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Chandigarh News: कीहोल ब्रेन सर्जरी से कम दर्द, कम नुकसान, तेजी से होगी रिकवरी
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चंडीगढ़। पीजीआई के डॉक्टरों ने ब्रेन सर्जरी के क्षेत्र में अहम उपलब्धि हासिल की है। पहली बार यह वैज्ञानिक रूप से साबित हुआ है कि कीहोल (छोटे चीरे वाली) ब्रेन सर्जरी न सिर्फ बाहर से कम दर्दनाक दिखती है बल्कि शरीर के अंदर भी कम नुकसान पहुंचाती है। इससे तेजी से रिकवरी भी होती है। न्यूरो सर्जनों की टीम ने प्रो. एसएस ढंढापानी और प्रो. हेमंत भगत ने किया। उनका रिसर्च अंतरराष्ट्रीय जर्नल न्यूरोलॉजिकल रिव्यू में प्रकाशित की है। यह अध्ययन दुनिया में अपनी तरह का पहला अध्ययन माना जा रहा है, जिसमें कीहोल ब्रेन सर्जरी के बायोकेमिकल प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।
डॉ. ढंढापानी ने बताया कि कीहोल ब्रेन सर्जरी एक आधुनिक तकनीक है, जिसमें सिर की हड्डी में बेहद छोटा छेद बनाकर ऑपरेशन किया जाता है। इसका उपयोग ब्रेन ट्यूमर और एन्यूरिज्म जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में किया जाता है। अब तक इसे कम दर्द और बेहतर कॉस्मेटिक परिणामों के कारण प्रभावी माना जाता था, लेकिन इसके अंदरूनी प्रभावों को लेकर ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सीमित थे। इस शोध टीम में डॉ. प्रसांत, डॉ. तेजस्वी, डॉ. मुकिलन, डॉ. अपिंदरप्रीत, डॉ. नवनीत, डॉ. विवेक, डॉ. सुषांत, डॉ. चंद्रशेखर और डॉ. एस.के. गुप्ता सहित कई विशेषज्ञ शामिल रहे।
सर्जरी से पहले और बाद में मरीजों के शरीर में होने वाले बदलावों का किया विश्लेषण
इस अध्ययन में डॉक्टरों की टीम ने सर्जरी से पहले और बाद में मरीजों के शरीर में होने वाले बदलावों का विश्लेषण किया। इसके लिए दो महत्वपूर्ण बायोमार्कर सीआरपी (जो सूजन का संकेत देता है) और कस्पासे-3 (जो कोशिकाओं के नुकसान या मृत्यु को दर्शाता है) की जांच की गई। रिसर्च में सामने आया कि कीहोल सर्जरी कराने वाले मरीजों में सूजन और कोशिकीय नुकसान, पारंपरिक (ओपन) सर्जरी की तुलना में काफी कम था। इससे स्पष्ट होता है कि यह तकनीक शरीर पर अंदरूनी स्तर पर भी कम प्रभाव डालती है। इस खोज का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि कम सूजन और कम सेल डैमेज का सीधा संबंध बेहतर रिकवरी से है। इससे ऑपरेशन के बाद दौरे (सीजर्स) आने का खतरा कम हो सकता है और याददाश्त या सोचने-समझने से जुड़ी समस्याओं की आशंका भी घटती है।
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डॉ. ढंढापानी ने बताया कि कीहोल ब्रेन सर्जरी एक आधुनिक तकनीक है, जिसमें सिर की हड्डी में बेहद छोटा छेद बनाकर ऑपरेशन किया जाता है। इसका उपयोग ब्रेन ट्यूमर और एन्यूरिज्म जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में किया जाता है। अब तक इसे कम दर्द और बेहतर कॉस्मेटिक परिणामों के कारण प्रभावी माना जाता था, लेकिन इसके अंदरूनी प्रभावों को लेकर ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सीमित थे। इस शोध टीम में डॉ. प्रसांत, डॉ. तेजस्वी, डॉ. मुकिलन, डॉ. अपिंदरप्रीत, डॉ. नवनीत, डॉ. विवेक, डॉ. सुषांत, डॉ. चंद्रशेखर और डॉ. एस.के. गुप्ता सहित कई विशेषज्ञ शामिल रहे।
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सर्जरी से पहले और बाद में मरीजों के शरीर में होने वाले बदलावों का किया विश्लेषण
इस अध्ययन में डॉक्टरों की टीम ने सर्जरी से पहले और बाद में मरीजों के शरीर में होने वाले बदलावों का विश्लेषण किया। इसके लिए दो महत्वपूर्ण बायोमार्कर सीआरपी (जो सूजन का संकेत देता है) और कस्पासे-3 (जो कोशिकाओं के नुकसान या मृत्यु को दर्शाता है) की जांच की गई। रिसर्च में सामने आया कि कीहोल सर्जरी कराने वाले मरीजों में सूजन और कोशिकीय नुकसान, पारंपरिक (ओपन) सर्जरी की तुलना में काफी कम था। इससे स्पष्ट होता है कि यह तकनीक शरीर पर अंदरूनी स्तर पर भी कम प्रभाव डालती है। इस खोज का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि कम सूजन और कम सेल डैमेज का सीधा संबंध बेहतर रिकवरी से है। इससे ऑपरेशन के बाद दौरे (सीजर्स) आने का खतरा कम हो सकता है और याददाश्त या सोचने-समझने से जुड़ी समस्याओं की आशंका भी घटती है।