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Apara Ekadashi 2026: अपरा एकादशी आज, यह महाव्रत दिलाता है तीर्थ स्नान और महादान के समान पुण्य
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
Published by: Vinod Shukla
Updated Wed, 13 May 2026 11:06 AM IST
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सार
Apara Ekadashi 2026: आज 14 मई को अपरा एकादशी व्रत है। अपरा एकादशी को कई दूसरे नामों से भी जाना जाता है। इस एकादशी को जलक्रीड़ा एकादशी, अचला एकादशी और भद्रकाली एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
अपरा एकादशी 2026
- फोटो : अमर उजाला AI
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विस्तार
Apara Ekadashi 2026: बुधवार, 14 मई को ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि है। हिन्दू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार “अपरा” का अर्थ होता है अपार पुण्य देने वाली। पद्म पुराण में इस एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा करने का विधान है। अपरा एकादशी को जलक्रीड़ा एकादशी, अचला एकादशी और भद्रकाली एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है तथा श्री हरि की कृपा प्राप्त होती है।
अपरा एकादशी का धार्मिक महत्व
ऐसी मान्यता है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से भगवान श्री हरि विष्णु जीवन के सभी दुखों और परेशानियों को दूर कर अपार पुण्य प्रदान करते हैं। यह एकादशी बड़े-बड़े पातकों का नाश करने वाली मानी गई है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, परनिंदा, परस्त्रीगमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, झूठे शास्त्र बनाना या पढ़ना, झूठा ज्योतिषी या वैद्य बनना आदि पाप नष्ट हो जाते हैं।
अनेक तीर्थों के बराबर मिलता है पुण्य
शास्त्रों में अपरा एकादशी के पुण्य की तुलना अनेक महान तीर्थों और पुण्य कर्मों से की गई है। माघ मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर प्रयाग स्नान से जो पुण्य मिलता है, काशी में शिवरात्रि व्रत करने से जो फल प्राप्त होता है, गया में पिंडदान करने से जो पुण्य मिलता है, गोदावरी स्नान, बदरिकाश्रम और केदारनाथ यात्रा तथा सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में यज्ञ और दान करने से जो फल मिलता है, वही पुण्य अपरा एकादशी के व्रत से भी प्राप्त होता है। इस व्रत का महत्व सुनने और पढ़ने मात्र से सहस्त्र गोदान के समान फल प्राप्त होने की मान्यता है।
अपरा एकादशी के दिन भगवान वामन या श्रीविष्णुजी की पूजा करने का विशेष विधान है। प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेकर भगवान नारायण को पंचामृत, रोली, मौली, गोपी चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, ऋतुफल और मिष्ठान अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप से आरती उतारकर दीपदान करें। भगवान श्री हरि को तुलसी दल और तुलसी मंजरी अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है।
इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’मंत्र का जाप तथा विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ विशेष फलदायी माना गया है। भक्तों को परनिंदा, छल-कपट, लालच और द्वेष जैसी भावनाओं से दूर रहकर श्री नारायण का स्मरण और भजन करना चाहिए। श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया यह व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होता है।
द्वादशी पर करें यह कार्य
एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाकर और दान-दक्षिणा देने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। ऐसा करने से व्रत पूर्ण माना जाता है और श्री हरि की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
अपरा एकादशी की पौराणिक कथा
शास्त्रों के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। उनका छोटा भाई वज्रध्वज अत्यंत पापी और अधर्मी था। उसने एक रात अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी और उनके शरीर को जंगल में पीपल के वृक्ष के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण धर्मात्मा राजा को भी प्रेत योनि में जाना पड़ा। वह पीपल के वृक्ष पर रहकर आने-जाने वालों को परेशान करने लगे। एक दिन उसी मार्ग से धौम्य ऋषि गुजरे। अपने तपोबल से उन्होंने राजा की पूरी कथा जान ली। ऋषि ने राजा को प्रेत योनि से मुक्त कराने का संकल्प लिया। संयोग से उस दिन ज्येष्ठ मास की एकादशी थी। धौम्य ऋषि ने अपरा एकादशी का व्रत किया और उसके पुण्य का फल राजा को अर्पित कर दिया। व्रत के प्रभाव से राजा प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य देह धारण कर स्वर्ग लोक को चले गए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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अपरा एकादशी का धार्मिक महत्व
