Report: आरबीआई की रियायती अदला-बदली सुविधा से भारत में आएगा 85 अरब डॉलर का भारी निवेश, जानिए क्या मतलब
भारतीय रिजर्व बैंक की रियायती अदला-बदली सुविधा से भारत 80-85 अरब अमेरिकी डॉलर का विदेशी निवेश आकर्षित कर सकता है। एसबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम भुगतान संतुलन को मजबूत करेगा और पूंजी प्रवाह बढ़ाएगा, जिससे वित्त वर्ष 2027 में चालू खाता घाटा कम होगा। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।
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विस्तार
भारतीय रिजर्व बैंक की रियायती अदला-बदली सुविधा योजना है। इसके तहत भारत 80 से 85 अरब अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह आकर्षित कर सकता है। एक प्रमुख रिपोर्ट में सोमवार को यह जानकारी दी गई है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश में विदेशी पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करना है। भारतीय स्टेट बैंक की शोध रिपोर्ट 'इकोव्रैप' ने इन अनुमानों को एक सकारात्मक आर्थिक राहत बताया है।
रिपोर्ट के अनुसार, 17 जुलाई तक इस योजना के तहत कुल मिलाकर लगभग 20 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रवाह हुआ है। इसमें विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) या एफसीएनआर (बी) जमा का योगदान 17.406 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। विदेशी मुद्रा उधार (ओएफसीबीएस) से 1.97 अरब अमेरिकी डॉलर प्राप्त हुए। बाह्य वाणिज्यिक उधार (ईसीबीएस) से 1.342 अरब अमेरिकी डॉलर की राशि जुटाई गई। एसबीआई की रिपोर्ट का अनुमान है कि एफसीएनआर (बी) जमा कुल 65 से 70 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकती हैं। ओएफसीबीएस और ईसीबीएस को शामिल करते हुए यह आंकड़ा 80 से 85 अरब अमेरिकी डॉलर तक जा सकता है। आरबीआई के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इस पूंजी जुटाने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। यह प्रवृत्ति भारत के वित्तीय क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।
क्या है आरबीआई की रियायती अदला-बदली सुविधा?
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 5 जून, 2026 को इस अदला-बदली सुविधा की शुरुआत की थी। यह भारत के भुगतान संतुलन को मजबूत करने के लिए उठाए गए कई उपायों का हिस्सा है। इसका एक अन्य महत्वपूर्ण लक्ष्य पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करना भी है। यह सुविधा आधिकारिक तौर पर 8 जून, 2026 को चालू की गई थी। एफसीएनआर (बी) जमा के लिए यह 30 सितंबर, 2026 तक उपलब्ध रहेगी। वहीं, ओएफसीबीएस और ईसीबीएस के लिए यह 31 दिसंबर, 2026 तक जारी रहेगी। इन उपायों की घोषणा वैश्विक बाजार में व्याप्त अनिश्चितताओं के बीच की गई थी। इनका उद्देश्य भारत की बाहरी क्षेत्र की स्थिति को मजबूत करना है। साथ ही, विदेशी मुद्रा तरलता का समर्थन करना भी इसका एक अहम लक्ष्य है।
बाजार पर क्या रहा असर?
आरबीआई के इन उपायों की घोषणा के बाद भारतीय रुपये ने शुरू में सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी। हालांकि, बाजार में यह शुरुआती उत्साह जल्द ही फीका पड़ गया। अमेरिका और ईरान के बीच सौहार्दपूर्ण समाधान की उम्मीदें कम होने लगीं। ऊर्जा कीमतें भी लगातार अस्थिर बनी रहीं, जिससे निवेशकों में चिंता बढ़ी। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भी सतर्क हो गए। उन्होंने निवेश में सावधानी बरतनी शुरू कर दी। जून के दौरान ऋण बाजारों में अच्छा प्रवाह देखा गया था। इक्विटी प्रवाह में भी कुछ स्थिरता आई थी। इसके बावजूद, वैश्विक कारकों के कारण समग्र बाजार में सतर्कता का माहौल बना रहा। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने एफसीएनआर (बी) जमा जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह इस सुविधा की सफलता का एक प्रमुख कारक है।
आर्थिक मोर्चे पर क्या हैं भविष्य की उम्मीदें?
रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई के इन उपायों के कारण वित्त वर्ष 2026-27 में पूंजी खाते में 75 से 85 अरब अमेरिकी डॉलर का अतिरिक्त प्रवाह होगा। आवक प्रेषण भी 150 अरब अमेरिकी डॉलर के आंकड़े को पार कर जाएगा। इससे देश की विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि होगी। वित्त वर्ष 2026-27 में 15 से 18 अरब अमेरिकी डॉलर का मजबूत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह अपेक्षित है। वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में बेहतर विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) प्रवाह की भी उम्मीद है। एसबीआई रिपोर्ट का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 के लिए कुल भुगतान संतुलन 50 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक अधिशेष में रहेगा। यह उनके पिछले 65-70 अरब अमेरिकी डॉलर के घाटे के अनुमान से काफी बेहतर स्थिति है। इसके बाद, 2026-27 के लिए चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1-1.2 फीसदी के दायरे में रहेगा। यह आर्थिक स्थिरता का एक महत्वपूर्ण संकेत है।