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Ola: ओला को बड़ा झटका! वारंटी में स्कूटर की मरम्मत नहीं की, कोर्ट का आदेश- ₹45,000 मुआवजा, मुफ्त रिपेयर करें

Mon, 29 Jun 2026 03:03 PM IST
Amar Sharma ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amar Sharma Updated Mon, 29 Jun 2026 03:03 PM IST
सार

जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, अनंतपुरमू ने ओला इलेक्ट्रिक मोबिलिटी प्राइवेट लिमिटेड और उसके स्थानीय सर्विस सेंटर को स्कूटर का ट्रंक बिना किसी शुल्क के ठीक करने और शिकायतकर्ता को 45000 रुपये मुआवजा एवं मुकदमे का खर्च देने का आदेश दिया है। जानें क्या है पूरा मामला।

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Consumer Court Orders Ola Electric to Pay Rs 45000 Compensation and Fix Scooter Trunk Free Know Details
Ola Electric - फोटो : X

विस्तार

अगर आप सोचते हैं कि बड़ी कंपनियां ग्राहकों की शिकायतों को लंबे समय तक नजरअंदाज करके बच सकती हैं, तो यह खबर आपकी आंखें खोल देगी। इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी ओला इलेक्ट्रिक (Ola Electric) को उपभोक्ता अदालत से तगड़ा झटका लगा है। अनंतपुरमु के एक वकालत करने वाले वकील ने ओला के खिलाफ एक उपभोक्ता मामला जीत लिया है।

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कंपनी दो महीने से अधिक समय तक वारंटी के तहत उनके ओला एस1 प्रो (Ola S1 Pro) स्कूटर के ट्रंक (डिग्गी) के लॉक की खराबी को ठीक करने में पूरी तरह नाकाम रही थी। बार-बार सर्विस सेंटर जाने, कई ईमेल भेजने और कानूनी नोटिस जारी करने के बाद भी जब ओला ने बात नहीं सुनी, तो मामला कोर्ट पहुंच गया।

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जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, अनंतपुरमु ने ओला इलेक्ट्रिक मोबिलिटी प्राइवेट लिमिटेड और उसके स्थानीय सर्विस सेंटर को आदेश दिया है कि वे शिकायतकर्ता की स्कूटी का ट्रंक मुफ्त में ठीक करें और साथ ही उन्हें हर्जाने व अदालती खर्च के रूप में 45,000 रुपये का भुगतान करें। यह फैसला 9 जून 2026 को सुनाया गया।

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Consumer Court Orders Ola Electric to Pay Rs 45000 Compensation and Fix Scooter Trunk Free Know Details
Ola S1 Pro Gen 3 - फोटो : Ola Electric

आखिर यह पूरा मामला क्या था और विवाद कैसे शुरू हुआ?

यह पूरी कहानी शुरू होती है साल 2022 से, जब शिकायतकर्ता ने एक नया ओला स्कूटर खरीदा था:

  • स्कूटर की खरीद और वारंटी: एम. मुरली मोहन नाम के एक वकील ने 29 अक्तूबर 2022 को ओला एस1 प्रो इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदा था। जिसकी डिलीवरी उन्हें 7 नवंबर 2022 को मिली। इस वाहन पर खरीद की तारीख से 36 महीने या 40,000 किलोमीटर (जो भी पहले हो) की वारंटी दी गई थी।

  • खराब हो गया डिग्गी का लॉक: वारंटी अवधि के भीतर ही मोहन ने देखा कि उनके स्कूटर के ट्रंक (डिग्गी) का लॉक ठीक से काम नहीं कर रहा है। इसके कारण सामान रखने वाले इस हिस्से को न तो खोलना संभव हो पा रहा था और न ही सुरक्षित रूप से बंद करना।

  • रीबूट करने की अजीब सलाह: उन्होंने सबसे पहले अनंतपुरमु में ओला सर्विस सेंटर से संपर्क किया। वहां एक तकनीशियन ने समस्या को स्वीकार तो किया, लेकिन अजीब सलाह देते हुए कहा कि वाहन को 'रीबूट' (बंद करके चालू) करने से यह समस्या ठीक हो जाएगी। हालांकि, ऐसा करने से भी कुछ नहीं बदला।

