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कमजोर मानसून ने बढ़ाई सरकार की चिंता: चावल-गेहूं निर्यात पर फिर लग सकती है पाबंदी, दालों के आयात की तैयारी

Fri, 25 Sep 2026 05:03 AM IST
प्रशांत तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: प्रशांत तिवारी Updated Fri, 25 Sep 2026 05:03 AM IST
सार

कमजोर मानसून, घटते जलस्तर और कम मिट्टी की नमी से खरीफ के साथ रबी फसलों के उत्पादन पर दबाव बढ़ने की आशंका है। वहीं, दालों की कीमतों को काबू में रखने के लिए सरकार ने आयात के विकल्प तैयार करने शुरू कर दिए हैं।  

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Weak monsoon raises government concerns Restrictions rice wheat exports reimposed preparations import pulses
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

देश में मानसून की बेरुखी और मौसम के बदलते मिजाज ने अब नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है। कम बारिश और पानी की कमी के चलते चावल के साथ-साथ गेहूं का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। ऐसे में महंगाई को थामने के लिए सरकार चावल और गेहूं के निर्यात पर फिर पाबंदी लगा सकती है। इस साल मानसून सीजन में बारिश सामान्य से 15 फीसदी कम दर्ज की गई है। यदि सितंबर के अंत तक स्थिति यही रही, तो यह 2009 (जब बारिश में 22 फीसदी कमी हुई थी) के बाद सबसे कमजोर मानसून साबित होगा। इसका सीधा असर खेती पर दिख रहा है, जहां खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले 15 लाख हेक्टेयर पीछे चल रही है।

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खरीफ के बाद रबी पर भी संकट के बादल
संकट सिर्फ खरीफ तक सीमित नहीं है, बल्कि रबी सीजन पर भी इसका साया मंडरा रहा है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में कुल भंडारण क्षमता का केवल 131 बीसीएम पानी बचा है, जो पिछले साल इसी अवधि (165 बीसीएम) से लगभग 20 फीसदी कम है।
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दक्षिण और उत्तर भारत के जलाशयों में घटा पानी
क्षेत्रीय स्तर पर स्थिति और भी गंभीर है। दक्षिण भारत के जलाशयों में पानी का स्तर क्षमता से 48 फीसदी और उत्तर भारत में 36 फीसदी कम है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में रबी की फसलों की सिंचाई मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश और पंजाब के बांधों के पानी पर निर्भर करती है। जलाशयों में पानी कम होने और मिट्टी में नमी घटने से रबी की बुवाई प्रभावित हो सकती है।
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महंगी नहीं होगी दाल, मसूर आयात बढ़ाने की तैयारी
कमजोर मानसून और अल-नीनो के खतरों के बीच सरकार आम आदमी की थाली को सुरक्षित रखने के लिए पूरी तरह तैयार है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि घरेलू स्तर पर भले ही पैदावार पर दबाव पड़े, लेकिन उपभोक्ताओं को महंगाई की मार नहीं झेलनी पड़ेगी। इसी के तहत दालों की कीमतों को काबू में रखने के लिए समय रहते आयात के विकल्प तैयार किए जा रहे हैं।

दाल आयात में मसूर की बड़ी हिस्सेदारी
भारत में अरहर के बाद दूसरे नंबर पर सबसे बड़े पैमाने पर जिस दाल का आयात किया जाता है, वह मसूर ही है। देश के कुल दाल आयात में अकेले मसूर की हिस्सेदारी लगभग 19% है।

59.64 लाख टन दालों का आयात
कृषि मंत्रालय के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 59.64 लाख टन दालों का आयात किया, जो इससे पिछले वर्ष (2024-25) के 72.56 लाख टन से कम है। आयात में यह कमी देश में घरेलू उत्पादन बढ़ने की वजह से आई है।


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कनाडा से मसूर आपूर्ति बनाए रखने की तैयारी
चूंकि मसूर मुख्य रूप से कनाडा से आयात की जाती है, और इस साल कनाडा में 33 लाख मीट्रिक टन मसूर का उत्पादन हुआ है, इसलिए सरकार ने वहां पहले से ही बातचीत कर जरूरत पड़ने पर आपूर्ति सुचारू रखने की पूरी तैयारी कर ली है।

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