्बती पठार से पेड़ों के छल्लों की चौड़ाई के आंकड़ों का इस्तेमाल करके, 1325 से 2020 तक इस नदी के बहाव के इतिहास का पुनर्निर्माण किया है।
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उन्होंने इस पुनर्निर्माण को जलवायु डेटा के साथ मिलाकर एक मॉडल तैयार किया। इस मॉडल के अनुसार, भविष्य की जलवायु परिस्थितियों में नदी के बहाव (रनऑफ) में वृद्धि होगी, और साथ ही बाढ़ जैसी अधिक बहाव वाली घटनाओं के भी बढ़ने की संभावना है।
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रिपोर्ट में क्या बताया गया?
हांगकांग स्थित 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' की सोमवार की रिपोर्ट के अनुसार, 8 अक्तूबर को 'चाइना साइंस बुलेटिन' जर्नल में प्रकाशित एक शोध पत्र में टीम ने कहा, 'ये परिणाम यारलुंग त्सांगपो नदी में जल-जलवायु संबंधी बदलावों का एक दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं। साथ ही, ये भविष्य में जल-संसाधन से जुड़े जोखिमों का आकलन करने के लिए एक वैज्ञानिक आधार भी देते हैं।' यारलुंग त्सांगपो, तिब्बत में उस नदी को कहा जाता है जो भारत में प्रवेश करने पर ब्रह्मपुत्र नदी के नाम से जानी जाती है।

शोधकर्ताओं ने क्या बताया? 
शोधकर्ताओं का कहना है कि 'जल-संसाधन विकास और भंडारण बुनियादी ढांचे' की योजना बनाते समय, इस क्षेत्र में सीमा-पार जल जोखिमों का आकलन करते समय, भविष्य में होने वाले नदी के बहाव को ध्यान में रखा जाना चाहिए। चीनी शोधकर्ताओं के अनुसार, तिब्बती पठार वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से गर्म हो रहा है, जिससे वहां की बर्फ की परत और जल-चक्र (हाइड्रोलॉजिकल साइकिल) प्रभावित हो रहे हैं।

क्या जलवायु से हुआ यह बदलाव? 
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नदी में होने वाले बदलाव न केवल पठार के भीतर के जल-तंत्र को दर्शाते हैं, बल्कि दक्षिण एशिया में सूखे और बाढ़ के पैटर्न को भी प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा, 'हाल के वर्षों में, जलवायु के लगातार गर्म होने के कारण, यारलुंग त्सांगपो नदी बेसिन के जल-तंत्र में काफी बदलाव आए हैं।'

चीनी भूवैज्ञानिकों ने क्या चेतावनी दी?
जुलाई में, चीनी भूवैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि प्रस्तावित बांध के ठीक नीचे एक सक्रिय 'फॉल्ट लाइन' (भूपर्पटी में दरार) मौजूद है, जो इस परियोजना की संरचनात्मक स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर सकती है।

'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' की रिपोर्ट के अनुसार, 'सेडिमेंटरी जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी' जर्नल में प्रकाशित एक शोध पत्र में, शोधकर्ताओं ने इंजीनियरों से ढलान की स्थिरता को मजबूत करने और भूस्खलन तथा ढहने के जोखिम को कम करने के लिए सुरक्षात्मक उपाय (रिटेनिंग प्रोटेक्शन) लागू करने का आग्रह किया है। 26 अगस्त को चीन-नेपाल सीमा पर आई अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड)ने हिमालयी क्षेत्र में पर्वतीय खतरों के प्रति संवेदनशीलता को उजागर कर दिया। इस आपदा में लगभग 1,500 लोगों की मौत हो गई और नेपाल तथा चीन में 5,500 से अधिक लोग लापता हो गए।

ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से निकलती है और दक्षिण की ओर बहते हुए भारत में प्रवेश करती है। अरुणाचल प्रदेश में इसे 'सियांग' के नाम से जाना जाता है, और आगे चलकर इसे 'ब्रह्मपुत्र' कहा जाता है।

क्या है थ्री गॉर्जेस बांध? 
इस नदी पर दुनिया की सबसे बड़ी प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना बनाई जा रही है। पूरा होने पर इसकी कुल स्थापित क्षमता 60,000 मेगावाट से अधिक होने की उम्मीद है - जो चीन के 'थ्री गॉर्जेस बांध' (जो वर्तमान में स्थापित क्षमता के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा चालू जलविद्युत संयंत्र है) की क्षमता से लगभग तीन गुना अधिक है।

यह मेगा प्रोजेक्ट दक्षिण-पूर्वी तिब्बत के मेडोग (जिसे चीनी भाषा में 'मोतुओ' कहा जाता है) में बनाया जा रहा है, जो भारत के साथ विवादित सीमा के करीब स्थित है। यह बांध हिमालयी क्षेत्र की एक गहरी घाटी में बनाया जा रहा है, जहां ब्रह्मपुत्र नदी एक तीखा 'यू-टर्न' लेती है और उसके बाद अरुणाचल प्रदेश और फिर बांग्लादेश की ओर बहती है।


चीन ने भारी इंजीनियरिंग चुनौतियों के बावजूद इस परियोजना को आगे बढ़ाया है, क्योंकि यह जगह एक टेक्टोनिक प्लेट सीमा के पास स्थित है, जहां अक्सर भूकंप आते रहते हैं। चीनी विदेश मंत्रालय ने पहले भी इस परियोजना का बचाव करते हुए कहा है कि इससे निचले बहाव वाले देशों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, और दशकों के अध्ययन तथा सुरक्षा उपायों के जरिए सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान कर लिया गया है।
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