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Explainer: लोग बीच में ही क्यों छोड़ रहे हैं जीवन बीमा पॉलिसी, क्या बदल रही हैं हमारी प्राथमिकताएं?

Mon, 13 Jul 2026 03:41 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Mon, 13 Jul 2026 03:41 PM IST
सार

भारत में बड़ी संख्या में लोग अब मैच्योरिटी तक इंतजार करने के बजाय बीच में ही अपनी जीवन बीमा पॉलिसी सरेंडर कर रहे हैं। आरबीआई की रिपोर्ट इसे बीमा क्षेत्र के लिए चिंता का संकेत मानती है और इसके पीछे कई अहम वजहें बताती है। लेकिन आखिर लोग समय से पहले जीवन बीमा पॉलिसी क्यों छोड़ रहे हैं? आइए विस्तार से जानते हैं। 

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Why Are People Surrendering Their Life Insurance Policies Early? Are Our Financial Priorities Changing?
जीवन बीमा - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भारत में बड़ी संख्या में पॉलिसी धारक मैच्योरिटी तक इंतजार करने के बजाय बीच में ही अपनी जीवन बीमा पॉलिसी बंद कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट बताती है कि यह ट्रेंड बीमा सेक्टर के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।

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ऐसे में आइए जानते हैं कि पॉलिसी सरेंडर करने का मतलब क्या होता है? रिपोर्ट में क्या सामने आया? लोग समय से पहले पॉलिसी क्यों छोड़ रहे हैं? विशेषज्ञों का क्या कहना है? आरबीआई ने चिंता क्यों जताई? पहले के आंकड़े क्या बताते हैं? बीमा क्षेत्र की तस्वीर क्या है? 

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पॉलिसी सरेंडर क्या होता है? 

लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदने का मकसद आमतौर पर लंबे समय तक आर्थिक सुरक्षा पाना होता है। लेकिन कई बार आर्थिक तंगी, प्रीमियम भरने में परेशानी या पॉलिसी से उम्मीद के मुताबिक फायदा न मिलने जैसी वजहों से लोग पॉलिसी को बीच में ही बंद करने का फैसला करते हैं। इसे पॉलिसी सरेंडर कहा जाता है। हालांकि, अगर पॉलिसी मैच्योरिटी से पहले सरेंडर कर दी जाती है, तो बीमा सुरक्षा और भविष्य में मिलने वाले कई लाभ खत्म हो जाते हैं। साथ ही, पॉलिसी धारक को डेथ बेनिफिट भी नहीं मिलता।

पॉलिसी सरेंडर करने पर क्या होता है?

पॉलिसी सरेंडर करने पर बीमा कंपनी पॉलिसी धारक को सरेंडर वैल्यू देती है। यह वह राशि होती है, जो जमा किए गए प्रीमियम, पॉलिसी की अवधि, सम एश्योर्ड और पॉलिसी के नियमों के आधार पर तय की जाती है। इस रकम में से पॉलिसी से जुड़े कुछ शुल्क काट लिए जाते हैं। पारंपरिक पॉलिसियों में यह बोनस और प्रीमियम के आधार पर तय होती है, जबकि यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान में यह निवेश किए गए यूनिट्स की मौजूदा बाजार कीमत के हिसाब से तय होती है।

Why Are People Surrendering Their Life Insurance Policies Early? Are Our Financial Priorities Changing?
जीवन बीमा - फोटो : Amar Ujala

रिपोर्ट में क्या आया सामने? 

  • आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, जीवन बीमा कंपनियों द्वारा किया गया कुल भुगतान लगातार बढ़ रहा है। 
  •  2021-22 में बीमा कंपनियों ने करीब 5 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया था, जो 2025-26 में बढ़कर 7.3 लाख करोड़ रुपये हो गया। 
  • यह पिछले वित्त वर्ष (2024-25) की तुलना में 16.1% ज्यादा है। 

आमतौर पर प्रीमियम बढ़ने के साथ बीमा कंपनियों का भुगतान भी बढ़ता है, इसलिए सिर्फ भुगतान का बढ़ना चिंता की बात नहीं है। असली चिंता इस बात को लेकर है कि यह पैसा आखिर किन वजहों से लोगों को दिया जा रहा है।

रिपोर्ट बताती है कि 2025-26 में पहली बार सबसे बड़ा हिस्सा उन लोगों को गया, जिन्होंने अपनी पॉलिसी मैच्योरिटी से पहले ही सरेंडर कर दी या बीच में पैसे निकाल लिए। ऐसे भुगतान कुल भुगतान का 38.3% रहे, जबकि मैच्योरिटी पूरी होने पर मिलने वाले भुगतान की हिस्सेदारी 36.9% रही। वहीं, मृत्यु दावों का हिस्सा सिर्फ 8.1% रहा। यानी अब बीमा कंपनियां सबसे ज्यादा पैसा उन लोगों को दे रही हैं, जो पॉलिसी की अवधि पूरी होने से पहले ही उसे छोड़ रहे हैं।

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Why Are People Surrendering Their Life Insurance Policies Early? Are Our Financial Priorities Changing?
विशेषज्ञों की राय - फोटो : Amar Ujala

लोग समय से पहले पॉलिसी क्यों छोड़ रहे हैं?

