तेल के खेल में खलल: कतर से सऊदी तक क्रूड से लेकर गैस आपूर्ति सब ठप, समझिए वैश्विक ऊर्जा बाजार कितना हलकान
पश्चिम एशिया में अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच भड़के युद्ध ने अब वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है। ईरान के पलटवार और लगातार तीसरे दिन जारी मिसाइल हमलों ने सऊदी अरब, कतर और इस्राइल को अपने बड़े तेल और गैस संयंत्र एहतियातन बंद करने पर मजबूर कर दिया है। दुनिया के ऊर्जा बाजार पर इस पूरे घटनाक्रम का क्या असर पड़ रहा है, आइए जानिए।
विस्तार
पश्चिम एशिया में हमलों के बाद कतर एनर्जी द्वारा एलएनजी उत्पादन रोकने से यूरोप में गैस कीमतों में तेज उछाल आया है। डच और ब्रिटिश थोक गैस कीमतें करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। यूरोप के प्रमुख टीटीएफ हब पर गैस कीमत 46.52 यूरो प्रति मेगावाट घंटा तक पहुंच गई। विशेषज्ञों का कहना है कि कतर से गैस आपूर्ति प्रभावित रहने पर एशिया और यूरोप के बीच एलएनजी कार्गो को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में और अस्थिरता आ सकती है। कच्चे तेल की कीमतों में भी 13 प्रतिशत की वृद्धि दिखी है।
आइए समझते हैं कि कैसे यह ऊर्जा संकट पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।
दुनिया तेल और गैस की किल्लत का इतना बड़ा डर क्यों पैदा हो गया है?
सोचिए अगर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्ग पर सन्नाटा छा जाए, तो क्या होगा। दरअसल, 'होर्मुज जलडमरूमध्य' में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है, जहां से दुनिया का पांचवा हिस्सा (20%) तेल गुजरता है। रविवार को यहां जहाजों पर हुए हमलों के बाद ऐसा हुआ है। इसके अलावा, अमेरिका के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े एलएनजी निर्यातक देश कतर ने सोमवार को अपनी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एनएनजी) का उत्पादन रोक दिया है। कतर की सरकार ने बताया कि कतर एनर्जी के एक ऊर्जा संयंत्र पर दो ईरानी ड्रोनों ने हमला किया है, जिसके बाद गैस और उससे जुड़े उत्पादों का उत्पादन रोक दिया गया है।
सबसे बड़े तेल उत्पादक देश पर इस युद्ध का क्या असर हुआ है?
मिडिल ईस्ट का सबसे सुरक्षित माना जाने वाला एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर अब सीधे निशाने पर है। ड्रोन हमले के बाद सऊदी अरब ने अपनी सबसे बड़ी घरेलू तेल रिफाइनरी 'रास तनूरा' को एहतियातन बंद कर दिया है। 5,50,000 बैरल प्रतिदिन की क्षमता वाली यह रिफाइनरी सऊदी क्रूड ऑयल के लिए एक अहम एक्सपोर्ट टर्मिनल भी है। हालांकि, सऊदी रक्षा मंत्रालय के अनुसार दो ड्रोन हवा में ही नष्ट कर दिए गए और मलबे से लगी मामूली आग पर काबू पा लिया गया है। सऊदी अधिकारियों का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है और स्थानीय बाजारों में तेल की आपूर्ति प्रभावित नहीं हुई है।
इस्राइल और ईरान के अपने एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर की क्या स्थिति है?
युद्ध के इस खेल में दोनों मुख्य खिलाड़ी भी अपनी ऊर्जा जीवनरेखा खोने की कगार पर हैं। इस्राइल सरकार ने सुरक्षा के मद्देनजर अमेरिकी कंपनी शेवरॉन को 'लेविथान' गैस फील्ड को अस्थायी रूप से बंद करने का निर्देश दिया है। इसी तरह, ईरान के खार्ग द्वीप पर भी शनिवार को धमाकों की आवाजें सुनी गईं, जहां से ईरान का 90% कच्चा तेल निर्यात होता है। ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक ईरान, वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 4.5% हिस्सा पैदा करता है। इसके अलावा, इराक के कुर्दिस्तान में भी 2,00,000 बैरल प्रतिदिन का तेल उत्पादन एहतियातन रोक दिया गया है।
कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
जब ऊर्जा का नल सूखता है, तो महंगाई का मीटर सबसे तेजी से भागता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा और रिफाइनरियों के बंद होने से कच्चे तेल की कीमतों में एक ही दिन में 13% का भयंकर उछाल आया और यह 82 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जो जनवरी 2025 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। कतर की गैस सप्लाई रुकने का सबसे बड़ा खामियाजा एशिया को उठाना पड़ेगा, क्योंकि कतर वैश्विक गैस आपूर्ति का 20% संभालता है और कतर एनर्जी के 82% ग्राहक एशियाई देश ही हैं।
आगे क्या होगा? क्या यह संकट एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है?
यह सिर्फ एक ट्रेलर हो सकता है, क्योंकि असली भू-राजनीतिक तूफान अभी बाकी है! 'वेरिस्क मैपलक्रॉफ्ट' के प्रमुख मिडिल ईस्ट विश्लेषक टोरब्योर्न सोल्टवेड्ट के अनुसार, सऊदी रिफाइनरी पर हमला एक बड़ा 'एस्केलेशन' (तनाव बढ़ना) है। उनका मानना है कि इस हमले के बाद सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश ईरान के खिलाफ अमेरिका और इस्राइल के सैन्य अभियानों में शामिल होने के करीब आ सकते हैं।
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखला अब पूरी तरह से घेराबंदी में है। सऊदी की रास तनूरा रिफाइनरी पर यह हमला (जिस पर पहले 2021 में भी हूतियों ने हमला किया था) और कतर का गैस उत्पादन रोकना इस बात का साफ संकेत है कि ऊर्जा बाजार एक बड़े झटके के मुहाने पर खड़ा है। आगे चलकर यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही पूरी तरह ठप रहती है, तो दुनिया को एक भयंकर ऊर्जा संकट और महंगाई की नई लहर का सामना करना पड़ सकता है।