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EV Tire Longevity: पेट्रोल कारों से 20% जल्दी घिसते हैं इलेक्ट्रिक वाहनों के टायर, जानिए वजह और बचाव के तरीके
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: जागृति
Updated Thu, 19 Feb 2026 10:01 AM IST
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सार
Electric car tyre wear: इलेक्ट्रिक कारों का क्रेज लगातार बढ़ रहा है। सरकार भी लगातार ईवी अपनाने पर जोर दे रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन कारों के टायर डीजल और पेट्रोल की अपेक्षा जल्दी घिस जाते हैं। ये बात कई रिपोर्ट में भी सामने आई है। आइए विस्तार से जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है?
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Freepik
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विस्तार
रिपोर्ट्स के अनुसार, इलेक्ट्रिक कारों के टायर पारंपरिक इंजन वाली गाड़ियों की तुलना में औसतन 20 प्रतिशत तक जल्दी घिस सकते हैं। इसका कारण ज्यादा वजन, इंस्टेंट टॉर्क और अलग टायर डिजाइन मानी जाती है। हालांकि ये भी कहा जाता है कि सही मेंटेनेंस और सही टायर चयन से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
ईवी Vs पेट्रोल कार: टायर पर असली फर्क क्या है?
इलेक्ट्रिक कारों में बड़े बैटरी पैक होते हैं, जो गाड़ी का कुल वजन बढ़ाते हैं। ज्यादा वजन का सीधा दबाव टायर पर पड़ता है। इससे टायर ज्यादा संकुचित होते हैं और सड़क से उनका संपर्क क्षेत्र (contact patch) बढ़ जाता है। टायर निर्माता Michelin की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईवी के टायर इंटरनल कंबशन इंजन (ICE) कारों के मुकाबले लगभग 20 प्रतिशत तेजी से घिस सकते हैं। जैसे मान लीजिए अगर एक सामान्य कार का टायर 10 हजार किमी चलता है, तो ईवी में वही टायर करीब आठ हजार किमी तक सीमित रह सकता है, हालांकि ये ड्राइविंग कंडीशन पर भी निर्भर करता है।
ये भी पढ़े: Zero-Fatality Plan: सड़क हादसों पर लगाम की तैयारी, गुरुग्राम में 23 खतरनाक ब्लैक स्पॉट्स की पहचान
बैटरी का भारी भरकम बोझ
एक इलेक्ट्रिक कार में लगी लिथियम-आयन बैटरी का वजन काफी ज्यादा होता है। जैसे एक ही सेगमेंट की पेट्रोल कार के मुकाबले ईवी करीब 300-500 किलो तक भारी हो सकती है। ये अतिरिक्त वजन हर वक्त टायरों को नीचे की ओर दबाता है, जिससे मोड़ काटते समय या ब्रेक लगाते समय टायरों की रबर ज्यादा रगड़ खाती है।इसलिए ईवी के लिए लो-रोलिंग रेजिस्टेंस और हाई-लोड रेटेड टायर बनाए जाते हैं।
इंस्टेंट टॉर्क: तेज पिकअप, ज्यादा घिसावट
पेट्रोल गाड़ियों में टॉर्क धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन ईवी में पैर रखते ही पूरी ताकत मिल जाती है। इसे इंस्टेट टॉर्क कहते हैं। जब टायर अचानक से सड़क को पकड़कर तेजी से घूमते हैं, तो रबर के सूक्ष्म कण सड़क पर ही छूट जाते हैं। यही वजह है कि ईवी में टायर घिसने की प्रक्रिया (Wear and Tear) तेज हो जाती है।
शोर भी है एक बड़ी वजह
इंजन न होने की वजह से ईवी शांत होती है। ऐसे में टायरों से आने वाली आवाज केबिन में साफ सुनाई देती है। इसे कम करने के लिए ईवी टायरों में खास फाेम या रबर कंपाउंड का इस्तेमाल होता है। जो उन्हें पेट्रोल कार के टायरों से अलग और अक्सर नरम बनाता है। नरम रबर ग्रिप तो अच्छी देती है, लेकिन उम्र कम कर देती है।
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ईवी Vs पेट्रोल कार: टायर पर असली फर्क क्या है?