  • पार्ट्स खत्म होने का बहाना: इसके बाद, 29 सितंबर 2025 को मोहन व्यक्तिगत रूप से कल्यानदुर्गम रोड स्थित ओला शोरूम गए। वहां के तकनीशियन ने भी लॉक की खराबी की पुष्टि की, लेकिन कहा कि इसके लिए जरूरी स्पेयर पार्ट्स स्टॉक में नहीं हैं। उन्होंने वादा किया कि पार्ट्स आते ही इसे ठीक कर दिया जाएगा। लेकिन इसके बाद ओला की तरफ से कोई अपडेट नहीं आया। 

एक छोटी सी डिग्गी का लॉक टूटना वकील साहब के लिए बड़ी मुसीबत क्यों बन गया?

आम लोगों के लिए यह भले ही सिर्फ एक टूटे हुए लॉक की छोटी सी समस्या लगे। लेकिन एक वकील के लिए यह उनके काम में बड़ा रोड़ा बन गया था:

  • कोर्ट की फाइलें ले जाने में दिक्कत: एक प्रैक्टिसिंग एडवोकेट होने के नाते, मोहन को अदालती मामलों की फाइलें कोर्ट ले जाने के लिए स्कूटर का इस्तेमाल करना पड़ता था। दो महीने से अधिक समय तक ट्रंक के काम न करने के कारण, वे अपनी फाइलों के बंडलों को सुरक्षित रूप से नहीं ले जा पा रहे थे।

  • मुवक्किलों की बढ़ी परेशानी: इस वजह से उनके अदालती काम में देरी हो रही थी और उनके मुवक्किलों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था।

  • कोर्ट ने माना पेशेवर खतरा: उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में विशेष रूप से इस बात को नोट किया। कमीशन ने कहा कि काम करते ट्रंक के बिना अदालती फाइलों को सुरक्षित रूप से नहीं ले जाया जा सकता और फाइलें खोने का जोखिम शिकायतकर्ता के लिए एक वास्तविक पेशेवर खतरा पैदा कर रहा था।

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Bhavish Aggarwal, CEO, Ola - फोटो : Ola

शिकायतकर्ता ने ओला से संपर्क करने के लिए क्या-क्या कदम उठाए?

वकील मोहन ने मामले को सुलझाने के लिए हर संभव कानूनी और औपचारिक रास्ता अपनाया था:

  • ईमेल के जरिए शिकायत: 5 अक्तूबर 2025 को मोहन फिर से शोरूम गए। वहां कोई संतोषजनक जवाब न मिलने पर, उन्होंने उसी दिन दोपहर 1:38 बजे ओला इलेक्ट्रिक के सर्विस ईमेल पर एक शिकायत भेजी। ओला ने ठीक एक मिनट बाद, दोपहर 1:39 बजे, संदर्भ संख्या (रेफरेंस नंबर) 10404596 के साथ शिकायत मिलने की पुष्टि की।

  • कंपनियों के झूठे वादे: इसके बाद ओला इलेक्ट्रिक की ओर से 9 अक्तूबर और 12 अक्तूबर 2025 को और भी ईमेल आए, जिनमें समस्या को स्वीकार किया गया था। लेकिन इन सब के बावजूद कोई मरम्मत नहीं की गई।

  • कानूनी नोटिस भी बेअसर: थक-हारकर मोहन ने 15 अक्तूबर 2025 को ओला इलेक्ट्रिक और सर्विस सेंटर दोनों को एक औपचारिक कानूनी नोटिस भेजा। पोस्टल रिकॉर्ड से पुष्टि हुई कि नोटिस कंपनियों को मिल चुका था, लेकिन फिर भी ओला की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार, नवंबर 2025 में उन्होंने आयोग के समक्ष खुद उपस्थित होकर अपनी शिकायत दर्ज कराई।

अदालती कार्यवाही के दौरान ओला इलेक्ट्रिक का क्या रवैया रहा?

