ईरान में जंग के बीच बदलाव की आहट: खबर में दावा- होर्मुज पर है यूरोप की नजर, US-इस्राइल के बिना कौन सी रणनीति?
क्या यूरोप अब अमेरिका से अलग रास्ता चुन रहा है? क्या ट्रांस-अटलांटिक गठजोड़ में दरार गहरी हो रही है? क्या यह वैश्विक ताकत संतुलन बदलने का संकेत है? ये सवाल इसलिए भी खड़े हो रहे हैं, क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट पर गहराते खतरे ने जहां एक ओर वैश्विक चिंताओं को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। वहीं दूसरी ओर अब अमेरिका के बिना यूरोप होर्मुज मिशन की योजना बना रहा है।
विस्तार
पश्चिम एशिया में बढ़ती तनातनी और होर्मुज स्ट्रेट पर मंडराते खतरे ने वैश्विक ताकतों को नए फैसले लेने पर मजबूर कर दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे चले टकराव के बाद अब यूरोपीय देश खुलकर अपनी अलग रणनीति गढ़ने में जुट गए हैं, जिससे ट्रांस-अटलांटिक गठजोड़ में भी दरार के संकेत दिखने लगे हैं। इस बात को ऐसे समझिए कि यूरोपीय देश अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने से ज्यादा समय तक चले संघर्ष के बाद होर्मुज स्ट्रेट को लेकर एक योजना तैयार कर रहे हैं।
यह योजना बिना अमेरिकी दखल के समुद्री रास्तों को सुरक्षित करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। इससे ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में खिंचाव साफ दिख रहा है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक संतुलन की रीढ़ रहे हैं। इस योजना की तैयारी से साफ-साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि यूरोप अब अपनी सैन्य और रणनीतिक ताकत दिखाने के मूड में है।
ब्रिटेन और फ्रांस की अगुवाई में तैयार किया गया प्रस्ताव
द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन और फ्रांस की अगुवाई में एक प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, जिसके तहत लड़ाई समाप्त होने के बाद समुद्री मार्गों पर भरोसा बहाल करने के लिए एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाया जाएगा। अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि इस पहल में समुद्र में बिछी माइंस को हटाने के अभियान (माइन-क्लियरिंग ऑपरेशन) और नौसेना की तैनाती जैसे कदम शामिल होंगे। हालांकि, अमेरिका, इस्राइल और ईरान जैसे सीधे तौर पर संघर्ष में शामिल देशों को इस गठबंधन से बाहर रखा जाएगा।
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मिशन डिफेंसिव होगा- मैक्रों
वहीं इस योजना के बारे में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि यह मिशन डिफेंसिव होगा। यूरोपीय जहाज अमेरिकी कमांड के तहत काम नहीं करेंगे। इसका मकसद शिपिंग कंपनियों को यह भरोसा दिलाना है कि लड़ाई रुकने के बाद वापस लौटना सुरक्षित है। यह प्लान तभी लॉन्च किया जाएगा जब शांति बहाल हो जाएगी। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने कहा कि गठबंधन ईरान और ओमान सहित स्ट्रेट से सटे देशों के साथ सहयोग करेगा। इससे पता चलता है कि किसी भी डिप्लॉयमेंट के लिए तेहरान की मंजूरी की जरूरत हो सकती है।
कौन निभाएगा अहम भूमिका?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस योजना में जर्मनी से एक अहम भूमिका निभाने की उम्मीद है। बर्लिन लंबे समय से विदेशी मिलिट्री ऑपरेशन को लेकर सतर्क रहा है। लेकिन अधिकारियों का कहना है कि वह जहाज और सर्विलांस एसेट्स दे सकता है, जिससे मिशन और भी अहम हो जाएगा। इस प्लान के तीन मुख्य मकसद हैं। पहला, लॉजिस्टिक्स तैयार करना ताकि स्ट्रेट में फंसे सैकड़ों जहाज निकल सकें। दूसरा, लड़ाई की शुरुआत में ईरान द्वारा पानी के रास्ते के कुछ हिस्सों में माइनिंग करने के बाद बड़े पैमाने पर डीमाइनिंग करना। तीसरा, सुरक्षित रास्ता सुनिश्चित करने के लिए नेवल एस्कॉर्ट्स और सर्विलांस तैनात करना।
यूरोप के पास अमेरिका के मुकाबले मजबूत क्षमता
विश्लेषकों का मानना है कि डीमाइनिंग में समय लगेगा। यूरोप के पास अमेरिका के मुकाबले ऐसी ज्यादा क्षमता हैं, जिसने अपने माइनस्वीपिंग फ्लीट को कम कर दिया है। सीजफायर के बाद भी, इंश्योरेंस कंपनियों और शिपर्स को भरोसा दिलाने के लिए पश्चिमी नेवी की मौजूदगी की जरूरत पड़ सकती है। यूरेशिया समूह के मुजतबा रहमान ने कहा कि जहाजों की सुरक्षा के लिए किसी न किसी पॉइंट पर एस्कॉर्ट सिस्टम या किसी कॉन्वॉय की जरूरत होगी। यह प्लान कुछ हद तक रेड सी में यूरोपीय संघ के ऑपरेशन एस्पाइड्स पर आधारित है। उस मिशन ने हूती हमलों से कमर्शियल जहाजों की सुरक्षा के लिए नेवी एस्कॉर्ट्स को सहयोग किया था।
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अमेरिकी ऑपेरेशन से अलग होगी कोशिश
गौरतलब है कि होर्मुज की कोशिश उस इलाके में पहले से तैनात अमेरिका के नेतृत्व वाले बड़े ऑपरेशन से अलग होगी। यह प्रस्ताव यूरोप और वाशिंगटन के बीच बढ़ते मतभेदों के बीच आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों से जबरदस्ती स्ट्रेट को फिर से खोलने में मदद करने की अपील की है। हालांकि, यूरोपीय नेताओं ने इसका विरोध किया और चेतावनी दी कि इस तरह के कदम से लड़ाई बढ़ सकती है और जहाजों को मिसाइल का खतरा हो सकता है।
दूसरी ओर अधिकारियों ने कहा कि चीन और भारत को बातचीत के लिए बुलाया गया है, हालांकि यह साफ नहीं है कि वे इसमें हिस्सा लेंगे या नहीं। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल ले जाता है। कोई भी रुकावट ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर असर डालती है, जिसमें भारत जैसे बड़े इंपोर्टर भी शामिल हैं। यह प्लान एक बड़े बदलाव को दिखाता है। अमेरिका की लंबे समय की मिलिट्री लीडरशिप पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में यूरोपीय देश ज्यादा सुरक्षा जिम्मेदारी लेने की तैयारी कर रहे हैं, खासकर जरूरी ट्रेड मार्ग पर।- आईएएनएस
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