इलेक्ट्रिक कारों में बड़े बैटरी पैक होते हैं, जो गाड़ी का कुल वजन बढ़ाते हैं। ज्यादा वजन का सीधा दबाव टायर पर पड़ता है। इससे टायर ज्यादा संकुचित होते हैं और सड़क से उनका संपर्क क्षेत्र (contact patch) बढ़ जाता है। टायर निर्माता Michelin की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईवी के टायर इंटरनल कंबशन इंजन (ICE) कारों के मुकाबले लगभग 20 प्रतिशत तेजी से घिस सकते हैं। जैसे मान लीजिए अगर एक सामान्य कार का टायर 10 हजार किमी चलता है, तो ईवी में वही टायर करीब आठ हजार किमी तक सीमित रह सकता है, हालांकि ये ड्राइविंग कंडीशन पर भी निर्भर करता है।
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बैटरी का भारी भरकम बोझ
एक इलेक्ट्रिक कार में लगी लिथियम-आयन बैटरी का वजन काफी ज्यादा होता है। जैसे एक ही सेगमेंट की पेट्रोल कार के मुकाबले ईवी करीब 300-500 किलो तक भारी हो सकती है। ये अतिरिक्त वजन हर वक्त टायरों को नीचे की ओर दबाता है, जिससे मोड़ काटते समय या ब्रेक लगाते समय टायरों की रबर ज्यादा रगड़ खाती है।इसलिए ईवी के लिए लो-रोलिंग रेजिस्टेंस और हाई-लोड रेटेड टायर बनाए जाते हैं।
इंस्टेंट टॉर्क: तेज पिकअप, ज्यादा घिसावट
पेट्रोल गाड़ियों में टॉर्क धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन ईवी में पैर रखते ही पूरी ताकत मिल जाती है। इसे इंस्टेट टॉर्क कहते हैं। जब टायर अचानक से सड़क को पकड़कर तेजी से घूमते हैं, तो रबर के सूक्ष्म कण सड़क पर ही छूट जाते हैं। यही वजह है कि ईवी में टायर घिसने की प्रक्रिया (Wear and Tear) तेज हो जाती है।
शोर भी है एक बड़ी वजह
इंजन न होने की वजह से ईवी शांत होती है। ऐसे में टायरों से आने वाली आवाज केबिन में साफ सुनाई देती है। इसे कम करने के लिए ईवी टायरों में खास फाेम या रबर कंपाउंड का इस्तेमाल होता है। जो उन्हें पेट्रोल कार के टायरों से अलग और अक्सर नरम बनाता है। नरम रबर ग्रिप तो अच्छी देती है, लेकिन उम्र कम कर देती है।
ड्राइविंग स्टाइल प्रमुख कारण
कहते हैं कि ड्राइविंग की स्टाइल टायर की उम्र तय करने के लिए काफी है। अगर चालक बार-बार तेज एक्सेलरेशन लेता है, तो अचानक हार्ड ब्रेक लगता है या फिर तेज रफ्तार में शार्प टर्न लेता है, तो टायर पर अतिरिक्त घर्षण और दबाव पड़ता है। इससे रबर तेजी से घिसता है चाहे वाहन इलेक्ट्रिक हो या पेट्रोल। इसके उलट, अगर गाड़ी स्मूद तरीके से चलाई जाए, धीरे-धीरे स्पीड बढ़ाई जाए और ब्रेकिंग नियंत्रित हो, तो टायर की लाइफ औसतन 10–15 प्रतिशत तक बढ़ाई जा सकती है।
बचाव का सबसे आसान तरीका
ऑटो एक्सपर्ट्स के अनुसार मेंटेनेंस भी उतना ही जरूरी है। टायर में सही एयर प्रेशर बनाए रखना बुनियादी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि कम या ज्यादा प्रेशर से टायर असमान रूप से घिस सकते हैं या तो किनारों से या बीच के हिस्से से। हर 5,000 से 7,000 किलोमीटर पर टायर रोटेशन कराने से सभी टायर समान रूप से घिसते हैं और उनकी उम्र संतुलित रहती है। साथ ही, समय-समय पर व्हील अलाइनमेंट और बैलेंसिंग की जांच करवाने से गाड़ी सीधी चलती है और अनावश्यक कंपन या घिसावट से बचाव होता है। वाहन को ओवरलोड करने से भी टायर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, इसलिए निर्धारित भार सीमा का पालन जरूर करें।
ये भी पढ़े: Chinese Cars: क्या चीन का कार बाजार फिर सिकुड़ने जा रहा है? क्या दुनिया भर के कार निर्माताओं पर पड़ेगा असर?
क्या पेट्रोल कार के टायर EV में लगा सकते हैं?
