Report: रूसी तेल पर अमेरिकी टैरिफ की नई धमकी, क्या भारत में फिर महंगा होगा ईंधन? जानिए इस बारे में सबकुछ
रूसी तेल पर अमेरिका के 100% टैरिफ की नई धमकी से बढ़ सकता है भारत का संकट। दूसरी ओर क्रूड का भाव 120 डॉलर प्रति डॉलर तक तक जाने से चालू खाता घाटा दोगुना होने की भी आशंका है। इस बारे में विभिन्न एजेंसियों की रिपोर्ट क्या कह रहे, आइए जानते हैं।
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विस्तार
भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के सामने एक नया संकट खड़ा हो गया है। अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की ताजा धमकी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की चिंताएं बढ़ा दी हैं। केयरएज रेटिंग्स की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह धमकी हकीकत में बदलती है, तो भारत में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे चालू खाता घाटा (सीएडी) और महंगाई का दबाव बेहद गंभीर रूप ले सकता है। यह स्थिति ऐसे समय में आई है जब भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता काफी बढ़ा चुका है और अकेले जुलाई के महीने में देश के कुल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी लगभग 50 फीसदी दर्ज की गई थी।
अमेरिकी टैरिफ की इस नई धमकी का भारत पर क्या असर होगा?
केयरएज रेटिंग्स के मुख्य रेटिंग अधिकारी सचिन गुप्ता के अनुसार, यदि भारत रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को तुरंत कम करने के लिए मजबूर होता है, तो इसका असर वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति और कीमतों पर सीधा पड़ेगा। यदि अमेरिका इस 100% टैरिफ को लागू कर देता है और भारत तथा चीन रूसी तेल से खुद को अलग नहीं कर पाते हैं, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के बाहरी और घरेलू दोनों आर्थिक संकेतक बुरी तरह प्रभावित होंगे।
कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक क्यों जा सकती हैं?
इस खतरे के पीछे केवल अमेरिकी टैरिफ ही नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव भी एक बड़ी वजह है। वर्तमान में ईरान संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी व्यवधानों के कारण पहले से ही वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति अनिश्चित बनी हुई है। यदि ऐसी स्थिति में भारत और चीन रूसी तेल का आयात काफी कम या बंद कर देते हैं, तो वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है। सचिन गुप्ता का अनुमान है कि इस दोहरे संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतें ़100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। बदतर स्थिति में यह 110 डॉलर प्रति बैरल से 120 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं।
चालू खाता घाटा (सीएडी) और आम जनता की जेब पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
कच्चे तेल में आने वाला यह उछाल भारत के आर्थिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ सकता है, जिसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित होंगे:
- दोगुना चालू खाता घाटा: यदि कच्चे तेल की कीमत 110 डॉलर से 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छूती है, तो केवल ऊंचे तेल बिलों के कारण भारत का चालू खाता घाटा पिछले साल के मुकाबले आसानी से दोगुना हो सकता है।
- महंगाई का तगड़ा झटका: कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर सरकार को आखिरकार ईंधन पंपों पर बढ़े हुए दाम आम उपभोक्ताओं पर डालने होंगे। इससे देश में महंगाई बढ़ेगी और घरेलू मांग पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
- तेल कंपनियों पर दबाव: भारत सरकार करीब 100 से 105 डॉलर प्रति बैरल तक की कीमतों को तो संभाल सकती है, लेकिन 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाते ही देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) पर वित्तीय दबाव बहुत अधिक बढ़ जाएगा।
इस विकट चुनौती से निपटने के लिए भारत के पास क्या रास्ते हैं?
इन विपरीत परिस्थितियों के बीच राहत की बात यह है कि भारत ने अतीत में भी कच्चे तेल के स्रोतों में लचीलापन दिखाया है। देश ने जरूरत के अनुसार नए देशों से कच्चे तेल की खरीद करने की अपनी क्षमता साबित की है और आगे भी देश की ऊर्जा सुरक्षा को ही प्राथमिकता दी जाएगी। केयरएज की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के लिए असली चुनौती वैकल्पिक कच्चे तेल की उपलब्धता सुनिश्चित करना नहीं होगी, बल्कि मुख्य चुनौती यह होगी कि इस वैकल्पिक आपूर्ति को किस कीमत पर हासिल किया जाता है।
रूसी तेल पर अमेरिकी टैरिफ का खतरा और पश्चिम एशिया के तनाव मिलकर भारत के आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा करने की ताकत रखते हैं। अब पूरा दारोमदार भारत की कूटनीतिक सूझबूझ और कच्चे तेल के नए, किफायती विकल्प खोजने की क्षमता पर टिका है, ताकि देश को महंगाई और बढ़ते व्यापार घाटे की मार से बचाया जा सके।
मॉर्गन स्टेनली ने अपनी रिपोर्ट में क्या बताया?
वैश्विक निवेश बैंक मॉर्गन स्टेनली की एक ताजा रिपोर्ट में खुलासा किया है कि सामूहिक बुद्धिमत्ता यानी किसी भीड़ या बड़े समूह के फैसलों को अधिक सटीक और समझदार बनाने के लिए तीन बुनियादी शर्तों का होना बेहद जरूरी है। रिपोर्ट के अनुसार, ये तीन प्रमुख कारक संज्ञानात्मक विविधता, सूचना का प्रभावी संकलन और सही प्रोत्साहन हैं।
वित्तीय और भविष्यवाणी बाजारों का विश्लेषण करते हुए रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वित्तीय बाजारों में अक्सर 'विविधता' के नियम का उल्लंघन होता है, क्योंकि निवेशक एक-दूसरे से प्रभावित होकर एक जैसी सोच विकसित कर लेते हैं, जिससे बाजार में कृत्रिम तेजी या बड़ी मंदी का खतरा बढ़ जाता है। मॉर्गन स्टेनली का मानना है कि मतों के संकलन के सरल तरीके (जैसे पूर्वानुमानों का औसत निकालना) भी सटीकता को काफी बढ़ा देते हैं। दिलचस्प बात यह है कि सामूहिक सटीकता के ये सिद्धांत केवल वित्तीय बाजारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कंपनियों में नियुक्तियों, कर्मचारियों की ट्रेनिंग और संगठनात्मक निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी बेहतर बना सकते हैं।