Trade: चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा पहली बार 9.5 लाख करोड़ रुपये के करीब, आसान भाषा में समझिए इसका कारण
भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा पहली बार 102 अरब डॉलर के पर यानी भारतीय मुद्रा में करीब 9,42,492 रुपये पर पहुंच गया है। स्मार्टफोन निर्यात, घटते आयात नियम और एफडीआई नीति में बदलाव के आर्थिक मायने क्या हैं? सब कुछ आसान भाषा में समझने के लिए पढ़ें।
विस्तार
भारत का निर्यात भले ही हाल के महीनों में अच्छी वृद्धि दर्ज कर रहा हो, लेकिन चीन के साथ व्यापार घाटे ने एक नया और चिंताजनक रिकॉर्ड बना दिया है। चालू वित्त वर्ष खत्म होने में अभी एक महीना बाकी होने के बावजूद, अप्रैल-फरवरी की अवधि के दौरान यह घाटा पहली बार 100 अरब डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर गया है। आइए सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं, इस आंकड़े के क्या मायने हैं और इसका आर्थिक प्रभाव क्या होगा?
व्यापार घाटे के ताजा और सटीक आंकड़े क्या कहते हैं?
वाणिज्य विभाग की ओर से जारी हालिया आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-फरवरी के दौरान चीन के साथ व्यापार घाटा 102 अरब डॉलर (करीब 9,42,492 करोड़ रुपये) हो गया है, जो पिछले साल इसी अवधि में 91.1 अरब डॉलर (करीब 8,41,775 करोड़ रुपये) था। पूरे पिछले वित्त वर्ष के लिए भारत का व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर से थोड़ा ही कम था। आपको बता दें कि अमेरिका के बाद, चीन के साथ सबसे ज्यादा व्यापार घाटा भारत का ही है, जिसके बाद वियतनाम का नंबर आता है।
क्या भारत से चीन को होने वाले निर्यात में कोई सुधार हुआ है?
हां, निर्यात के मोर्चे पर मजबूत वृद्धि देखी गई है। अप्रैल-फरवरी के दौरान भारत के निर्यात में लगभग 38% की शानदार वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे यह 17.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। हालांकि, आयात का आधार इतना बड़ा है कि इसमें महज 15% की वृद्धि होने से कुल आयात लगभग 120 अरब डॉलर तक जा पहुंचा, जिसने घाटे की इस खाई को और चौड़ा कर दिया है।
किन सेक्टर्स ने निर्यात में बाजी मारी और भारत चीन से सबसे ज्यादा क्या खरीद रहा है?
इस व्यापार के आंकड़ों का सेक्टोरल असर काफी स्पष्ट है:
- भारत से चीन को बड़े निर्यात: अप्रैल-जनवरी के दौरान स्मार्टफोन और टेलीकॉम उपकरणों का निर्यात लगभग छह गुना बढ़कर 2.3 अरब डॉलर हो गया है। इसके अलावा पेट्रोलियम उत्पादों में 133% का उछाल (2.1 अरब डॉलर) और तांबे के सामान के निर्यात (500 मिलियन डॉलर) ने भी बाजार को मजबूती दी है।
- बड़े आयात: इलेक्ट्रिकल मशीनरी और टेलीकॉम उपकरणों के आयात में तेज वृद्धि हुई है। चीन से भारत आने वाले सामानों में इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स सबसे ऊपर बने हुए हैं।
आयात कम करने की कोशिशों के बावजूद भारत की चीन पर यह निर्भरता क्यों?
भारत ने सस्ते और खराब गुणवत्ता वाले आयात को रोकने के लिए कई कड़े मानक तय किए हैं, लेकिन देश की विनिर्माण गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए उद्योग अब भी भारी रूप से चीन पर निर्भर हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक से जुड़े सामान, भारी मशीनरी, रसायन और दवाओं से जुड़ी सामग्री (Pharma Ingredients) जैसी आवश्यक चीजों के लिए चीन पर आश्रित है।
भारत और चीन के बीच व्यापार में भारी असंतुलन का बड़ा कारण क्या?
एक तरफ भारत अपनी विनिर्माण जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर चीन के कच्चे पर निर्भर है, वहीं दूसरी तरफ चीन ने अपने देश में संरक्षणवादी नीतियां अपनाई हुई हैं। कई अपीलों के बावजूद, चीन कड़े निरीक्षण और मानकों का हवाला देकर भारतीय उत्पादों की अपने बाजार में एंट्री को प्रतिबंधित करता है, जिससे व्यापार एकतरफा हो गया है।
क्या इस व्यापारिक स्थिति के बीच विदेशी निवेश नियमों में बदलाव किया गया?
जी हां, भारत सरकार की ओर से निवेश के मोर्चे पर भी एक नीतिगत कदम उठाया गया है। उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) ने सोमवार को एफडीआई नीति (एफडीआई नीति) में बदलावों को अधिसूचित किया है। नए नियमों के तहत, अब 10% तक चीनी शेयरधारिता वाली विदेशी कंपनियों को 'ऑटोमैटिक रूट' के माध्यम से भारत में निवेश करने की अनुमति मिल गई है।
चीन के साथ 102 अरब डॉलर का व्यापार घाटा यह साफ करता है कि घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के बावजूद, भारतीय सप्लाई चेन आज भी बुनियादी कच्चे माल के लिए चीनी आयात पर निर्भर है। स्मार्टफोन और पेट्रोलियम निर्यात में भारी उछाल सकारात्मक संकेत है, लेकिन आयात-निर्यात के अंतर को कम करने के लिए भारत को कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर आक्रामक रूप से काम करना होगा। इसके अतिरिक्त, चीनी निवेश के लिए एफडीआई नियमों में ढील देना भविष्य में घरेलू उत्पादन क्षमता को पूंजीगत समर्थन देने की एक अहम रणनीतिक पहल साबित हो सकती है।
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