जब मामला कानून के कटघरे में पहुंचा, तो ओला इलेक्ट्रिक का गैर-जिम्मेदाराना रवैया वहां भी जारी रहा:

  • नोटिस के बाद वकील तो बदला, पर खुद गायब रहे: कमीशन द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद ओला इलेक्ट्रिक ने एक वकील को तो नियुक्त किया। लेकिन, इसके बाद की सुनवाइयों में न तो कंपनी और न ही उनके वकील कोर्ट में पेश हुए।

  • जवाब देने का हक खोया: कंपनी ने तय कानूनी 45 दिनों की अवधि के भीतर कोई लिखित बयान या जवाब भी दाखिल नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि ओला इलेक्ट्रिक का इस शिकायत का विरोध करने का अधिकार कानूनन खत्म हो गया।

  • एकतरफा सबूतों पर फैसला: इसके बाद पूरा मामला पूरी तरह से शिकायतकर्ता द्वारा पेश किए गए सबूतों और दस्तावेजों के आधार पर आगे बढ़ा। मोहन ने अपना हलफनामा दाखिल किया और रिकॉर्ड पर 12 दस्तावेज पेश किए। जिसके जवाब में ओला के पास काउंटर करने के लिए कुछ नहीं था। 

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Ola S1 Pro Gen 3 - फोटो : Ola Electric

उपभोक्ता आयोग ने जांच में क्या पाया और हर्जाने की राशि कैसे तय की?

श्रीमती एम. श्रीलता (अध्यक्ष) और श्री बी. गोपीनाथ (सदस्य) की पीठ ने माना कि मोहन ने अपने मामले को पूरी तरह और स्पष्ट रूप से साबित किया है:

  • ओला की सर्विस में बड़ी कमी: कमीशन ने कहा कि ओला के अपने तकनीशियनों ने खराबी को स्वीकार किया था और कंपनी के ईमेल में इसे ठीक करने का वादा भी किया गया था, लेकिन किसी भी वादे को पूरा नहीं किया गया। चूंकि ओला के प्रशिक्षित तकनीशियन और स्पेयर पार्ट्स ही इस वाहन को ठीक कर सकते थे। इसलिए इसे ठीक करने की पूरी जिम्मेदारी कंपनी की ही थी। ऐसा न करना सेवा में स्पष्ट कमी है।

  • हर्जाने का गणित: मोहन ने मूल रूप से विभिन्न मदों के तहत 2,00,000 रुपये के मुआवजे का दावा किया था। हालांकि, कमीशन ने इसमें थोड़ी कटौती की और माना कि कुछ दावे आपस में मेल खा रहे थे और 80,000 रुपये के मानसिक उत्पीड़न के पूरे दावे को पूरी तरह से साबित नहीं किया जा सका था।

  • कुल ₹45,000 का जुर्माना: आखिरकार कोर्ट ने सेवा में कमी के लिए 20,000 रुपये, मानसिक प्रताड़ना के लिए 20,000 रुपये और अदालती कार्यवाही के खर्च के रूप में 5,000 रुपये का पुरस्कार दिया, जो कुल मिलाकर 45,000 रुपये होता है। 

कोर्ट के आदेश के बाद अब ओला इलेक्ट्रिक को क्या करना होगा?

उपभोक्ता अदालत ने ओला इलेक्ट्रिक को अपनी गलती सुधारने के लिए कड़े निर्देश दिए हैं:

  • 45 दिनों की मोहलत: कमीशन ने ओला इलेक्ट्रिक मोबिलिटी प्राइवेट लिमिटेड और उसके अनंतपुरमु सर्विस सेंटर दोनों को संयुक्त और अलग-अलग रूप से आदेश दिया है कि वे इस फैसले के 45 दिनों के भीतर स्कूटर के ट्रंक को पूरी तरह मुफ्त में ठीक करके दें।

  • लापरवाही की तो लगेगा भारी ब्याज: अगर वे इस तय समयसीमा के भीतर ट्रंक को ठीक करने में नाकाम रहते हैं, तो उन्हें पुराने ट्रंक की जगह एक नया ट्रंक लगाना होगा। इसके साथ ही, उन्हें मुआवजे की पूरी राशि पर फैसले की तारीख से लेकर पूरा भुगतान होने तक 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी चुकाना होगा। 
     

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