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यूक्रेन के ड्रोन हमलों की मार: रूस के डीजल कारोबार पर असर, निर्यात 77% घटा, क्या दुनिया में बढ़ेगा ईंधन संकट?
Thu, 22 Oct 2026 06:27 AM IST
शिवम गर्ग
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: शिवम गर्ग
Updated Thu, 22 Oct 2026 06:27 AM IST
सार
यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रूस का डीजल निर्यात सितंबर में घटकर 1.41 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जबकि मध्य पूर्व के संघर्ष ने भी आपूर्ति पर दबाव बढ़ाया है। अगर संकट लंबा खिंचता है, तो भारत समेत दूसरे देशों पर इसका कितना असर पड़ सकता है? आइए, जानते हैं...
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यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रूस में ईंधन संकट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
रूस के तेल शोधन संयंत्रों और निर्यात ढांचे पर यूक्रेन के लगातार ड्रोन हमलों ने वैश्विक डीजल बाजार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हमलों के कारण रूस की डीजल निर्यात क्षमता को बड़ा झटका लगा है। वहीं, मध्य पूर्व में जारी संघर्ष से भी ईंधन की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इन दोनों मोर्चों पर संकट के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की उपलब्धता घटने और कीमतें ऊंची बने रहने की आशंका है। सीएनबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक रूस के डीजल निर्यात में सितंबर- अक्टूबर में अब तक में पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 75 प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुसार यूक्रेन ने रविवार से अब तक रूस पर एक हजार से अधिक ड्रोन से हमले किए। यह इस साल के सबसे बड़े हमलों में शामिल था। इन हमलों में रूस के महत्वपूर्ण तेल ढांचे को निशाना बनाया गया। सेंट पीटर्सबर्ग स्थित एक तेल निर्यात टर्मिनल में आग लगने की खबर भी सामने आई। सेंट पीटर्सबर्ग रूस का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का गृहनगर भी है।
यूक्रेन के हमलों का दायरा और प्रभाव दोनों बढ़े हैं। कोलंबिया विश्वविद्यालय के सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी की रूसी तेल उद्योग विशेषज्ञ तातियाना मित्रोवा के मुताबिक, पहले जहां रूस पर कुछ दर्जन ड्रोन से हमले होते थे, अब सैकड़ों ड्रोन एक साथ इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यूक्रेन रूसी क्षेत्र के भीतर काफी दूर स्थित ठिकानों को भी निशाना बना रहा है। जुलाई में साइबेरिया के ओम्स्क में रूस की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी पर हमला इसका उदाहरण है। यह स्थान यूक्रेन से एक हजार मील से अधिक दूर है।
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डीजल निर्यात में 75 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट
वॉरसॉ स्थित ओपन-सोर्स खुफिया विश्लेषण संस्था रोचन कंसल्टिंग के आंकड़ों के अनुसार, रूसी तेल ढांचे पर दर्ज हमलों की संख्या जनवरी में 11 थी, जो जुलाई में बढ़कर 31 हो गई। इस तरह कुछ ही महीनों में हमलों की संख्या लगभग तीन गुना हो गई।कमोडिटी बाजार से जुड़े केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, रूस का डीजल निर्यात सितंबर में घटकर लगभग 1.41 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। पिछले वर्ष सितंबर में यह करीब 6.08 लाख बैरल प्रतिदिन था। यानी निर्यात में लगभग 77 प्रतिशत की गिरावट आई। हमलों से पहले रूस अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा डीजल आपूर्तिकर्ता था।निर्यात में गिरावट के बाद रूस ने जुलाई में घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिए डीजल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस महीने उसने कुछ निर्यात दोबारा शुरू किए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पुतिन के बीच हुए कथित समझौते के तहत रूस ने अक्टूबर में करीब 75 हजार और नवंबर में 1.24 लाख बैरल प्रतिदिन डीजल वैश्विक बाजार में भेजने की सहमति दी थी। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक मांग की तुलना में यह मात्रा बहुत कम है।
