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पश्चिम एशिया संकट का भारत पर गहरा असर: 25 लाख लोगों के गरीबी में जाने का खतरा, यूएनडीपी ने दी चेतावनी

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Kumar Vivek Updated Tue, 14 Apr 2026 12:15 PM IST
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सार

पश्चिम एशिया संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव। UNDP रिपोर्ट के अनुसार 25 लाख लोग गरीबी में जा सकते हैं। एमएसएमई, रोजगार और महंगाई पर असर की पूरी खबर पढ़ें।

West Asia conflict threatens to push 2.5 million people in India into poverty: UNDP report
भारतीय अर्थव्यवस्था। - फोटो : amarujala
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विस्तार

पश्चिम एशिया में चल रहे सैन्य संघर्ष का असर अब सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर पड़ने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, इस संकट के कारण भारत में लगभग 25 लाख लोगों के गरीबी में धकेल दिए जाने का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। 'मिलिट्री एस्केलेशन इन द मिडिल ईस्ट: ह्यूमन डेवलपमेंट इम्पैक्ट्स अक्रॉस एशिया एंड द पैसिफिक' नामक इस रिपोर्ट में बताया गया है कि यह भू-राजनीतिक तनाव पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मानव विकास और आजीविका पर भारी दबाव डाल रहा है। 

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गरीबी और विकास पर सीधी चोट

रिपोर्ट के प्रारंभिक आकलन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर 88 लाख लोगों के गरीबी में गिरने का जोखिम है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा दक्षिण एशिया का है। भारत के संदर्भ में, अनुमान है कि संकट के बाद देश की गरीबी दर 23.9 प्रतिशत से बढ़कर 24.2 प्रतिशत हो जाएगी, जिससे 24,64,698 अतिरिक्त लोग गरीबी के दायरे में आ जाएंगे। इसके अतिरिक्त, भारत को अपने मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) की प्रगति में भी लगभग 0.03 से 0.12 वर्ष का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार में भारी उथल-पुथल

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। देश अपनी कुल तेल जरूरतों का 90 प्रतिशत से अधिक आयात करता है, जिसमें से 40 प्रतिशत कच्चा तेल और 90 प्रतिशत एलपीजी (एलपीजी) अकेले पश्चिम एशिया से आता है। रिपोर्ट के अनुसार, सैन्य संकट के कारण माल ढुलाई लागत और बीमा प्रीमियम में भारी वृद्धि हुई है, जिससे व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह बाधित हुई है। इसका सीधा असर भारत के 48 अरब डॉलर के गैर-तेल निर्यात पर पड़ रहा है, जिसमें बासमती चावल, चाय, रत्न और आभूषण तथा परिधान जैसे प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।

एमएसएमई, रोजगार और खाद्य सुरक्षा पर मंडराता खतरा

इस संकट के कारण घरेलू अर्थव्यवस्था के कई मोर्चों पर दबाव साफ देखा जा सकता है:

  • एमएसएमई और नौकरियां: भारत का लगभग 90 प्रतिशत रोजगार असंगठित क्षेत्र में है। महंगे आयात और आपूर्ति की कमी के कारण आतिथ्य, खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण सामग्री और रत्न निर्माण से जुड़े छोटे उद्योगों में लागत बढ़ रही है। इससे काम के घंटे कम होने, छंटनी होने और व्यापार बंद होने का जोखिम पैदा हो गया है।
  • दवाएं और चिकित्सा उपकरण: होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास व्यवधान के कारण चिकित्सा उपकरणों के लिए आवश्यक कच्चे माल की लागत 50 प्रतिशत तक बढ़ने की आशंका है। वहीं, दवाओं की थोक कीमतों में पहले ही 10-15 प्रतिशत का इजाफा हो चुका है।
  • खाद्य सुरक्षा और खेती: भारत अपना 45 प्रतिशत से अधिक उर्वरक आयात पश्चिम एशिया से करता है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि यह व्यवधान जून में शुरू होने वाले खरीफ सीजन (मानसून की फसल) तक जारी रहता है, तो कृषि क्षेत्र प्रभावित होगा, हालांकि वर्तमान में उपलब्ध 61.14 लाख टन यूरिया का बफर स्टॉक कुछ राहत प्रदान कर सकता है।
  • रेमिटेंस में गिरावट: खाड़ी देशों (GCC) में काम करने वाले 93.7 लाख भारतीय देश के कुल रेमिटेंस का 38-40 प्रतिशत हिस्सा भारत भेजते हैं। वहां आर्थिक मंदी के कारण इन प्रवासियों की आय प्रभावित होने का अनुमान है, जिसका सीधा असर भारत में उनके परिवारों की क्रय शक्ति और घरेलू आय पर पड़ेगा।

आईईए और आईएमएफ ने भी जताई चिंता

अमेरिका और इस्राइल की ओर से ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरे संकट के बादल मंडरा रहे हैं, जिसके नकारात्मक प्रभाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक के प्रमुखों ने गंभीर चेतावनी जारी की है। आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने स्पष्ट किया है कि मध्य पूर्व में जारी इस संघर्ष के कारण संस्था द्वारा इस वर्ष के वैश्विक आर्थिक विकास के पूर्वानुमान में कटौती की जाएगी। इस कड़े भू-राजनीतिक झटके ने विश्व स्तर पर तेल, गैस और उर्वरकों की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है, जिससे ऊर्जा आयातकों और विशेष रूप से कम आय वाले देशों पर व्यापक व असमान प्रभाव पड़ा है।

आपूर्ति शृंखला में आई इस बड़ी बाधा ने जहां एक ओर खाद्य सुरक्षा और रोजगार छिनने की चिंताओं को जन्म दिया है, वहीं होर्मुज जलडमरूमध्य में बुनियादी ढांचे को पहुंचे नुकसान के कारण ऊर्जा और उर्वरक की कीमतों के लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बने रहने की आशंका है। इसके अतिरिक्त, इस संघर्ष के कारण न केवल मध्य पूर्व के कुछ तेल और गैस उत्पादकों के निर्यात राजस्व में भारी गिरावट आई है, बल्कि बड़े पैमाने पर लोगों के विस्थापन के साथ-साथ यात्रा व पर्यटन उद्योग को भी भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे पूरी तरह से उबरने में वैश्विक बाजार को काफी समय लग सकता है।

आगे का आउटलुक

इस चुनौती को देखते हुए, संयुक्त राष्ट्र के सहायक महासचिव और यूएनडीपी के क्षेत्रीय निदेशक कान्नी विग्नाराजा ने सुझाव दिया है कि देशों को सामाजिक सुरक्षा मजबूत करने के साथ-साथ ऊर्जा और खाद्य प्रणालियों में विविधता लानी चाहिए। स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया का यह तनाव अब केवल एक कूटनीतिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह भारत के आर्थिक विकास, महंगाई दर और रोजगार के लिए एक बड़ा जोखिम बनकर सामने आ रहा है।

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