चर्चा में काॅकरोच: चंडीगढ़-पंचकूला और मोहाली में काॅकरोच का राज, इनके दम पर खड़ी है पचास करोड़ की इंडस्ट्री
चंडीगढ़ में काॅकरोच मारने वाले स्प्रे, जेल, चॉक और पेस्ट कंट्रोल का कारोबार अकेले ट्राईसिटी में ही सालाना कारोबार करीब 50 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
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इन दिनों सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में काॅकरोच शब्द खूब सुर्खियों में है। बयानबाजी और तंज के बीच काॅकरोच चर्चा का विषय जरूर बने हुए हैं। शहर के घरों और बाजारों में यह परेशानी नई नहीं है।
चंडीगढ़ जैसे साफ-सुथरे माने जाने वाले शहर में भी लोग वर्षों से रसोईघरों, सीवर लाइनों और बाजारों में काॅकरोच की बढ़ती मौजूदगी से परेशान हैं। घरों में यह चर्चा पहले से होती रही है कि रात को रसोई की लाइट जलते ही सिंक, गैस चूल्हे और डिब्बों के पीछे से तेजी से भागते काॅकरोच आखिर आते कहां से हैं।
अब वही परेशानी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनती दिख रही है। हालत यह है कि काॅकरोच मारने वाले स्प्रे, जेल, चॉक और पेस्ट कंट्रोल का कारोबार अकेले ट्राईसिटी में ही सालाना कारोबार करीब 50 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। रात होते ही कई घरों में किचन की लाइट जलाने पर सिंक, गैस चूल्हे और डिब्बों के पीछे से तेजी से भागते काॅकरोच आम दृश्य बन चुके हैं।
यह कहते हैं लोग
सेक्टर-40 के मकान नंबर 2462 के रहने वाले संजीव ने बताया कि रात को पानी पीने उठो तो डर यही रहता है कि रसोई में फिर काॅकरोच न घूम रहे हों। कई बार बच्चों की पानी की बोतलों और बर्तनों तक पर काॅकरोच दिख जाते हैं। सेक्टर-24 के दुकानदार अंकुर गुप्ता ने बताया कि बरसात में बाजारों के पीछे हालात और खराब हो जाते हैं। सीवर खुलते ही बड़ी संख्या में काॅकरोच बाहर निकल आते हैं। सुबह दुकान खोलने से पहले सफाई करनी पड़ती है।
जीरकपुर के मकान नंबर 527 के रहने वाले अनीता शर्मा ने कहा कि उनके मकान में गर्मी आते ही काॅकरोच निकल आते हैं। कम से कम एक बार साल में पेस्ट कंट्रोल करवाना ही पड़ता है। चंडीगढ़ सेक्टर-7 की रहने वाली रितु गोयल ने कहा कि काॅकरोच तो बड़ी परेशानी है। इसके लिए ट्रीटमेंट बगैर काम ही नहीं चलता।
पेस्ट कंट्रोल का कारोबार पचास करोड़
पर्यावरणविद राहुल महाजन ने बताया कि ट्राईसिटी में करीब रजिस्टर्ड पेस्ट कंट्रोल एजेंसी और करीब इतनी ही पेस्ट कंट्रोल के प्रोडक्ट बेचने वाली दुकानें हैं। पेस्ट कंट्रोल रजिस्टर्ड कंपनी ही कर सकती है। चंडीगढ़ में सरकारी ड्रेनेज की वजह से काॅकरोच आते हैं। उन्होंने बताया कि चंडीगढ़ में जब से सीवरेज सिस्टम आया तभी से काॅकरोच हैं। उन्होंने कहा कि ट्राईसिटी में पेस्ट कंट्रोल की दवाइयां बेचने वाली करीब पचीस दुकानें हैं। पेस्ट कंट्रोल की बात करें तो सांप, चूहे और मक्खी और अन्य कीड़ों की दवाएं भी शामिल हैं, जिनका ट्रीटमेंट किया जाता है।
क्या कहते हैं प्रोडक्ट बेचने वाले कारोबारी
