Japan: खराब EV बैटरियों से लिथियम निकालने का नया तरीका, जापान की इस तकनीक से सस्ती होंगी इलेक्ट्रिक कारें!
Lithium Recovery Technology: जापान अपनी तकनीक के लिए दुनियाभर में जाना जाता है और इस बार भी जापान ने कमाल किया है। जापान ने पुरानी बैटरी को फिर से इस्तेमाल करने की तकनीक इजाद कर ली है। जापान की नई रीसाइक्लिंग तकनीक से अब पुरानी ईवी बैटरियों से 90% लिथियम रिकवर किया जा सकेगा। इससे चीन पर निर्भरता घटेगी और आने वाले समय में इलेक्ट्रिक गाड़ियां सस्ती हो सकेंगी।
विस्तार
इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) इंडस्ट्री की एक बड़ी परेशानी अब खत्म होने वाली है। जापान की एक रीसाइक्लिंग कंपनी ने पुरानी और बेकार हो चुकी बैटरियों से 90% तक लिथियम रिकवर करने का तरीका खोज लिया है। अब तक पूरी दुनिया में यह दर 50% से भी कम थी। यह कोई छोटी-मोटी कामयाबी नहीं है, बल्कि बैटरी के कच्चे माल के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता खत्म करने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।
जिन देशों के पास अपना लिथियम का भंडार नहीं है, उनके पास दो ही रास्ते होते हैं। या तो वे बाजार के मनचाहे दाम चुकाकर इसे खरीदें या फिर पुरानी बैटरियों को रीसायकल करने का कोई सॉलिड तरीका खोजें। जापान ने दूसरा रास्ता चुना है और उसे इसमें एक बहुत बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। जापान की एक फैसिलिटी ने खराब हो चुकी ईवी बैटरियों से 90 प्रतिशत तक लिथियम निकालने का शानदार तरीका खोज लिया है। यह आंकड़ा पुरानी रीसायकल तकनीकों के मुकाबले लगभग दोगुना है।
किसने किया यह कमाल?
यह सफलता 'जेएक्स मेटल्स सर्कुलर सॉल्यूशन' नाम की कंपनी को मिली है, जो जापान की सबसे बड़ी नॉन-फेरस मेटल कंपनियों में से एक का हिस्सा है। वैसे तो इसकी घोषणा अप्रैल 2025 में ही कर दी गई थी, लेकिन हाल ही में जापानी मीडिया ने इसके प्लांट में होने वाले असल प्रोसेस को दुनिया के सामने रखा है, जिसके बाद से यह चर्चा में है। कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट तदाशी नाकागावा ने बताया कि उनकी टीम ने लिथियम निकालने के पुराने केमिकल तरीकों में बड़े बदलाव किए हैं।
कैसे काम करती है यह नई तकनीक?
जापान की नई तकनीक से पुरानी बैटरियों से लिथियम निकालने का तरीका काफी दिलचस्प है। इस प्रक्रिया की शुरुआत पुरानी बैटरियों को अलग करके जलाने से होती है। इससे उनके गैर-धातु वाले हिस्से जलकर पूरी तरह खत्म हो जाते हैं। इसके बाद जो हिस्सा बचता है, उसे पीसकर एक खास तरह का पाउडर तैयार कर लिया जाता है जिसे 'ब्लैक मास' कहा जाता है। असल में, इसी पाउडर के अंदर काम के सारे मेटल्स मौजूद होते हैं।
फिर इस ब्लैक मास से लिथियम को बाहर निकालने के लिए 'हाइड्रोमेटलर्जी' नाम के एक खास प्रोसेस का इस्तेमाल किया जाता है, जो पानी और केमिकल्स पर आधारित होता है। इस पूरी तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इससे मिलने वाला लिथियम हाइड्रॉक्साइड पारंपरिक केमिकल प्रोसेस की जगह ले लेता है। इसका सीधा फायदा यह होता है कि पुराने तरीकों की तुलना में इस नए प्रोसेस से कार्बन फुटप्रिंट में करीब 40% तक की भारी कमी आती है।
जापान के लिए यह खोज गेम-चेंजर क्यों है?
यह खोज जापान के लिए एक गेम-चेंजर साबित होने वाली है। दरअसल, जापान अपनी बैटरी निर्माण जरूरतों के लिए अब तक पूरी तरह से आयात पर ही निर्भर रहा है। वह लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे लगभग हर जरूरी मिनरल को दूसरे देशों से खरीदता आया है। इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा चीन से रिफाइन होकर जापान पहुंचता है।
अपनी इसी निर्भरता को कम करने के लिए जापान सरकार ने रीसायकल करने वाली कंपनियों के लिए साल 2030 तक 70% लिथियम रिकवर करने का लक्ष्य तय किया था। लेकिन इस नई तकनीक की बदौलत जापान ने तय समय से काफी पहले ही 90% का शानदार आंकड़ा छूकर एक बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है। वैसे इस क्षेत्र में केवल जापान ही आगे नहीं है, अमेरिका की 'रेडवुड मटेरियल्स' नाम की कंपनी का भी दावा है कि वे हर साल लगभग 2.5 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों के बराबर पुरानी बैटरियों से 95% तक लिथियम सफलतापूर्वक रिकवर कर रहे हैं।
तकनीक के साथ चुनौती भी
भले ही यह तकनीक बेहतरीन है, लेकिन जापान के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह तकनीक नहीं, बल्कि इन खराब बैटरियों को रीसाइक्लिंग सेंटर तक पहुंचाना है। आज की तारीख में जापान की केवल 14% पुरानी लिथियम-आयन बैटरियां ही सही चैनलों के जरिए रीसायकल होने के लिए पहुंच पाती हैं।
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कई पुरानी ईवी अपनी उम्र पूरी करने के बाद दूसरे देशों में एक्सपोर्ट कर दी जाती हैं और इसी के साथ उनके अंदर मौजूद कीमती धातुएं भी जापान के हाथ से निकल जाती हैं। इसलिए, जापान के सामने अब असली चुनौती अपने इसी कलेक्शन सिस्टम को सुधारने की है, ताकि इस नई और क्रांतिकारी तकनीक का पूरा-पूरा फायदा उठाया जा सके।

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