बीमा विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे कई कारण हैं।

  • पिछले कुछ वर्षों में महंगाई बढ़ी है, घरेलू खर्च बढ़े हैं और लोगों पर कर्ज व ईएमआई का बोझ भी बढ़ा है। ऐसे में कई परिवारों ने तुरंत नकदी जुटाने के लिए अपनी पारंपरिक जीवन बीमा पॉलिसियां सरेंडर कर दीं।
  • दूसरी वजह यह है कि कई ग्राहक बीमा पॉलिसी को निवेश या फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) की तरह समझकर खरीद लेते हैं। बाद में उन्हें पता चलता है कि इसमें लंबा लॉक-इन पीरियड होता है और समय से पहले पॉलिसी छोड़ने पर सरेंडर चार्ज भी देना पड़ता है। इसके बाद वे पॉलिसी बंद करने का फैसला कर लेते हैं।
  • इसके अलावा बैंक एफडी पर ऊंची ब्याज दरें, शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड जैसे निवेश विकल्प भी लोगों को अधिक आकर्षित कर रहे हैं। अपेक्षाकृत कम रिटर्न देने वाली पारंपरिक बीमा योजनाओं से कई निवेशकों का रुझान कम हुआ है।

 

बदली टैक्स व्यवस्था और टर्म इंश्योरेंस ने भी डाला असर

वित्तीय विशेषज्ञ शुभ नारायण सिंह ने इस बदलाव की तीन बड़ी वजह बताई है। 

  • पहली वजह यह कि जो लोग निवेश करने के इरादे से इस स्कीम से जुड़ते थे, उन्हें मन मुताबिक रिटर्न नहीं मिल पाया। साथ ही प्रीमियम पर इंश्योर्ड वैल्यू भी कम मिल रही है। 
  • दूसरी वजह यह है कि टर्म इंश्योरेंस और हेल्थ इंश्योरेंस को लोग ज्यादा पसंद कर रहे हैं, क्योंकि कम प्रीमियम में उन्हें बड़े इंश्योरेंस की गारंटी मिलती है। 
  • तीसरी सबसे बड़ी वजह यह है कि पहले इनकम टैक्स में जो डिडक्शन हुआ करते थे जैसे 80सी के, वो लाभ भी नई व्यवस्था में चला गया है। इसे ऐसे समझिए 80सी जो सेक्शन में अगर आप कोई भी इंश्योरेंस कराते थे तो इसका डिडक्शन मिला करता था। अगर आप अकेले ही एक पॉलिसी कराते हैं जिसका प्रीमियम एक से डेढ़ लाख तक चला जाता था, तो पूरा डेढ़ लाख तक का डिडक्शन मिल जाता था। अगर किसी का टैक्स स्लैब 30% है तो उसे लगभग 45 हजार की छूट मिल जाती थी। अब नई व्यवस्था में वो जरूरत रह नहीं गई है, निवेशक यह सोच रहे हैं कि हमें टैक्स में भी कोई सुविधा नहीं मिल रही है। और पॉलिसी का रिटर्न भी ज्यादा नहीं मिलेगा। तो अब वो इसमें उलझना नहीं चाहते हैं।

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क्या है वजह? - फोटो : Amar Ujala

आरबीआई ने क्या चिंता जताई? 

आरबीआई का कहना है कि लगातार बढ़ते सरेंडर केवल ग्राहकों के फैसले नहीं हैं, बल्कि इससे बीमा कंपनियों के कामकाज पर भी असर पड़ता है। जीवन बीमा कंपनियां लंबी अवधि को ध्यान में रखकर निवेश करती हैं, लेकिन अगर बड़ी संख्या में ग्राहक बीच में ही पॉलिसी छोड़ देते हैं, तो कंपनियों को समय से पहले निवेश बेचकर भुगतान करना पड़ सकता है। इससे उनकी परिसंपत्ति-देनदारी प्रबंधन (एसेट-लायबिलिटी मैनेजमेंट) की रणनीति प्रभावित होती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि लगातार ऊंची सरेंडर दरें इस बात का भी संकेत हो सकती हैं कि ग्राहक संतुष्ट नहीं हैं, उन्हें गलत तरीके से पॉलिसी बेची गई है (मिस-सेलिंग) या फिर वे दूसरे निवेश विकल्पों को ज्यादा बेहतर मान रहे हैं।

क्या गलत तरीके से पॉलिसी बेचना भी एक वजह है?