अक्सर लोगों के मन में ये भी सवाल रहता है कि क्या पेट्रोल कार के टायर को हम ईवी में लगा सकते हैं। तकनीकी रूप ये बात करें तो नहीं, ये आदर्श नहीं है। क्योंकि ईवी के टायर ज्यादा वजन सहने के हिसाब से डिजाइन किए जाते है। साथ ही ये (ईवी) बेहतर ग्रिप और लो रोलिंग रेजिस्टेंस देते हैं। साइलेंट ऑपरेशन के लिए अलग रबर कंपाउंड इस्तेमाल करते हैं। इसलिए साधारण यानी की पेट्रोल कार के टायर लगाने से रेंज घट सकती है, हैंडलिंग प्रभावित हो सकती है और टॉर्क का पूरा फायदा भी नहीं मिल पाता। इसलिए ऐसा करना आपकी कार को मुश्किल में डाल सकता है।
टायर की उम्र कैसे बढ़ाएं?
अगर आप नहीं चाहते कि हर दो साल में नए टायर लगवाने पड़ें, तो ये टिप्स अपनाएं:
कहते हैं कि ड्राइविंग की स्टाइल टायर की उम्र तय करने के लिए काफी है। अगर चालक बार-बार तेज एक्सेलरेशन लेता है, तो अचानक हार्ड ब्रेक लगता है या फिर तेज रफ्तार में शार्प टर्न लेता है, तो टायर पर अतिरिक्त घर्षण और दबाव पड़ता है। इससे रबर तेजी से घिसता है चाहे वाहन इलेक्ट्रिक हो या पेट्रोल। इसके उलट, अगर गाड़ी स्मूद तरीके से चलाई जाए, धीरे-धीरे स्पीड बढ़ाई जाए और ब्रेकिंग नियंत्रित हो, तो टायर की लाइफ औसतन 10–15 प्रतिशत तक बढ़ाई जा सकती है।
बचाव का सबसे आसान तरीका
ऑटो एक्सपर्ट्स के अनुसार मेंटेनेंस भी उतना ही जरूरी है। टायर में सही एयर प्रेशर बनाए रखना बुनियादी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि कम या ज्यादा प्रेशर से टायर असमान रूप से घिस सकते हैं या तो किनारों से या बीच के हिस्से से। हर 5,000 से 7,000 किलोमीटर पर टायर रोटेशन कराने से सभी टायर समान रूप से घिसते हैं और उनकी उम्र संतुलित रहती है। साथ ही, समय-समय पर व्हील अलाइनमेंट और बैलेंसिंग की जांच करवाने से गाड़ी सीधी चलती है और अनावश्यक कंपन या घिसावट से बचाव होता है। वाहन को ओवरलोड करने से भी टायर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, इसलिए निर्धारित भार सीमा का पालन जरूर करें।
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क्या पेट्रोल कार के टायर EV में लगा सकते हैं?
अक्सर लोगों के मन में ये भी सवाल रहता है कि क्या पेट्रोल कार के टायर को हम ईवी में लगा सकते हैं। तकनीकी रूप ये बात करें तो नहीं, ये आदर्श नहीं है। क्योंकि ईवी के टायर ज्यादा वजन सहने के हिसाब से डिजाइन किए जाते है। साथ ही ये (ईवी) बेहतर ग्रिप और लो रोलिंग रेजिस्टेंस देते हैं। साइलेंट ऑपरेशन के लिए अलग रबर कंपाउंड इस्तेमाल करते हैं। इसलिए साधारण यानी की पेट्रोल कार के टायर लगाने से रेंज घट सकती है, हैंडलिंग प्रभावित हो सकती है और टॉर्क का पूरा फायदा भी नहीं मिल पाता। इसलिए ऐसा करना आपकी कार को मुश्किल में डाल सकता है।
टायर की उम्र कैसे बढ़ाएं?
अगर आप नहीं चाहते कि हर दो साल में नए टायर लगवाने पड़ें, तो ये टिप्स अपनाएं:
- ईवी टायर्स ही चुनें: कभी भी अपनी इलेक्ट्रिक कार में साधारण पेट्रोल गाड़ी वाले टायर न डलवाएं। वे भारी वजन और टॉर्क नहीं झेल पाएंगे और बहुत जल्दी जवाब दे देंगे।
- स्मूद ड्राइविंग: अचानक तेज या रफ्तार में गाड़ी न भगाएं। धीरे-धीरे स्पीड बढ़ाना आपके टायर और बैटरी रेंज दोनों के लिए बेहतर है।
- रीजेनरेटिव ब्रेकिंग का सही उपयोग: ईवी में ब्रेक कम घिसते हैं क्योंकि मोटर खुद गाड़ी रोकती है, लेकिन टायर पर दबाव फिर भी पड़ता है। स्मूद स्टॉपिंग की आदत डालें।
- अलाइनमेंट और रोटेशन: हर 5,000 से 7,000 किलोमीटर पर टायरों को रोटेट करवाएं, जिससे वे चारों तरफ से बराबर घिसें।