रिफाइनरी की मरम्मत बन रही बड़ी चुनौती
यूक्रेन की रणनीति केवल तेल भंडारण टैंकों को नष्ट करने तक सीमित नहीं है। अब ऐसे जटिल उपकरणों को निशाना बनाया जा रहा है, जिन्हें बदलना या ठीक करना अधिक मुश्किल है। तेल भंडारण टैंक की मरम्मत कुछ सप्ताह में हो सकती है, लेकिन तेल शोधन की महत्वपूर्ण इकाई नष्ट होने पर उसे बदलने में कई महीने लग सकते हैं।मित्रोवा के अनुसार, ऐसे उपकरणों के लिए रूस को बाहरी आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भर रहना पड़ सकता है। प्रतिबंधों और आपूर्तिकर्ताओं से जुड़ी समस्याओं के कारण इन्हें जल्दी हासिल करना आसान नहीं है। इससे हमलों का असर तत्काल नुकसान से आगे बढ़कर लंबे समय तक उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
मध्य पूर्व के संकट ने बढ़ाया दबाव
वैश्विक डीजल बाजार पहले से ही मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण दबाव में है। सीएनबीसी की रिपोर्ट के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाला डीजल निर्यात पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 5.40 लाख बैरल प्रतिदिन घटा है। रूस और मध्य पूर्व से आपूर्ति में कमी के कारण वैश्विक डीजल निर्यात लगभग 10 लाख बैरल प्रतिदिन कम हुआ है।अमेरिका में भी डीजल की कीमतें बढ़ी हैं। अमेरिकी ऑटोमोबाइल एसोसिएशन के मुताबिक, मंगलवार को वहां डीजल की औसत कीमत 6.32 डॉलर प्रति गैलन थी, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से करीब 75 प्रतिशत अधिक थी। इस बढ़ोतरी के पीछे रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ मध्य पूर्व में ईंधन आपूर्ति बाधित होना भी एक प्रमुख कारण है।
2027 तक बनी रह सकती है किल्लत
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इस महीने चेतावनी दी थी कि डीजल की आपूर्ति पर दबाव 2027 तक बना रह सकता है। अमेरिका की तेल रिफाइनरियां पहले से ही अपनी क्षमता के उच्च स्तर पर काम कर रही हैं, इसलिए उत्पादन बढ़ाकर वैश्विक कमी की भरपाई करना आसान नहीं है।डीजल की लगातार कमी का असर माल ढुलाई, औद्योगिक गतिविधियों और कृषि जैसे क्षेत्रों की लागत पर पड़ सकता है। हालांकि, भारत में कीमतों या उपलब्धता पर कितना असर होगा, यह घरेलू आपूर्ति, आयात लागत और सरकारी नीतियों पर निर्भर करेगा। फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रूस और मध्य पूर्व से आपूर्ति में कमी के बीच वैश्विक बाजार को अतिरिक्त डीजल कहां से मिलेगा।
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रिपोर्ट के अनुसार यूक्रेन ने रविवार से अब तक रूस पर एक हजार से अधिक ड्रोन से हमले किए। यह इस साल के सबसे बड़े हमलों में शामिल था। इन हमलों में रूस के महत्वपूर्ण तेल ढांचे को निशाना बनाया गया। सेंट पीटर्सबर्ग स्थित एक तेल निर्यात टर्मिनल में आग लगने की खबर भी सामने आई। सेंट पीटर्सबर्ग रूस का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का गृहनगर भी है।
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यूक्रेन के हमलों का दायरा और प्रभाव दोनों बढ़े हैं। कोलंबिया विश्वविद्यालय के सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी की रूसी तेल उद्योग विशेषज्ञ तातियाना मित्रोवा के मुताबिक, पहले जहां रूस पर कुछ दर्जन ड्रोन से हमले होते थे, अब सैकड़ों ड्रोन एक साथ इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यूक्रेन रूसी क्षेत्र के भीतर काफी दूर स्थित ठिकानों को भी निशाना बना रहा है। जुलाई में साइबेरिया के ओम्स्क में रूस की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी पर हमला इसका उदाहरण है। यह स्थान यूक्रेन से एक हजार मील से अधिक दूर है।