रिपोर्ट में निजी जीवन बीमा कंपनियों के खर्च को लेकर भी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2021-22 के बाद निजी जीवन बीमा कंपनियों का कमीशन रेशियो लगभग दोगुना हो गया है, जबकि उनके रोजमर्रा के परिचालन खर्च में ज्यादा बदलाव नहीं आया। इसका मतलब है कि कंपनियां नई पॉलिसियां बेचने के लिए एजेंटों, बैंकों और दूसरे डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों को पहले की तुलना में कहीं ज्यादा कमीशन दे रही हैं। आरबीआई का कहना है कि यह खर्च प्रीमियम से होने वाली कमाई की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जिससे कंपनियों का मुनाफा प्रभावित हो सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जब नई पॉलिसियां बेचने पर ज्यादा कमीशन मिलता है, तो कुछ मामलों में ग्राहकों को उनकी जरूरत के बजाय ज्यादा कमीशन वाली पॉलिसियां बेचने यानी मिस-सेलिंग का खतरा बढ़ जाता है। आरबीआई और बीमा नियामक आईआरडीएआई पहले भी इस मुद्दे पर चिंता जता चुके हैं। 

हाल ही में बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के चेयरमैन अजय सेठ ने कहा कि नियामक ऐसी व्यवस्था बनाने पर काम कर रहा है, जिससे ग्राहकों को पॉलिसी के फायदे, जोखिम और भविष्य में मिलने वाले रिटर्न की साफ और पूरी जानकारी मिल सके। इससे लोग किसी भी बीमा योजना को बेहतर ढंग से समझकर सही फैसला ले सकेंगे।

Why Are People Surrendering Their Life Insurance Policies Early? Are Our Financial Priorities Changing?
क्या कहते हैं आंकड़े? - फोटो : Amar Ujala

पहले के आंकड़े भी यही कहानी बताते हैं

रिपोर्ट के अनुसार, सरेंडर और निकासी का स्तर पिछले कुछ वर्षों से लगातार ऊंचा बना हुआ है और इसमें निजी बीमा कंपनियों की हिस्सेदारी अधिक रही है। 2024-25 में जीवन बीमा उद्योग ने कुल 6.3 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया था। इसमें से 2.3 लाख करोड़ रुपये सरेंडर और निकासी पर खर्च हुए, जबकि मैच्योरिटी भुगतान 2.2 लाख करोड़ रुपये रहा। इससे भी साफ होता है कि बड़ी संख्या में लोग पॉलिसी पूरी अवधि तक जारी नहीं रख पा रहे हैं।

शिकायतें तीन गुना तक बढ़ीं

सामान्य बीमा क्षेत्र में ग्राहकों की शिकायतें भी तेजी से बढ़ी हैं।

  • 2025-26 में शिकायतों की संख्या बढ़कर 1.78 लाख हो गई, जो पिछले वर्षों की तुलना में लगभग तीन गुना है।
  • आरबीआई का कहना है कि यह दावों के निपटान, सेवा गुणवत्ता और ग्राहकों को उत्पाद की सही जानकारी देने में मौजूद कमियों की ओर इशारा करता है।
  • रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इस तरह की समस्याएं दूर नहीं की गईं तो ग्राहकों का भरोसा कमजोर होगा, पॉलिसियों का नवीनीकरण घटेगा और बड़ी संख्या में लोग बीमा छोड़ सकते हैं, जो आगे चलकर वित्तीय स्थिरता के लिए भी चिंता का विषय बन सकता है।

विशेषज्ञ ने कमीशन मॉडल पर जताई चिंता

लेखिका और वित्तीय विशेषज्ञ मोनिका हलन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आरबीआई के आंकड़ों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत की मौजूदा बीमा व्यवस्था का सबसे ज्यादा फायदा बीमा कंपनियों और उनके डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को मिलता है, जबकि ग्राहकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। 

उनके मुताबिक, पारंपरिक जीवन बीमा उत्पाद इस तरह बनाए गए हैं कि ग्राहक पहले साल में फंस जाता है। एजेंट और बैंक अधिकतम कमीशन कमाने पर ध्यान देते हैं और बाद में ग्राहक की परवाह कम होती है। उन्होंने कहा कि ऊंची सरेंडर दरें दिखाती हैं कि बिक्री पर आधारित कमीशन मॉडल ग्राहकों के दीर्घकालिक हितों के बजाय केवल नए कारोबार को प्राथमिकता देता है। उनके मुताबिक, भारत के बीमा क्षेत्र में सुधार की जरूरत है। कमीशन देने के तरीके में बदलाव होना चाहिए, ताकि एजेंटों को सिर्फ पॉलिसी बेचने के बजाय ग्राहकों को सही सलाह और बेहतर सेवा देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। साथ ही, नियामक व्यवस्था को भी और मजबूत और प्रभावी बनाने की जरूरत है।

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