ऐसी मान्यता है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से भगवान श्री हरि विष्णु जीवन के सभी दुखों और परेशानियों को दूर कर अपार पुण्य प्रदान करते हैं। यह एकादशी बड़े-बड़े पातकों का नाश करने वाली मानी गई है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, परनिंदा, परस्त्रीगमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, झूठे शास्त्र बनाना या पढ़ना, झूठा ज्योतिषी या वैद्य बनना आदि पाप नष्ट हो जाते हैं।
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अनेक तीर्थों के बराबर मिलता है पुण्य
शास्त्रों में अपरा एकादशी के पुण्य की तुलना अनेक महान तीर्थों और पुण्य कर्मों से की गई है। माघ मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर प्रयाग स्नान से जो पुण्य मिलता है, काशी में शिवरात्रि व्रत करने से जो फल प्राप्त होता है, गया में पिंडदान करने से जो पुण्य मिलता है, गोदावरी स्नान, बदरिकाश्रम और केदारनाथ यात्रा तथा सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में यज्ञ और दान करने से जो फल मिलता है, वही पुण्य अपरा एकादशी के व्रत से भी प्राप्त होता है। इस व्रत का महत्व सुनने और पढ़ने मात्र से सहस्त्र गोदान के समान फल प्राप्त होने की मान्यता है।
Apara Ekadashi Vrat Katha: 13 मई को अपरा एकादशी, पूजा के समय जरूर पढ़ें यह व्रत कथा
भगवान श्री हरि की ऐसे करें पूजाअपरा एकादशी के दिन भगवान वामन या श्रीविष्णुजी की पूजा करने का विशेष विधान है। प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेकर भगवान नारायण को पंचामृत, रोली, मौली, गोपी चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, ऋतुफल और मिष्ठान अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप से आरती उतारकर दीपदान करें। भगवान श्री हरि को तुलसी दल और तुलसी मंजरी अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है।
Apara Ekadashi 2026: अपरा एकादशी के दिन राशि अनुसार करें मंत्र जाप, दूर होंगी आर्थिक परेशानियां
मंत्र जाप और भक्ति का विशेष महत्वइस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’मंत्र का जाप तथा विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ विशेष फलदायी माना गया है। भक्तों को परनिंदा, छल-कपट, लालच और द्वेष जैसी भावनाओं से दूर रहकर श्री नारायण का स्मरण और भजन करना चाहिए। श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया यह व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होता है।
द्वादशी पर करें यह कार्य
एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाकर और दान-दक्षिणा देने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। ऐसा करने से व्रत पूर्ण माना जाता है और श्री हरि की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
अपरा एकादशी की पौराणिक कथा
शास्त्रों के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। उनका छोटा भाई वज्रध्वज अत्यंत पापी और अधर्मी था। उसने एक रात अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी और उनके शरीर को जंगल में पीपल के वृक्ष के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण धर्मात्मा राजा को भी प्रेत योनि में जाना पड़ा। वह पीपल के वृक्ष पर रहकर आने-जाने वालों को परेशान करने लगे। एक दिन उसी मार्ग से धौम्य ऋषि गुजरे। अपने तपोबल से उन्होंने राजा की पूरी कथा जान ली। ऋषि ने राजा को प्रेत योनि से मुक्त कराने का संकल्प लिया। संयोग से उस दिन ज्येष्ठ मास की एकादशी थी। धौम्य ऋषि ने अपरा एकादशी का व्रत किया और उसके पुण्य का फल राजा को अर्पित कर दिया। व्रत के प्रभाव से राजा प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य देह धारण कर स्वर्ग लोक को चले गए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।