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Hindi News ›   Chhattisgarh ›   3 BSF constable went missing after skipping training; High Court dismisses plea against dismissal in Bilaspur

बिलासपुर: प्रशिक्षण छोड़कर गायब हुए तीन बीएसएफ कांस्टेबल, हाईकोर्ट ने खारिज की बर्खास्तगी के खिलाफ याचिका

Tue, 25 Aug 2026 07:36 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर Published by: अमन कोशले Updated Tue, 25 Aug 2026 07:36 PM IST
सार

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने प्रशिक्षण के दौरान बिना अनुमति लंबे समय तक गायब रहने वाले सीमा सुरक्षा बल के तीन कांस्टेबलों को सेवा से हटाने के फैसले को सही ठहराया है।

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3 BSF constable went missing after skipping training; High Court dismisses plea against dismissal in Bilaspur
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने प्रशिक्षण के दौरान बिना अनुमति लंबे समय तक गायब रहने वाले सीमा सुरक्षा बल के तीन कांस्टेबलों को सेवा से हटाने के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने तीनों पूर्व कांस्टेबलों की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि वर्दीधारी बलों में अनुशासन सर्वोच्च प्राथमिकता है और कोई भी कर्मचारी अपनी मर्जी से कर्तव्य से अनुपस्थित नहीं रह सकता। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने यह निर्णय सुनाया।
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मामले के अनुसार, त्रिलोक चंद साहू, तीरथ दास बर्मन और लक्ष्मीनारायण पटेल की नियुक्ति वर्ष 2008-09 में कांस्टेबल के पद पर हुई थी। विभाग ने जून 2009 में तीनों को महाराष्ट्र के चाकुर स्थित बीएसएफ स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर में बुनियादी प्रशिक्षण के लिए भेजा था। प्रशिक्षण के दौरान ही तीनों बिना अनुमति के कैंप छोड़कर चले गए और निर्धारित समय पर वापस नहीं लौटे। इसमें त्रिलोक चंद साहू और तीरथ दास बर्मन करीब 47-47 दिन तक ड्यूटी से गायब रहे, जबकि लक्ष्मीनारायण पटेल 70 दिन बाद वापस लौटे।
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बिना अनुमति लंबी अनुपस्थिति के बाद विभाग ने वर्ष 2010 में एक महीने का नोटिस देकर तीनों को सेवा से हटा दिया था। इसके खिलाफ तीनों ने विभागीय अपील और दया याचिका दायर की, लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद, उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वे स्वास्थ्य संबंधी कारणों से अनुपस्थित रहे और उनके पास इसके दस्तावेज मौजूद हैं। विभाग ने कहा कि वर्दीधारी बल में बिना अनुमति अनुपस्थित रहना गंभीर अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है।
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उच्च न्यायालय ने पाया कि तीनों कर्मचारी स्थायी नहीं थे, बल्कि 1960 के नियमों के तहत अस्थायी थे। तीन साल की सेवा पूरी न होने के कारण उन्हें क्वासी-पर्मानेंट कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला था। अदालत ने माना कि अस्थायी कर्मचारियों की सेवा नियम 12 के तहत एक महीने के नोटिस पर समाप्त की जा सकती है और विभागीय जांच अनिवार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशिक्षण अधूरा छोड़कर लंबे समय तक गायब रहना गंभीर मामला है। अदालत ने सेवा से हटाने की कार्रवाई को उचित मानते हुए तीनों याचिकाएं खारिज कर दीं।
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