PNB Loan Scam: सीबीआई कोर्ट ने तीन पूर्व अधिकारियों समेत आठ को सुनाई सजा, बैंक को हुआ था ₹1.57 करोड़ का नुकसान
पीएनबी लोन धोखाधड़ी मामले में अहमदाबाद की सीबीआई कोर्ट ने तीन पूर्व बैंक अधिकारियों समेत आठ दोषियों को कड़ी सजा सुनाई है। यह मामला बिना दिशानिर्देशों के लोन बांटने और 1.57 करोड़ रुपये के नुकसान से जुड़ा है। आइए इस बारे में विस्तार से जानें।
विस्तार
अहमदाबाद की एक विशेष सीबीआई अदालत ने शुक्रवार को पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) के 2016 के लोन धोखाधड़ी मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। इस मामले में 1.57 करोड़ रुपये के वित्तीय नुकसान के लिए तीन सेवानिवृत्त बैंक अधिकारियों सहित आठ लोगों को दोषी ठहराया गया है। यह फैसला बैंकिंग प्रणाली में जवाबदेही और सख्त अनुपालन की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।
अधिकारियों की लापरवाही और अदालत की सजा
सीबीआई अदालत ने पीएनबी के सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक (एजीएम) गुरिंदर सिंह, सेवानिवृत्त मुख्य प्रबंधक केजीसीएस अय्यर और सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक के ई सुरेंद्रनाथ को दो-दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही, इन सभी पूर्व अधिकारियों पर 1-1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
बैंक अधिकारियों के अलावा इस फर्जीवाड़े में शामिल अन्य लोगों पर भी सख्त कार्रवाई की गई है। मेसर्स जलपा एंटरप्राइज प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक संजय पटेल को 50,000 रुपये के जुर्माने के साथ तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है। वहीं, हितेश डोमाडिया को भी 1 लाख रुपये जुर्माने और तीन साल जेल की सजा मिली है। अन्य आरोपियों में सतीश दावरा, वैशाली दावरा और रमीलाबेन भिकाड़िया को 50-50 हजार रुपये के जुर्माने के साथ दो-दो साल के कठोर कारावास की सजा दी गई है। अदालत ने मेसर्स जलपा एंटरप्राइज प्राइवेट लिमिटेड पर भी अलग से 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया है।
कैसे दिया गया धोखाधड़ी को अंजाम?
यह पूरा मामला 22 अगस्त 2016 को मेसर्स काली टेक्सटाइल्स के मालिक शैलेश सतासिया और अन्य के खिलाफ दर्ज किया गया था। घोटाले की शुरुआत जुलाई 2011 में हुई, जब आरोपियों ने 44 वाटर जेट लूम मशीनें खरीदने और अन्य व्यावसायिक कार्यों के लिए पीएनबी की सूरत शाखा में 3.70 करोड़ रुपये के टर्म लोन और 40 लाख रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट के लिए आवेदन किया था।
इस ऋण प्रस्ताव की सिफारिश बैंक अधिकारी सुरेंद्रनाथ और अय्यर ने की थी, जिसके बाद 29 जुलाई 2011 को गुरिंदर सिंह ने इसे मंजूरी दे दी थी। ऋण के लिए मशीनों को प्राथमिक सुरक्षा के रूप में बैंक के पास रखा गया था, जबकि अतिरिक्त कोलैटरल के रूप में भूखंड और आवासीय फ्लैट शामिल किए गए थे।
नियमों की अनदेखी से बड़ा नुकसान
सीबीआई की जांच के अनुसार, आरोपियों ने ऋण प्राप्त करने के लिए फर्जी दस्तावेज जमा किए थे। बैंक अधिकारियों ने अपने पद की जिम्मेदारी और उचित दिशानिर्देशों का पालन किए बिना इन जाली दस्तावेजों को असली मानकर कर्ज मंजूर कर दिया। जांच एजेंसी ने बताया कि इस पूरी धोखाधड़ी के कारण पंजाब नेशनल बैंक को ब्याज को छोड़कर लगभग 1.57 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान हुआ।