सेक्टर-26 के जनता सीड्स के मालिक रमेश महाजन और कालिया ट्रेड लिंक समीर कालिया ने बताया कि गर्मी और बरसात में काॅकरोच मारने वाले स्प्रे, जेल और पेस्ट कंट्रोल की मांग करीब 40 फीसदी तक बढ़ जाती है। पहले लोग साल में एक बार पेस्ट कंट्रोल करवाते थे। अब कई परिवार हर तीन-चार महीने में दवा करवा रहे हैं। हिट स्प्रे, जेल और चॉक की बिक्री लगातार बढ़ रही है। समीर कालिया ने बताया कि पेस्ट कंट्रोल इंडस्ट्री का सारा आधार ही कीड़े मकौड़े हैं। गर्मियों में इनका सारा काम काॅकरोच का है।
चंडीगढ़ में यहां पर है ज्यादा समस्या
सेक्टर-40, सेक्टर-38, सेक्टर-41, सेक्टर-42 के साथ ही बुड़ैल, रामदरबार, मलोया, कैंबवाला और हल्लोमाजरा में सीवर लाइनें, बाजारों की पिछली गलियां, ढाबों और रेस्टोरेंटों के आसपास का हिस्सा इनका गढ़ है। वहीं, जीरकपुर की बहुमंजिला इमारतों के बेसमेंट और घरों के नम रसोईघर इनका बड़ा ठिकाना बनते हैं।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य और स्किन के विशेषज्ञ डॉ. विवेक ने बताया कि कॉकरोच गंदगी में रहते हैं। गंदगी उनके पैरों में लगी रहती है। वह जहां जाते हैं बीमारी फैलाते हैं। इसके साथ स्किन पर खारिश भी कर देते हैं। इससे एलर्जी, अस्थमा और भोजन दूषित होने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। बच्चों और बुजुर्गों में इसका असर ज्यादा देखने को मिलता है।
नगर निगम अधिकारियों का कहना है कि नियमित सफाई अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन लोगों को भी घरों और आसपास सफाई रखने की जिम्मेदारी निभानी होगी। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सीवर सफाई, कूड़ा प्रबंधन और खाद्य प्रतिष्ठानों की निगरानी मजबूत नहीं हुई तो आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
शहर में कितना बड़ा कारोबार ?
पेस्ट कंट्रोल करने वाली कंपनी के राहुल सैनी के अनुसार ट्राईसिटी में करीब पच्चीस पेस्ट कंट्रोल कंपनियां हैं जो कि रजिस्टर्ड हैं। ट्राईसिटी का घरेलू कीटनाशक बाजार 10 करोड़ रुपये के बीच है। जबकि यदि इन सभी कंपनियों को मिला लें तो यह कारोबार पचास करोड़ के आसपास जाता है। इसमें जेल, स्प्रे और कीटनाशक दवाओं की बिक्री ही दस करोड़ रुपये की अनुमानित है। चाहे कोई नया मकान बनवाए या फिर पुराना मकान हो, दीमक और काॅकरोच की समस्या तो लगभग सभी जगह है।
इंडियन पेस्ट कंट्रोल एसोसिएशन के सदस्य जतिंदर सिंह ने बताया कि बरसात और उमस वाले महीनों में एंटी-काॅकरोच स्प्रे और जेल की बिक्री का कारोबार पिछले कुछ वर्षों में तेजी के साथ बढ़ा है। रियल एस्टेट के बढ़ने की वजह से कारोबार में यह उछाल आया है। काॅकरोच की बात करें तो जर्मन काॅकरोच और अमेरिकन काॅकरोच दोनों ही प्रजातियां हैं। अमेरिकन काॅकरोच बड़े होते हैं और वह सीवरेज और नालियों से आते हैं जबकि जर्मन रसोईं में पाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि छह माह में एकबार पेस्ट कंट्रोल लोग अवश्य करवाते हैं। पेस्ट कंट्रोल करवाने में कीमत एक हजार रुपये से लेकर पांच से सात हजार रुपये तक लगता है।
ट्राई सिटी में ऐसा है हाल
• पुराने सेक्टरों की सीवर लाइनों के आसपास ज्यादा समस्या
• बाजारों की पिछली गलियों में गंदगी और नमी
• ढाबों और रेस्टोरेंटों के पीछे रात में बढ़ी गतिविधि
• बेसमेंट और नम रसोईघर बने बड़ा ठिकाना
• बरसात में घरों में तेजी से बढ़ती शिकायतें
स्वास्थ्य पर असर
• भोजन दूषित होने का खतरा
• एलर्जी और अस्थमा की आशंका
• बच्चों और बुजुर्गों पर ज्यादा असर
• सीवर और गंदगी से संक्रमण फैलने का जोखिम