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डीजल निर्यात में 75 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट
वॉरसॉ स्थित ओपन-सोर्स खुफिया विश्लेषण संस्था रोचन कंसल्टिंग के आंकड़ों के अनुसार, रूसी तेल ढांचे पर दर्ज हमलों की संख्या जनवरी में 11 थी, जो जुलाई में बढ़कर 31 हो गई। इस तरह कुछ ही महीनों में हमलों की संख्या लगभग तीन गुना हो गई।कमोडिटी बाजार से जुड़े केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, रूस का डीजल निर्यात सितंबर में घटकर लगभग 1.41 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। पिछले वर्ष सितंबर में यह करीब 6.08 लाख बैरल प्रतिदिन था। यानी निर्यात में लगभग 77 प्रतिशत की गिरावट आई। हमलों से पहले रूस अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा डीजल आपूर्तिकर्ता था।निर्यात में गिरावट के बाद रूस ने जुलाई में घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिए डीजल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस महीने उसने कुछ निर्यात दोबारा शुरू किए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पुतिन के बीच हुए कथित समझौते के तहत रूस ने अक्टूबर में करीब 75 हजार और नवंबर में 1.24 लाख बैरल प्रतिदिन डीजल वैश्विक बाजार में भेजने की सहमति दी थी। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक मांग की तुलना में यह मात्रा बहुत कम है।
रिफाइनरी की मरम्मत बन रही बड़ी चुनौती
यूक्रेन की रणनीति केवल तेल भंडारण टैंकों को नष्ट करने तक सीमित नहीं है। अब ऐसे जटिल उपकरणों को निशाना बनाया जा रहा है, जिन्हें बदलना या ठीक करना अधिक मुश्किल है। तेल भंडारण टैंक की मरम्मत कुछ सप्ताह में हो सकती है, लेकिन तेल शोधन की महत्वपूर्ण इकाई नष्ट होने पर उसे बदलने में कई महीने लग सकते हैं।मित्रोवा के अनुसार, ऐसे उपकरणों के लिए रूस को बाहरी आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भर रहना पड़ सकता है। प्रतिबंधों और आपूर्तिकर्ताओं से जुड़ी समस्याओं के कारण इन्हें जल्दी हासिल करना आसान नहीं है। इससे हमलों का असर तत्काल नुकसान से आगे बढ़कर लंबे समय तक उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
मध्य पूर्व के संकट ने बढ़ाया दबाव
वैश्विक डीजल बाजार पहले से ही मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण दबाव में है। सीएनबीसी की रिपोर्ट के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाला डीजल निर्यात पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 5.40 लाख बैरल प्रतिदिन घटा है। रूस और मध्य पूर्व से आपूर्ति में कमी के कारण वैश्विक डीजल निर्यात लगभग 10 लाख बैरल प्रतिदिन कम हुआ है।अमेरिका में भी डीजल की कीमतें बढ़ी हैं। अमेरिकी ऑटोमोबाइल एसोसिएशन के मुताबिक, मंगलवार को वहां डीजल की औसत कीमत 6.32 डॉलर प्रति गैलन थी, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से करीब 75 प्रतिशत अधिक थी। इस बढ़ोतरी के पीछे रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ मध्य पूर्व में ईंधन आपूर्ति बाधित होना भी एक प्रमुख कारण है।
2027 तक बनी रह सकती है किल्लत
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इस महीने चेतावनी दी थी कि डीजल की आपूर्ति पर दबाव 2027 तक बना रह सकता है। अमेरिका की तेल रिफाइनरियां पहले से ही अपनी क्षमता के उच्च स्तर पर काम कर रही हैं, इसलिए उत्पादन बढ़ाकर वैश्विक कमी की भरपाई करना आसान नहीं है।डीजल की लगातार कमी का असर माल ढुलाई, औद्योगिक गतिविधियों और कृषि जैसे क्षेत्रों की लागत पर पड़ सकता है। हालांकि, भारत में कीमतों या उपलब्धता पर कितना असर होगा, यह घरेलू आपूर्ति, आयात लागत और सरकारी नीतियों पर निर्भर करेगा। फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रूस और मध्य पूर्व से आपूर्ति में कमी के बीच वैश्विक बाजार को अतिरिक्त डीजल कहां से मिलेगा।